प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में अनिश्चितता (अनसर्टेनिटी) से डर क्यों लगता है?
आचार्य प्रशांत: अनसर्टेन (अनिश्चित) क्या है? तीन गुणों की दुनिया है, तीन ही गुणों की रहेगी। समय है, समय ही रहेगा। शरीर है, शरीर ही रहेगा। पैदा हुए हो, जियोगे, मरोगे। उसमें अनिश्चित क्या है? अनिश्चित तो कुछ भी नहीं है। दिक्क़त ये है कि अहंकार को कुछ सुनिश्चित चाहिए क्योंकि भीतर-ही-भीतर वो डरा हुआ है, कहीं-न-कहीं वो जानता है कि वो ग़लत है, बल्कि वो नहीं है। तो वो अपने लिए, अपनी नज़र में एक सुनिश्चित, एक सर्टेन (निश्चित) कोना खोजना चाहता है। उस कोने के सन्दर्भ में तुम्हें सबकुछ अनसर्टेन लगता है, वरना अनसर्टेन क्या है? बात को समझो।
तुम ये मत कहो कि ज़िन्दगी अनिश्चित है, अप्रत्याशित है, अनपेक्षित है। नहीं, तुम पहले ये बताओ कि ये शब्द ही तुम्हारे मन में आया क्यों? तुम्हें ज़िन्दगी पूर्व नियोजित, सुनिश्चित चाहिए क्यों? तुम्हें इसलिए चाहिए क्योंकि तुम ऐसे नहीं हो जो हर स्थिति में सम और स्वस्थ रह पाएगा, क्योंकि तुम झूठ हो।
सच की पहचान क्या होती है? वो मिटता नहीं, वो टूटता नहीं। झूठ की पहचान क्या होती है? कि वो कुछ ख़ास परिस्थितियों में ही वैध, क़ायम, वैलिड (वैध) रह सकता है। परिस्थितियाँ बदल दोगे तो वो क़ायम नहीं रह पाएगा, वो चूर हो जाएगा।
तो इसलिए तुमने अपने चारों ओर बड़ी मेहनत करके कुछ कृत्रिम परिस्थितियाँ जमा करी हैं। उन कृत्रिम परिस्थितियों के भीतर तुम जब तक हो, तब तक तो तुम बचे हुए हो, तुलनात्मक रूप से। बचे तो तब भी नहीं हो, पर तब तक तुम तुलनात्मक रूप से सुरक्षित हो जब तक उन कृत्रिम परिस्थितियों के भीतर हो। उन परिस्थितियों को एक धक्का लगा, वो गिरीं कि तुम्हारी हालत ख़राब हो जाती है, पता है कि अब तुम पर ख़तरा आ गया। इसलिए तुम चाहते हो कि बाहर




