महिला मासिक धर्म के पहले दिन चाण्डालिनी होती है, या महिला घूंघट कितना लंबा निकाले — ये सब बातें अध्यात्म में नहीं आती हैं। प्रेसिडेंट से लेकर सीईओ तक महिलाएँ हैं, वो पीरियड्स के दिनों में ऑफिस नहीं जातीं? कितना कमज़ोर हो जाती हैं, बताओ? श्रुति सारे धार्मिक मसलों का सर्वोच्च न्यायालय होती है। जब सर्वोच्च न्यायालय ने बोल दिया कि, “महिला और पुरुष देह से अलग होंगे, चेतना से एक हैं और देह का महत्त्व नहीं — महत्त्व चेतना का है,” तो अब नीचे वाले कुछ बोलते रहें, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है?
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी। आचार्य जी, अभी कुछ दिन पहले एक काफ़ी प्रख्यात गायिका और कथावाचक हैं, जिन्होंने अपना एक इंटरव्यू दिया ऑनलाइन। और उसमें उन्होंने स्त्रियों के मासिक धर्म के ऊपर अपने कुछ विचार प्रकट किए, कि मासिक धर्म में स्त्रियाँ अशुद्ध नहीं होती हैं। और अगर वो स्त्रियाँ अशुद्ध होतीं, तो जो बच्चे पैदा होते हैं, वो उसी रक्तस्राव से होते हैं तो हम सभी भी अशुद्ध होते?
दूसरी बात उन्होंने ये कही, कि जब द्रौपदी जी को भरी सभा में लेकर आया गया था तब वो रजस्वला थीं। और अगर वो अशुद्ध होतीं, तो श्रीकृष्ण जी उनकी सहायता न करते।
उनके इस प्रश्न के बाद, हमारे सो-कॉल्ड ‘रूढ़िवादी’ कथावाचक, या जो भी शास्त्रज्ञानी थे उन्होंने अपनी बहुत सी वीडियोज़ डालीं। जिसमें से कुछ ने इस तरह से लिखा कि उन्होंने जो भी उससे संबंधित अपने विचार दिए कि पराशर स्मृति या पराशर गृहसूत्र में उन्होंने संस्कृत में पहले बोला और फिर उसको हिंदी में ट्रांसलेट किया कि, “स्त्री जब मासिक धर्म में होती है तो वो पहले दिन डायन, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, तीसरे दिन रजस्वला और फिर चौथे दिन वो शुद्ध होती है। और जिस तरह बार-बार रोगी को स्पर्श करने से रोग हो जाता है, उसी तरह रजस्वला स्त्री को देखने से दोष लगता है।”




