मजबूरी नहीं, चुनाव होता है

Acharya Prashant

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मजबूरी नहीं, चुनाव होता है
दर्शन में 'विवशता' जैसा कोई शब्द नहीं होता, 'चुनाव' होता है। आप अगर मजबूर हो, तो यह भी आपका चुनाव है कि आप अपने आप को मजबूर रखना चाहते हो। जिस दिन भीतर से आग उठे कि ऐसी ज़िंदगी नहीं जीनी, सारी मजबूरियाँ जल जाएँगी। कई बार वाक़ई ऐसा लगता है कि हम कमज़ोर हैं तो तब क्या करना है? जो चीज़ आप जान जाएँ कि सही है, उसमें जूझ जाइए। जूझने से ताक़त केवल आती ही नहीं, बल्कि प्रकट हो जाती है। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: गुड ईवनिंग सर। सर, मेरा ये क्वेश्चन है कि अगर कोई वीक है और वो अपने लिए स्टैंड नहीं ले पा रहा है, तो उसे तो मजबूरन समाज का हिस्सा बनना ही पड़ेगा और जैसा लोग चाहेंगे, वैसा ही करना पड़ेगा?

आचार्य प्रशांत: वीक कोई नहीं होता, नालायक होते हैं। मज़ा आता है दूसरों पर आश्रित रहने में, सुविधा मिलती है, स्वार्थ होता है। वीकनेस के कितने फ़ायदे होते हैं, पता नहीं है क्या? जिस दिन कॉलेज नहीं आना होता है तो एप्लीकेशन में क्या लिखते हो? "फीलिंग वीक।" दुर्बल होने के, बीमार होने के अनगिनत लाभ होते हैं भाई, बहुत लाभ होते हैं।

"मैं तो कमज़ोर हूँ, तुम तीन लोग काम कर लो। मेरा काम भी तुम तीन लोग कर लो, क्योंकि मैं तो कमज़ोर हूँ।" तो कोई वीक नहीं होता, नालायक होते हैं। जिन्हें पराश्रित ज़िंदगी जीनी होती है, जिन्हें ज़िंदगी के ख़तरे नहीं उठाने, जिन्हें अपनी गुलामी को बंधनों को चुनौती नहीं देनी। जिन्होंने स्वीकार कर लिया है कि चलो, गुलामी के एवज़ में बढ़िया दाना-पानी तो मिल रहा है न। चिड़िया कह रही है, सोने की सलाखें हैं, खाने को भी अच्छा मिल जाता है और कोई गिद्ध, बाज़, चील आकर हमला भी नहीं कर सकते, पिंजरा बढ़िया चीज़ है। और फिर बोलती है, "मैं क्या करूँ, मैं तो मजबूर हूँ।" तू मजबूर नहीं है, तूने सौदा किया है।

दर्शन में “विवशता” जैसा कोई शब्द नहीं होता, “चुनाव” का शब्द होता है — “चुनाव।”

तो आप अगर मजबूर हो, तो ये भी आपका चुनाव है कि आप अपने आप को मजबूर रखना चाहते हो। जिस दिन भीतर से आग उठेगी कि, ऐसी ज़िंदगी नहीं जीनी, सारी मजबूरियाँ जल जाएँगी। और जिनको मौज आ रही है मजबूरी का जीवन जीने में, वही उम्र भर मजबूर पड़े रहते हैं। वो मजबूरी नहीं है, वो सुविधा है, स्वार्थ है, मस्ती है, मौज है। कोई मजबूरी नहीं, कुछ नहीं। क्या मजबूरी?

"स्टैंड नहीं ले पाते।" किसके सामने स्टैंड नहीं ले पाते? ठीक उन्हीं के सामने स्टैंड नहीं ले पाते न, जिनके सामने स्टैंड लिया तो तुम्हारे स्वार्थों पर आघात हो जाएगा? बाक़ी तो हर जगह स्टैंड ले ही लेते हो। ऑफ़िस में अपने बॉस के सामने स्टैंड नहीं ले पाता — मजबूर है, टिमिड है। यही घर में आकर बीवी के सामने स्टैंड भी लेता है थप्पड़ भी लगाता है, अब बीवी मजबूर है, टिमिड है, और ये जाकर बच्चों को दो थप्पड़ लगाती है। तो मजबूरी है कि स्वार्थ है?इसको ऑफ़िस से पैसा मिलना है, तो ये वहाँ स्टैंड नहीं ले पाता। उसको पति से पैसा मिलना है, तो वहाँ स्टैंड नहीं ले पाती। उनको माँ से खाना मिलना है, तो वो वहाँ स्टैंड नहीं ले पाते।

