
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी, अभी कुछ दिन पहले एक काफ़ी प्रख्यात गायिका और कथावाचक हैं, जिन्होंने अपना एक इंटरव्यू दिया ऑनलाइन। और उसमें उन्होंने स्त्रियों के मासिक धर्म के ऊपर अपने कुछ विचार प्रकट किए, कि मासिक धर्म में स्त्रियाँ अशुद्ध नहीं होती हैं। और अगर वो स्त्रियाँ अशुद्ध होतीं, तो जो बच्चे पैदा होते हैं, वो उसी रक्तस्राव से होते हैं तो हम सभी भी अशुद्ध होते?
दूसरी बात उन्होंने ये कही, कि जब द्रौपदी जी को भरी सभा में लेकर आया गया था तब वो रजस्वला थीं। और अगर वो अशुद्ध होतीं, तो श्रीकृष्ण जी उनकी सहायता न करते।
उनके इस प्रश्न के बाद, हमारे सो-कॉल्ड ‘रूढ़िवादी’ कथावाचक, या जो भी शास्त्रज्ञानी थे उन्होंने अपनी बहुत सी वीडियोज़ डालीं। जिसमें से कुछ ने इस तरह से लिखा कि उन्होंने जो भी उससे संबंधित अपने विचार दिए कि पराशर स्मृति या पराशर गृहसूत्र में उन्होंने संस्कृत में पहले बोला और फिर उसको हिंदी में ट्रांसलेट किया कि, “स्त्री जब मासिक धर्म में होती है तो वो पहले दिन डायन, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन रजस्वला और फिर चौथे दिन वो शुद्ध होती है। और जिस तरह बार-बार रोगी को स्पर्श करने से रोग हो जाता है, उसी तरह रजस्वला स्त्री को देखने से दोष लगता है।”
फिर उन्होंने कुछ और बोला कि, “दाँतों में छेद हो, वो मूर्ख नहीं हो सकता। माथा चौड़ा हो, वो कभी दरिद्र नहीं हो सकता। एक आँख का काना कभी साधु नहीं हो सकता। उसी प्रकार, क्योंकि वो गायिका भी हैं, उसी प्रकार गाने वाली स्त्री कभी सती नहीं हो सकती।”
और वो कथावाचक भी हैं, तो उसके बारे में भी उन्होंने शास्त्र से संबंधित अपने विचार प्रकट किए कि जो शास्त्रों में लिखा गया है कि, “पुरुष ऐसा कौन सा पाप है जो वो नहीं करता, अगर वो पुरुष स्त्री के मुख से धर्म एवं शास्त्रों का श्रवण करता है।” और फिर उन्होंने कहा, कि “आप समझ रही हैं ना कि हमारे शास्त्रों में नाचने-गाने वाली जो स्त्रियाँ हैं, उनको वेश्या समझा जाता है। वो सती नहीं हो सकतीं, वो अच्छे चरित्र की स्त्रियाँ नहीं हो सकतीं।”
तो एक तो यहाँ पर मेरे दिमाग़ में ये आया कि मीराबाई, जो गायिका भी थीं, क्या ये जो लोग उनको भी फिर इसी कैटेगरी में ला रहे हैं? और दूसरा प्रश्न ये था कि, क्योंकि वहाँ नीचे बहुत से लोगों के कमेंट थे उनके वीडियोज़ के नीचे कि, “हाँ हाँ, आप सही बोल रहे हैं।” या “शास्त्र तो पढ़ ले पहले,” ख़ुद चाहे उन्होंने कभी नहीं पढ़े।
तो दूसरा ये विचार था कि, कैसे इन लोगों तक सही बात जाए, या जो कोई सही बात कर रहा है, उसको कैसे इन मान्यताओं से, इन रूढ़िवादी परंपराओं से छुटकारा दिलाया जाए? कैसे उन तक सही बात, अगर कोई कर रहा है उसको पहुँचाया जाए? उनको बताया जाए कि क्या सही है, क्या गलत है?
आचार्य प्रशांत: सबसे पहले तो ये है कि, हर पुरानी किताब को शास्त्र थोड़ी बोलते हैं। अब वैसे तो आप समाजशास्त्र की किताब को भी कह सकते हैं कि ये शास्त्र है, लेकिन जब हम धर्म में “शास्त्र” शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उससे आशय होता है, आध्यात्मिक ग्रंथ।
और आध्यात्मिक का क्या मतलब होता है?
वो जो आपको आपकी तरफ़ ले जाए। स्वयं को और जानना, अध्यात्म है। वो ‘अध्यात्म’ शब्द में ही, “अधि,” “आत्म।” और जानना, 'स्वयं को और जानना ही अध्यात्म है।'
तो आध्यात्मिक ग्रंथ क्या हुआ फिर?
जो आपको, आपको जानने में मदद करे। मैं स्वयं को और जान पाऊँ जिस किताब की सहायता से, वो किताब मैं मानूँगा कि आध्यात्मिक ग्रंथ है।
और इधर-उधर की बातें जो किताबें करती हों, वो थोड़ी शास्त्र कहने लायक़ हो गईं? हाँ, उनको आपको दूसरे शास्त्रों का नाम देना हो दे लीजिए। और 50 तरह के आप शास्त्र बना सकते हैं, कोकशास्त्र भी होता है। किसी भी तरीक़े को आप, मनुष्य की गतिविधि के किसी भी क्षेत्र की किताब को आप शास्त्र का नाम दे सकते हो, पर वो फिर दूसरी चीज़ है। बात समझ रहे हैं?
