पढ़े-लिखे लोगों में अंधविश्वास की ये है वजह || आचार्य प्रशांत, आइ.आइ.टी. बॉम्बे (2022)

प्रश्नकर्ता: प्रशांत, वेरी हैप्पी टू सी यू हेयर (आपको यहाँ देखकर बहुत ख़ुशी हुई)। मुझे आपके वीडियोज़ देखकर बड़ा अच्छा लगा कि आप सुपरस्टिशन (अंधविश्वास ) के अगेंस्ट बोलते हैं, रेसनालिटी (समानता) की तरफ़ बोलते हैं। एक सवाल था कि हमने साइंटिफिक टेम्पर (वैज्ञानिक स्वभाव) अपने कांस्टीट्यूशन (संविधान) में डाल दिया और साइंस (विज्ञान) पढ़ना हमारे लिए कंपल्सरी (अनिवार्य) है हर बच्चे के लिए। फिर भी साइंस में बड़ी-बड़ी डिग्री लेने के बाद भी लोग यहाँ पर सुपरस्टिशन में काफ़ी विश्वास करते हैं या फिर उनका साइंटिफिक, वैज्ञानिक मानसिकता नहीं है।
कुछ किसी ने कह दिया कि अरे! ये, ये इलाज काम करता है, वो बिना सोचे-समझे कि इसका क्या टेस्टिंग (परीक्षण) हुई है, क्या हुआ है; वो सोचकर उसपर अंधविश्वास करते हैं, वाट्सएप फॉरवर्ड कर देते हैं, वगैरह-वगैरह और अग़र आप देखो कि पिछले हज़ार, दो हज़ार, तीन हज़ार साल पहले जो नॉलेज (ज्ञान) हमारे सभ्यता में आई थी तो वो बिना जिज्ञासा के, बिना सत्य की खोज के नहीं आई होगी।
किसी ने ये नहीं कहा होगा कि मेरे पूर्वजों ने सबकुछ ढूँढ लिया है, अब मुझे कुछ ढूँढने की ज़रूरत नहीं है, बस मैं पूर्वजों को मानकर चलूँ। तो भी क्या ऐसा है कि हम वो दोबारा नॉलेज को आगे बढ़ाने के लिए नहीं सोच पाते या तो हम पाश्चात्य नॉलेज पर पूरा डिपेंडेंट (आश्रित) रह जाते हैं या फिर जो हमारे पूर्वजों ने बोल दिया उसको सत्य मानकर कि उसके आगे हमें उसकी टेस्टिंग भी नहीं करनी। तो ये हम कहाँ पर ग़लत हैं और ये एजुकेशन (शिक्षा) में कहाँ चेंज (परिवर्तन) लाने की ज़रूरत है कि ये आगे बढ़ा जा सके?



