दर्शन में 'विवशता' जैसा कोई शब्द नहीं होता, 'चुनाव' होता है। आप अगर मजबूर हो, तो यह भी आपका चुनाव है कि आप अपने आप को मजबूर रखना चाहते हो। जिस दिन भीतर से आग उठे कि ऐसी ज़िंदगी नहीं जीनी, सारी मजबूरियाँ जल जाएँगी। कई बार वाक़ई ऐसा लगता है कि हम कमज़ोर हैं तो तब क्या करना है? जो चीज़ आप जान जाएँ कि सही है, उसमें जूझ जाइए। जूझने से ताक़त केवल आती ही नहीं, बल्कि प्रकट हो जाती है।
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प्रश्नकर्ता: गुड ईवनिंग सर। सर, मेरा ये क्वेश्चन है कि अगर कोई वीक है और वो अपने लिए स्टैंड नहीं ले पा रहा है, तो उसे तो मजबूरन समाज का हिस्सा बनना ही पड़ेगा और जैसा लोग चाहेंगे, वैसा ही करना पड़ेगा?
आचार्य प्रशांत: वीक कोई नहीं होता, नालायक होते हैं। मज़ा आता है दूसरों पर आश्रित रहने में, सुविधा मिलती है, स्वार्थ होता है। वीकनेस के कितने फ़ायदे होते हैं, पता नहीं है क्या? जिस दिन कॉलेज नहीं आना होता है तो एप्लीकेशन में क्या लिखते हो? "फीलिंग वीक।" दुर्बल होने के, बीमार होने के अनगिनत लाभ होते हैं भाई, बहुत लाभ होते हैं।
"मैं तो कमज़ोर हूँ, तुम तीन लोग काम कर लो। मेरा काम भी तुम तीन लोग कर लो, क्योंकि मैं तो कमज़ोर हूँ।" तो कोई वीक नहीं होता, नालायक होते हैं। जिन्हें पराश्रित ज़िंदगी जीनी होती है, जिन्हें ज़िंदगी के ख़तरे नहीं उठाने, जिन्हें अपनी गुलामी को बंधनों को चुनौती नहीं देनी। जिन्होंने स्वीकार कर लिया है कि चलो, गुलामी के एवज़ में बढ़िया दाना-पानी तो मिल रहा है न। चिड़िया कह रही है, सोने की सलाखें हैं, खाने को भी अच्छा मिल जाता है और कोई गिद्ध, बाज़, चील आकर हमला भी नहीं कर सकते, पिंजरा बढ़िया चीज़ है। और फिर बोलती है, "मैं क्या करूँ, मैं तो मजबूर हूँ।" तू मजबूर नहीं है, तूने सौदा किया है।