तो हर किताब एक बराबर वजन की नहीं होती है और उसको उसके वजन के अनुसार ही महत्त्व और सम्मान मिलना चाहिए। उससे ज़्यादा थोड़ी ही, उससे कम भी नहीं। अगर हम अध्यात्म की बात कर रहे हैं, तो सिर्फ़ वही पुस्तक शास्त्र कहलाने लायक योग्य है, जिसमें अहम्, आत्मा और प्रकृति की बात की गई है। ये कसौटी बहुत अच्छे से पकड़ लीजिए। जहाँ इनके अलावा और पचास बातें चल रही हों दुनियाजहान की, कि स्त्रियों के मासिक धर्म की बात चल रही है, और चिड़िया-पंछी, बादल और मोर ने कौए से क्या कहा, और ब्राह्मण और शूद्र में क्या रिश्ता होना चाहिए। जहाँ ये सब बातें चल रही हों उनको हम शास्त्र थोड़ी बोलेंगे।
जहाँ अहम् और आत्मा की बात चल रही है, सिर्फ़ वो शास्त्र है। बाक़ी और किस्से-कहानियाँ शास्त्र नहीं कहलाते।
राजा किस अपराध पर कितने कोड़े मारे, क्या दंड दे, क्या पुरस्कार दे, ये सब शास्त्र थोड़ी हो गया। ये कहाँ से शास्त्र हो गया? तो जो मूल भूल है, वो तो यही है कि कोई भी पुरानी किताब लेकर उसको शास्त्र बोलना शुरू कर देते हो।
आत्मज्ञान की पुस्तक को ही शास्त्र कहा जा सकता है। उसके अलावा कोई भी किताब शास्त्र कहलाने योग्य नहीं है, क्योंकि अध्यात्म का मतलब ही है, स्वयं को जानना। स्वयं को जानने के अलावा कोई बात हो रही है, तो वो तो अध्यात्म शब्द की परिभाषा के ही विरुद्ध चली गई। वो शास्त्र कैसे हो गया? और इसीलिए मैं जो बोल रहा हूँ, वो कोई मेरी अपनी रचना, मेरी अपनी कल्पना की बात नहीं है। मेरा कोई निजी सिद्धांत नहीं है। बहुत सीधी ये बात रही है, सब जानते रहे हमेशा से कि 'श्रुति, शास्त्र कहलाती है। स्मृति, साहित्य कहलाती है।'
जितने भी श्रुति ग्रंथ हैं, वो शास्त्र हैं। बाक़ी जो स्मृति है, उसको तो साहित्य कहना ज़्यादा उचित होता है।
श्रुति ग्रंथ कौन से हैं? जो वेदों के दर्शन के ग्रंथ हैं, वो श्रुति ग्रंथ कहलाते हैं। उपनिषदों को श्रुति बोलते हैं। और गीता भी चूँकि उपनिषदों की श्रेणी में रखी जाती है — गीतोपनिषद् कह देते हैं, तो गीता भी फिर श्रुति हो गई। वेदांत सूत्र, ब्रह्म सूत्र, ये श्रुति हो गए।
और आप पराशर स्मृति या याज्ञवल्क्य स्मृति या मनुस्मृति की बात कर रही हैं अभी यहाँ पर, ये स्मृतियाँ हैं। और स्मृति साहित्य में ये सब स्मृतियाँ भी आती हैं, गृहसूत्र आते हैं जिनकी आपने बात करी, धर्मसूत्र आते हैं और सारे पुराण आते हैं, वो सब स्मृतियों में आते हैं भाई। उनका हवाला देकर कुछ नहीं सिद्ध किया जा सकता। आप मनुस्मृति से कुछ लेकर आएँगे, तो यही पता चलेगा कि आज से इतने हज़ार साल पहले सामाजिक स्थितियाँ कैसी थीं और उनमें क्या चल रहा था। तो वो इतिहास को आप जानना चाहते हो, तो उसके लिए एक अच्छी किताब है लेकिन उससे आप आज थोड़ी कुछ साबित कर सकते, ना आज आप उसको लागू कर सकते।
कोई भी व्यक्ति ठीक दिमाग़ का, ये थोड़ी कहेगा कि मनुस्मृति आज लागू कर दो। उसका अध्ययन अगर आप करें, तो ये पता चल जाएगा कि किसी ज़माने में, किसी समय पर, किसी जगह पर कैसी सामाजिक स्थितियाँ थीं। ये पता चल जाता है उनसे।
मुझे समझ में नहीं आता ये हमारा कि हर चीज़ आपको नई चाहिए; मैं आपको बोलूँ, मैं 1940 के मॉडल की गाड़ी दे रहा हूँ, आप चलाएँगे? आप ख़रीदने जाते हो गाड़ी, कोई आपको बोले "ये खड़ी हुई है, 2023 मॉडल है," आप ख़रीदोगे? आप कहोगे, "2024 चल रहा है, 2024 दो।" हर चीज़ आपको नई चाहिए लेकिन जब परंपराओं की और रूढ़ियों की बात आती है, और अंधविश्वासों की बात आती है, और मूर्खता की बात आती है तब हम कहते हैं “जितना पुराना, उतना अच्छा।” और कोई चीज़ सिर्फ़ इसलिए अच्छी हो गई क्योंकि पुरानी है, तो फिर कार भी पुरानी चलाओ कपड़े भी पुराने पहनो; 300 साल पुराने कपड़े काहे नहीं पहनते तब तो कहते हो, "नहीं बताओ, लेटेस्ट क्या चल रहा है? वो चाहिए।”
और जितने लोग इस तरह की बात करते हैं, “सबकी गाड़ियाँ छीन लो, और 150 साल पहले जो पहली साइकिल बनी थी वो इनको दे दो।” उसमें एक पहिया इतना बड़ा होता था और एक इतना बड़ा (पहले के मुकाबले छोटा) होता था। क्योंकि पुरानी चीज़ें अच्छी होती हैं इनके हिसाब से तो इनको दे दो पुरानी, यही चलाओ। तब ये काहे को बोलने जाते हैं?
