जानवर को मुफ़्त की रोटी मिल जाए, यह उसके लिए ठीक है; पर आदमी को मिल जाए, तो यह गड़बड़ है। क्योंकि जानवर के लिए कोई धर्म नहीं होता, लेकिन मनुष्य का धर्म होता है — अगर रोटी खा रहे हो, तो ईमान की खाओ।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी नमन, हमें एक बैंक शाखा के रूप में कुछ-न-कुछ लक्ष्य दिए जाते हैं जिसको मैं शाखा प्रबन्धक होने के नाते अपने स्टाफ़ को बाँट देता हूँ।
कुछ स्टाफ़ मेम्बर्स उसको पूरी लगन से करते हैं परन्तु कुछ जान-बूझकर उसको पूरा नहीं करते। जिस कारण शाखा का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता और फिर क्षेत्रीय कार्यालय से डाँट पड़ती है और मन विचलित रहता है और काफ़ी क्रोध भी आता है।
कभी-कभी मन करता है कि उस स्टाफ़ मेम्बर के खिलाफ़ कार्यवाही कर दूँ परन्तु फिर ये भी लगता है कि अगर ऐसा करूँगा तो उसके करियर और उसकी पदोन्नति में दिक्कत हो सकती है इसलिए नहीं कर पाता। मन इसी के बीच दुविधा में रहता है, कृपया मार्गदर्शन करें।
आचार्य प्रशांत: छोटी बात है; नहीं? (श्रोताओं को संकेत करते हुए) या बड़ी बात है?
आपके आसपास कोई ऐसा है अगर जिसको सहायता की ज़रूरत है तो ज़रूर करें। मैं उस सहायता की उपेक्षा कर देने को नहीं कह रहा हूँ। वो जो आप विचलित हो जाते हैं जब हेडक्वॉटर