और ज़्यादातर जो इस तरीक़े के होते हैं, ये बढ़िया पैसा, अच्छा ओहदा, एकदम लग्ज़री वाली कार चाहिए, वो भी 2024 मॉडल की। ये 2024 क्यों चाहिए? तुम 2024 ईसा-पूर्व वाली गाड़ी माँगो, 2024 BC वाली गाड़ी देना। इनको रथ दिए जाने चाहिए, ये गाड़ियों पर क्यों चल रहे हैं? बढ़िया रथ निकल रहा है। और पंखा झलने वाले होने चाहिए; ये इनके घरों में पंखे, कूलर, एसी क्यों लगे होते हैं?
आप कह सकते हैं, श्रुति भी तो पुरानी है। हाँ श्रुति पुरानी है पर श्रुति में जो मुद्दा लिया गया है, जो उसका विषय है, सब्जेक्ट — वो इटरनल है। वो किसको संबोधित करती है श्रुति? अहंकार को। अहंकार 5000 साल पहले भी था, 5000 साल बाद भी है। तो इसीलिए श्रुति को आप पुराना कभी नहीं बोल पाओगे। कोई भी काम ठीक है कि नहीं है, उसके लिए भी आख़िरी ये होती है कि, श्रुति द्वारा वो प्रमाणित है कि नहीं। श्रुति प्रमाण हमेशा आख़िरी माना जाता है। हमेशा। शब्द प्रमाण भी उसी को बोलते हैं, आख़िरी बात है।
श्रुति सारे धार्मिक मसलों का सर्वोच्च न्यायालय होती है, उसके अलावा हम किसी की नहीं सुनेंगे।
सर्वोच्च न्यायालय ने जो बात बोल दी, उसके बाद ये नीचे के छोटे-मोटे कोर्ट कुछ बोल रहे हैं, उसकी कोई हैसियत है क्या? सर्वोच्च न्यायालय ने बोल दिया कि, “महिला और पुरुष देह से अलग होंगे, चेतना से एक हैं, और देह का महत्त्व नहीं — महत्त्व चेतना का है।" जब सर्वोच्च न्यायालय ने ये बोल दिया, तो अब नीचे वाले कुछ बोलते रहें उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?
सनातन धर्म का सर्वोच्च न्यायालय है — श्रुति और श्रुति माने उपनिषद्। उपनिषदों ने कह दिया कि जब हम किसी मनुष्य को देखते हैं तो ना हम उसमें महिला दिखाई देती है, ना पुरुष दिखाई देता है। हम जब किसी मनुष्य को देखते, तो हमें उसमें चेतना दिखाई देती है, बस; और छटपटाती हुई चेतना, जो नहीं जानती कि वो परेशान क्यों है। और इसी छटपटाहट से मुक्त होने के विज्ञान को अध्यात्म बोलते हैं — ये कह दिया उपनिषदों के ऋषियों ने।
अब इसके बाद हमें और किसी किताब में क्या लिखा है, पुरानी हमें क्या करना है उसको पढ़ के? और इतना पुराना देश है। उधर कंधार से लेकर कामरूप तक, ऊपर तिब्बत से लेकर के नीचे लंका तक, कितने ही ग्रंथ लिखे गए होंगे। जितने मुँह, उतनी बातें। आप लिखने से तो किसी को नहीं रोक सकते ना? और जो भी पढ़े-लिखे लोग थे, उनको संस्कृत आती थी, संस्कृत में लोगों ने बातें लिख दी हैं।
तो सारी जो पुरानी बातें हैं, उनका एक बराबर थोड़ी महत्त्व हो गया। थोड़ा भी अगर कोई धर्म का ज्ञाता होगा, तो अच्छे से जानता है कि पुराण, इतिहास, स्मृति — इन तीनों को ही स्मृति ही माना जाता है। ये तीनों इकट्ठे करके स्मृति माने जाते हैं: पुराण, इतिहास, स्मृति — इनको धर्मशास्त्र बोलते हैं। जो स्मृतियाँ होती हैं ना, ये सब इकट्ठे करके स्मृति मानी जाती हैं। कह रहे, इनका स्थान श्रुति से नीचे का है। तो इनकी बातें सिर्फ़ तभी तक मानी जाएँगी, स्मृतियों की, पुराणों की, इनकी बात तब तक ही सुनो, जब तक ये श्रुति से मेल खाती हों। अगर इनकी कोई बात श्रुति से मेल नहीं खा रही, तुरंत उसको हटा दो।
डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की कोई बात सुप्रीम कोर्ट की बात से मेल नहीं खा रही, क्या होगा? डिस्ट्रिक्ट कोर्ट की बात हटा दी जाएगी। तो स्मृति की या पुराण की कोई बात अगर मेल नहीं खा रही उपनिषदों से, तत्काल हटा दो। और पुराणों वग़ैरह की बहुत सारी बातें हैं जो श्रुति से मेल नहीं खातीं, आपको उनको दरकिनार करना होगा। नहीं तो ये श्रुति के प्रति असम्मान हो जाएगा। और सनातन धर्म श्रुति का धर्म है, स्मृति का नहीं। स्मृति तो थी एक समय पर समाज को एक व्यवस्था देने के लिए, यही स्मृति का काम होता है।
आ रही बात समझ में?
अब वो "मासिक धर्म के पहले दिन चाण्डालिनी होती है, ये होती है। उपनिषदों के ऋषि ये बात सुनते तो ऐसे माथा पकड़ के बैठ जाते। बोलते, "ये किस ने किस बुद्धि से ये सब बातें बोली हैं।" ये बातें तो पढ़ने लायक़ ही नहीं होती हैं।
आपका कोई हितैषी हो, जो थोड़ा जानकार हो, विद्वान हो, आप उसके पास जाएँ, आप कहें आपको अपनी आध्यात्मिक यात्रा शुरू करनी है।” तो वो आपके हाथ में भगवद्गीता देगा, कठोपनिषद् देगा, अष्टावक्र गीता देगा। वो आपको ये सब बातें थोड़ी देगा पढ़ने को, कि महिला घूंघट कितना लंबा निकाले, और महिला को कितने कोड़े मारो अगर वो परपुरुष से बात करती पाई जाए। ये सब बातें अध्यात्म में थोड़ी आती हैं।
तो ऐसे ही है, इनका क्या महत्त्व है? कि महिला अगर गाना गा रही है तो वो वेश्या हो गई। ये बात कोई उपनिषद् बोलने वाला है? ये बात श्रीकृष्ण बोलने वाले हैं? ये बात कोई सुलझा हुआ मन बोलने वाला है? ये सब बातें तो बीमार चित्त की उपज हैं सीधे-सीधे। ये बोलने में डर कैसा? कोई महिला गाना गा रही है और आप उसको वेश्या बोलो और ये बात किसी किताब में लिखी हो, तो किताब किसी बीमार आदमी ने लिखी होगी।
प्रश्नकर्ता: और आचार्य जी, सबसे बड़ी बात ये है कि जो भी जितने भी ये थे, जो वीडियोज़ डाली गई थीं। पता नहीं मुझे ये शब्द कहने चाहिए कि नहीं, कि उनके इतने बड़े-बड़े, वो पूरा तिलक लगा हुआ था और वो पूरे एक उस तरीक़े से बात करते कि आइ ऐम सरप्राइज़्ड, कि ऐसे कैसे बोल सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: आइ ऐम सरप्राइज़्ड कि आपने कितनी रिकॉर्डिंग सुन ली, कितनी देख ली, कि उसके बाद आपको समय मिल गया वो सब देखने का? कहने वाले तो हर तरीक़े के होंगे और कहेंगे, किताबें भी हर तरह की लिखी गई हैं, और वो लिखी जाती रहेंगी।
आपने गीता समागम के सारे सुन लिए सत्र? आपने सारे रिफ्लेक्शन लिख लिए? आपने चिंतन, मनन, ध्यान, निधिध्यासन, सब कर लिया? समाधि में पहुँच गईं क्या? आप वहाँ जाकर पता नहीं किसको देख रहे हो? क्यों देख रहे हो? और इस तरह के लोग रहेंगे। समस्या ये नहीं है कि वो लोग हैं। समस्या ज़्यादा बड़ी ये होती है, कि हम उधर पहुँच जाते हैं देखने-सुनने के लिए।
प्रश्नकर्ता: सर, वो रील्स में पॉप अप होती है।
आचार्य प्रशांत: तभी होती है जब वैसा पहले कुछ सुना होता है। रील का भी एक एल्गोरिद्म होता है, वो आपको वही दिखाएगा जो आप पहले देख चुके हो। क्यों देखते हो आप ये सब? मत देखा करो ना। ये सब हुआ है, मुझे तो पता भी नहीं है — किसने कहाँ क्या कर दिया, किसने क्या बोल दिया, कौन कथावाचक है, कौन गुरुजी हैं, किसने किस पर टिप्पणी कर दी। मुझे सचमुच नहीं पता है, एकदम नहीं जानता मैं।
प्रश्नकर्ता: क्योंकि जो वो न्यूज़ चैनल है, उसको मैं…
आचार्य प्रशांत: क्यों? क्यों?
प्रश्नकर्ता: उस पर कहीं आपका भी इंटरव्यू था तब।
आचार्य प्रशांत: अरे, तो मैं वहाँ घुसा होऊँगा, कि उस न्यूज़ चैनल में जो लोग हैं, उनको वहाँ से हटा सकूँ। मैं वहाँ घुसा था कि वहाँ के लोगों को वहाँ से हटा सकूँ। और आप मेरे हो, और आप वहाँ से हटने की जगह वहाँ जाकर बैठ गए। ये क्या तरीक़ा है?
प्रश्नकर्ता: उसको मैंने सब्सक्राइब किया एट दैट टाइम।
आचार्य प्रशांत: तो एट दैट टाइम करा, अब अनसब्सक्राइब कर दीजिए। ये सब मत देखा करिए, इसका कोई जवाब नहीं है, कोई इलाज नहीं है। मुंडे मुंडे मतिर्भिन्ना — जिसकी जैसा मुंड होता है, वैसी उसकी मति होती है। हम उसका क्या करें?
प्रश्नकर्ता: हम उसको अपनी डेली लाइफ़ में भी देखते हैं, और मोस्टली मुझे लगता है।
आचार्य प्रशांत: डेली लाइफ़ में जो लोग इस तरीक़े के हों, वहाँ आप क्या कर रहे हो, वहाँ पर? बताओ? मुझे ये सब सुनके ही ऐसा लग रहा है, कि मैं क्यों सुन रहा हूँ? आप डेली लाइफ़ में ऐसे लोगों को बर्दाश्त कैसे कर रहे हो? डेली माने रोज़। आप रोज़-रोज़ झेल रहे हो, क्यों झेल रहे हो? ये कैसी बात है?
स्त्री की एक यौन व्यवस्था है, ठीक है? जो उसकी अपनी निजी चीज़ है, शरीर की। उसका अपना एक सायकल है, उसका एक अपना रिप्रोडक्टिव सिस्टम है। कोई उसको उसी नज़र से बार-बार देखे जा रहा है, "हाँ भाई, तेरे पीरियड्स चल रहे हैं? नहीं चल रहे हैं? कौन सा दिन चल रहा है? क्या कर रही है? अभी तू चाण्डालिनी है, अभी तू ब्रह्मभक्षण है।" तो आप उसके साथ जी क्यों रहे हो? आप उसको क्यों देख रहे हो दिनभर? उसके साथ आप कैसे जी लेते हो?
भाई पुरुषों की भी अपनी एक यौन व्यवस्था होती है। उसके आधार पर कोई आके आपको चाण्डाल वग़ैरह बोले, तो आप काहे को उस आदमी के पास रुकोगे? ये बर्दाश्त वग़ैरह करना भी ना, एक गुनाह ही होता है। मैं नहीं कह रहा हूँ कि सर फोड़ दो, लड़ जाओ, पर उपेक्षा करना तो सीखो।
अष्टावक्र कह रहे थे ना — 'अनादरम् कुरु।' हर फालतू की बात को कान नहीं दिया करते, हट जाते हैं, उठ जाते हैं, जगह छोड़ देते हैं।
ज़िंदगी में इतना कुछ है बहुत सुंदर, खूबसूरत, उसको जीवन में लाइए ना। समय उसके लिए भी कम है, ये सब अगली चीज़ों के लिए समय कहाँ से निकाले? कितना कुछ जानना है, समझना है, देखना है। अच्छे लोग हैं, उनसे मिलना है, बातें करनी हैं, अच्छी जगहों पर जाना है, अच्छी किताबें पढ़नी हैं। ये सीखना है, वो सीखना है, पता नहीं क्या-क्या करना है।
और समय इतना कम है। पता नहीं किसी के पास पाँच साल हों, किसी के पंद्रह साल हों, और वो पाँच और पंद्रह साल जो थोड़े से हैं, उनको हम बिता दें ऐसे चाण्डालिनी और ये सब करने में। ये समय का कितना दुरुपयोग हो गया ना।
मत सुना करिए, मत देखा करिए। हमारे धर्मग्रंथों में जो श्रेष्ठ है, जो उच्चतम है वो मैं आप तक लेकर आ रहा हूँ। ठीक है? संतों की वाणी, ऋषियों का ज्ञान। उसके इधर-उधर आपको बहुत भटकने की कोई ज़रूरत है नहीं। और उधर-उधर तब जाइए, जब पहले जो सिलेबस है आपका, वो ख़त्म हो जाए। यहाँ पर तो शिक्षण व्यवस्था चल रही है, पाठ्यक्रम है। पहले इसको तो अपन निपटा लें, है ना?
प्रश्नकर्ता: सर, उन लोगों तक बात पहुँचाने की ज़रूरत पड़ती है ना? जो हमारे अपने आसपास हैं।
आचार्य प्रशांत: अपने आसपास कोई ऐसा नहीं है, कि मजबूरी है — चुनाव है। आप अपने प्रश्न के पीछे जो मान्यता है, वो नहीं पकड़ पा रही हैं। अपने आसपास किस तरीक़े से हैं? आप चाह रही हैं, इसलिए अपने आसपास हैं। आप ना चाहें तो आसपास नहीं होंगे। वो आपके आसपास नहीं हैं, आप उनके आसपास हैं।
प्रश्नकर्ता: सर, उनको गलत को गलत कैसे बताए, कि आप गलत सोच रहे हो।
आचार्य प्रशांत: अरे, कुछ मत बताइए, आसपास मत रहिए। मैं सबको बताने जाऊँ अगर कि क्या गलत है, एक दिन के अंदर 500 गोलियाँ खाकर आऊँगा। मैं क्यों बताने जाऊँ भाई? आसपास वाली बात ही पकड़ी, कोई आपके पास नहीं होता, आप किसी के आसपास होते हो। ये आपका चुनाव है कि ऐसे लोगों के आसपास हो। मत रहो उनके आसपास।
क्यों हो आसपास? होगा कोई स्वार्थ, होगा कोई लालच, होगा कोई डर। तो उस स्वार्थ, उस लालच, उस डर पर काम करिए ना, ताकि व्यर्थ लोगों के आसपास न रहना पड़े। जिसने मूर्खता की और बेईमानी की ठान ली है, उसको नहीं हराया जा सकता।
आप मुझसे पूछ रही हैं, उन्हें कैसे समझाएँ? क्या तर्क दें? मेरे ही तर्क, मैं ही नहीं समझा पाता, मैं आपको कौन सा नुस्खा दे दूँ? अभी उस दिन देवी जी थीं, उनसे बातचीत हुई। उन्होंने कहा कि वो गुरुजी की किताब थी, कि "मेंस्ट्रुअल साइकिल ख़राब हो जाएगा, श्मशान जाओगी तो।" तो उनसे जो बातचीत हुई, वो चैनल पर प्रकाशित हो गई। तो उस पर एक से एक बढ़िया तर्क आ रहे हैं।
बोल रहे, “देखो श्मशान में मुर्दा होता है।” मुर्दा माने मांस। मुर्दे सारे कभी जलते नहीं पूरे, थोड़ा-बहुत बचा रह जाता है, कई बार। तो श्मशान के आसपास होते हैं, सियार। और सियार क्या होते हैं? मांसभक्षी। तो अगर वहाँ महिला जाएगी और उसके पीरियड्स हैं, तो सियार को खून की गंध आएगी तो सियार औरत को दौड़ा लेगा और अभी उसके पीरियड्स चल रहे हैं, तो उतना दौड़ भी नहीं पाएगी। तो औरत पर सियार चढ़ न जाए, इसलिए उसको मना करा गया है।
अब मैं इनको क्या जवाब दूँ? कोई जवाब है इस बात का? क्या जवाब है? इनका तो यही जवाब है, कि आसपास मत रहो भाई। ना चैनल में आसपास रहो, जिस भी तरीक़े से ये "आसपास वाला" कर रखा है, ख़त्म करो। मैंने कहा, कॉमेडी में अच्छा लगेगा ना, बढ़िया कि वहाँ औरत गई थी और वहाँ सियार ताक लगाकर बैठा था।
एक और ने जोड़ा; बोले, "देखो, मुर्दा ख़ास तौर पर तब नहीं जलता जब बारिश हो जाती है। अब चिता जल रही थी, तभी बारिश हो गई। तो मुर्दा पूरा नहीं जलेगा और बारिश हो जाएगी, तो लोग आएँगे तो और भग जाएँगे क्योंकि बारिश हो रही है, कहाँ खड़े रहें? लोग भग जाएँगे। और उसी बारिश से मुर्दा पूरा जलेगा भी नहीं। सियार इसी ताक में बैठा हुआ है वहाँ पर। सोचो, ‘ईविल सियार'।"
एक बार मन में कल्पना करिए, कितना कॉमेडी, कितना फनी है ये। एक ख़तरनाक सियार ऐसे बैठा हुआ है, वो भी कब आया है? वो बारिश में, मानसूनी सियार। वो इसी चक्कर में है कि बारिश हो, और बारिश होगी जलाने वाले भग जाएँगे। तो मैं मुर्दा बिल्कुल, क्या बोलते हैं उसको? पाड़ के खाऊँगा, जैसे पंजाबी में बोलते हैं।
फिर बोले, "देखो, जब बारिश होगी, तो अगर पीरियड्स चल रहे हैं, तो जो सारा खून है, वो साड़ी पर लग जाएगा, बारिश हो रही है। तो सियार को बस सूँघने से नहीं पता चलेगा, देख के भी पता चल जाएगा। क्योंकि मामला तो बारिश का ही है। अब वो आई है और पीरियड्स थे, बारिश हो गई, तो वो खून साड़ी पर आ जाएगा। तो सियार सूँघ भले न पाए, देख के जान जाएगा। तो सियार और जल्दी दौड़ाएगा और अगर बारिश हो रही हो, भागेगी तो फिसल के गिरेगी। पीरियड्स पहले ही चल रहे थे, ऊपर से वो मिट्टी है वहाँ पर। वो फिसल के गिरेगी, तो सियार चढ़ जाएगा।" तो ये सारा काम सियार को मात देने के लिए किया गया है।
सेंस ऑफ ह्यूमर तो अच्छा है, लेकिन उसके आगे हमें आपसे कोई नाता नहीं रखना साहब।
प्रश्नकर्ता: सर, ये भी बोलते हैं कि, क्योंकि रजस्वला में स्त्रियाँ कमज़ोर होती हैं आत्मा में, तो जो श्मशान में प्रेत आत्माएँ होती हैं, वो उन पर जल्दी अटैक करती हैं और उनके साथ जुड़ जाती हैं।
आचार्य प्रशांत: जैसे ग्रैंड स्लैम वग़ैरह जब होता है ना, तो उनकी डेट्स इस हिसाब से फिक्स करी जाती हैं कि जो टॉप 10 फीमेल प्लेयर्स हों, टॉप 10 सीट्स जो हों, पहले उनसे पूछा जाता है कि "मैम, आपके पीरियड्स कब आ रहे हैं?" और उस हिसाब से उनकी डेट्स फिक्स करी जाती हैं।
क्योंकि बेचारी इतनी कमज़ोर हो जाती हैं, कि कैसे खेलेंगी? टेनिस में, क्वार्टर फाइनल, विंबलडन है। यूएस ओपन है, क्वार्टर फाइनल, सेमीफाइनल, फाइनल एक के बाद एक, खट-खट-खट हो रहे हैं। कैसे खेलेंगी भला? पीरियड्स में तो बहुत कमज़ोर हो जाती हैं। वैसे ही ओलंपिक्स, एशियन गेम्स, इन सब की डेट्स ये देख के फिक्स करी जाती हैं, कि मान लो 2000 फीमेल एथलीट्स हैं, तो महीने के वो डेट्स उठाओ जिसमें से 2000 में से किसी भी एथलीट के पीरियड्स न चल रहे हों।
क्या मूर्खता है, कमज़ोर हो जाती है। काहे कमज़ोर हो जाती हैं? कितना कमज़ोर हो जाती है? गिर पड़ेगी? पागल हो जाएगी? क्या करेगी? सीईओ होती हैं, वो पीरियड्स के दिनों में ऑफिस नहीं जातीं? डिसीजन नहीं लेतीं? प्राइम मिनिस्टर्स, प्रेसिडेंट महिलाएँ होती हैं, उनके पीरियड्स नहीं चल रहे? तो वो काम करना छोड़ देती हैं? या उन दिनों वो पगला जाती हैं, तो उल्टे-पुल्टे निर्णय पास कर देती हैं? ऐसा तो कुछ नहीं होता।
एक प्रोफेशनल एथलीट है, वो तो हर महीने ही कम्पीट कर रही है। वो कहाँ तक अपने पीरियड्स आगे-पीछे करेगी? उसे तो खेलना है, हर स्थिति में खेलना है। साधारण सी बात है, उनके लिए सामान्य हो जाता है सब कुछ ये। सबके लिए सामान्य हो जाता है। बेकार में हवा क्या बनाना? और इतना ही ख़्याल है, तो फिर ये भी ख़्याल कर लो, कि उसको पोषण कितना मिल रहा है। ये भी ख़्याल कर लो, उसको शिक्षण कितना मिल रहा है। ये भी ख़याल कर लो, कि पब्लिक स्पेसेस उसके लिए सेफ कितनी हैं कि रात में अगर निकलना चाहे, तो उसको ट्रांसपोर्ट मिलेगा कि नहीं मिलेगा। ये सब भी ख़्याल कर लो।
बस एक ही चीज़ का ख़्याल है उसके पीरियड्स कब आ रहे हैं? देश की पूरी संपत्ति में उसका कितना शेयर है, ये भी ख़्याल कर लो। लेजिसलेचर में और बोर्डरूम्स में उसका कितना रिप्रेज़ेंटेशन है, ये भी ख़्याल कर लो। ये सब नहीं ख़्याल करना। महिला विमर्श के नाम पर और महिला कल्याण के नाम पे, एक ही चीज़ का ख़्याल करना है, कि जब ये रजस्वला हो, उन दिनों इसको घर में बंद कर दो। यही उसके प्रति सबसे बड़ी मित्रता है।
और जो ये लोको ड्राइवर्स बन रही हैं महिलाएँ, तो उनके फिर ट्रेन भी बंद कर दो उनकी। और जो पायलट बन रही हैं महिलाएँ, 5 दिन तक फ्लाइट नहीं उड़नी चाहिए। और फाइटर पायलट भी बन रही हैं महिलाएँ, उन दिनों कोई दुश्मन देश आक्रमण कर दे, तो लेडी फाइटर पायलट बोलेगी, "मैं नहीं जाऊँगी, मेरे पीरियड्स चल रहे हैं अभी मैं चाण्डालिनी हूँ, डे वन है मेरा।" डे वन पर यही बताया था ना आपने? “चाण्डालिनी है।"
तो बोली "देखिए, अभी तो उसको बोला जा रहा है जाइए मैडम, प्लेन लेकर जाइए, आप बॉम्बिंग करिए वहाँ पर।" उसको बोल रही, "आज मैं चाण्डालिनी हूँ, आज बॉम्बिंग नहीं करूँगी।" बस ड्राइवर महिला है, ऑटो ड्राइवर महिला है, ट्रेन ड्राइवर महिला है। वो बोल सकती है, "मेरा आज डे टू चल रहा है, आज ट्रेन नहीं चलेगी।"
प्रश्नकर्ता: और उसको बार-बार देखने से आप भी रोगी हो जाते हो।
आचार्य प्रशांत: उसको बार-बार देखने से आप रोगी हो जाते हो। तो जो डॉक्टर्स हैं, जो लेडी डॉक्टर्स हैं, उनको उन दिनों में पेशेंट्स का ट्रीटमेंट नहीं करना चाहिए। क्योंकि अच्छा-ख़ासा आदमी भी रोगी हो जाएगा, ऐसे डॉक्टर को देखने से।
डॉक्टर ख़ुद कह रहा है "अरे, मुझे देखोगे तो तुम रोगी हो जाओगे!" चुटकुले तक ठीक है, उसके आगे ये बात सिर्फ़ उबाऊ है, और समय की बर्बादी।
प्रश्नकर्ता: पेनफुल भी है सर। क्योंकि पढ़े-लिखे समाज में, शहरों में ये चीज़ चलती है कि मंदिर नहीं जाना, मंदिर की किसी चीज़ को छूना नहीं है। लाइक दैट।
आचार्य प्रशांत: चलता है। इसका यही तरीक़ा है, आपको जो करना है, करिए ना। आपको रोकने वाली चीज़ उनकी बातें नहीं हैं। आपको रोकने वाली चीज़ हमेशा आपका अपना कोई डर या कोई स्वार्थ होता है। उस पर काम करिए।
और आपकी बात नहीं है, मेरी भी बात है। कोई भी दुनिया का पुरुष, कोई भी महिला, अगर मूर्खता की बातों से रुक रहा है, तो उसकी वजह बस ये होती है कि उस व्यक्ति के अंदर अपना कुछ डर या स्वार्थ है। नहीं तो कोई काहे को रुकेगा? क्लास में टीचर्स होती हैं। सोचो टीचर आकर बच्चों से बोल रही हैं, "टुडे जस्ट से गुड मॉर्निंग चाण्डालिनी!"
भारत में प्रधानमंत्री से लेकर, इतनी मुख्यमंत्री सब महिलाएँ रही हैं। उनके सेक्रेटरी, चीफ़ सेक्रेटरी, उनके जितने ऑफिसर्स हैं, उनको जाकर के यही बोल रहे हैं "मैम, आज आपका डे वन है? जी चाण्डालिनी मैम चलो।" ये तो फ़ॉर्मल जगह हो गई, यहाँ औपचारिक रिश्ते हैं। घर में कम से कम पतियों को तो ये करना चाहिए। उनको तो सब पता होता है, पीरियड्स हैं। वही जाकर बोले सुबह-सुबह, “उठ, चाण्डालिनी!"
सिर्फ़ इसलिए कि कुछ बातें पुरानी हैं, उनका कोई महत्त्व नहीं हो जाता। हर पुरानी चीज़ किसी कीमत की हो एकदम ज़रूरी नहीं है।
एकदम 500 साल पुराना जो घर हो, जाइए उसमें रहिए, नींद भी नहीं आएगी। पता नहीं कब गिर पड़े अपने ऊपर। 500 साल पुराने कपड़े, चश्मा पहनिए, खाना भी वो खाओ ना जो 500 साल पहले बना था। आज क्यों बनाते हो? क्यों कहते हो? "ताज़ा ले कर आओ।"
तब तो इम्प्रेस हो जाते हो। कोई बोलता है, "ये लेटेस्ट टेक्नोलॉजी है।" लेटेस्ट टेक्नोलॉजी क्यों चाहिए? एंशिएंट टेक्नोलॉजी माँगो। सेना वग़ैरह में भी क्यों कहते हो कि अति-आधुनिक हथियार मिलने चाहिए? उनको बोलो, "इनको अति-प्राचीन हथियार दिए जाएँ। गंडासे, कृपाण, तलवारें, गदा, पूरी भारतीय सेना को गदाओं की सप्लाई होनी चाहिए। सब जवान हमारे गदा लेकर जा रहे हैं, बॉर्डर पर। ये क्या?
बहुत सुंदर शब्द है किसी कवि के —
"लो अतीत से उतना ही, जितना पोषक है। जीर्ण-शीर्ण का मोह, मृत्यु का द्योतक है।"
जो कुछ अतीत में अच्छा हो, उसे ज़रूर लेना चाहिए। पर सब कुछ अतीत में अच्छा नहीं है, उसे लेने की कोई ज़रूरत नहीं है।
श्रीमद्भगवद्गीता, उपनिषद् — इन्हें दिल से लगा लीजिए। और अगर ये दो आपको समझ में आ गए हैं, काम हो गया आपका।
ठीक है?
प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।