अब क्या करें? अब तो फँस गई बात। देखिए, ये बात भी वो नहीं है जहाँ वो मुझे ले जाना चाह रही थी पर मेरा तो इरादा ही पक्का ये रहता है कि, जहाँ तुम ले जाओगे, वहाँ मैं जाऊँगा नहीं। मैं यहाँ इसलिए आया हूँ ताकि तुम वहाँ जाओ जहाँ मैं तुम्हें ले जाना चाहता हूँ। और सुनिए, मैं अव्यावहारिक बात नहीं कर रहा हूँ कि आप कहें, "ऐसे थोड़ी ताक़त आ जाती है।"

मैं सहमत हूँ आपकी बात से कि कई बार जिस हद तक हम देख सकते हैं, और जितना हम अधिक से अधिक ईमानदार हो सकते हैं, हमें वाक़ई ऐसा लगता है कि हम कमज़ोर हैं। लगता है न? सबको लगता है, मुझे भी। तो तब क्या करना है वो जान लीजिए – जो चीज़ आप जान जाओ सही है, उसमें जूझ जाओ। भले ही ये लग रहा हो कि वो कर पाने की आप में क्षमता, बल या काबिलियत नहीं है, जूझ जाओ। जूझने से पता है क्या होता है? ताक़त अपने आप आ जाती है। आ भी नहीं जाती है, उद्घाटित हो जाती है, प्रकट हो जाती है, अनावृत्त हो जाती है। है पहले से ही पर जिस चीज़ का इस्तेमाल नहीं करो, वो पता भी कैसे चलेगा, याद भी कैसे रहेगा कि हमारे पास है? पता कैसे चलेगा? बताओ।

ताक़त आपके ही पास है, आप भूल गए हो क्योंकि आपने कभी उसका इस्तेमाल किया ही नहीं है। तो उसका आह्वान करना पड़ता है — इनवोकेशन करना पड़ता है।

और कैसे किया जाता है?

किसी सार्थक उद्यम में जूझ करके। और ये काम सही है, अब मैं इससे पीछे इसलिए नहीं हट सकता कि, मैं तो कमज़ोर हूँ, अभी मेरे पास ताक़त नहीं है, या संसाधन नहीं है। मैं पीछे नहीं हट सकता, काम सही है तो डूबूँगा। और जब डूबो, तो एक जादुई, चमत्कारिक तरीक़े से पाते हो कि ताक़त कहीं से आ गई। तुम भी हैरान रह जाते हो कि, "मुझमें इतनी ताक़त आ गई। मैं स्टैंड ले पा रही हूँ? मैं तो अपने आप को टिमिड, टाइनी, फीबल समझती थी। अबला नारी, इतनी भारी? ये कैसे हुआ मेरे साथ? मुझ में इतना दम कहाँ से आ गया?” वो तुम्हारा दम नहीं है, वो तुम्हारे सार्थक लक्ष्य का दम है। ज़िंदगी में सही लक्ष्य बनाओगे, अपने भीतर बहुत ताक़त पाओगे, वो लक्ष्य तुम्हें ताक़त दे देगा। बात समझ में आ रही है?

जैसे लोहा अपने आप को अनुमति दे दे चुंबक के प्यार में पड़ने की। अब लोहे ने दौड़ लगा दी चुंबक की ओर, और लोहा सोच रहा है, "मुझ में इतनी ताक़त कहाँ से आ गई? आज तक तो ऐसे ही पड़ा रहता था,” लोहे का टुकड़ा छोटा-सा। “आज तक तो ऐसे ही पड़ा रहता था, मैं हिल भी नहीं पाया, मेरी टाँगों में ताक़त ही नहीं थी मैं मजबूर था।” भाई, तूने एक ज़बरदस्त चुंबक को अनुमति दी है न कि वो छा सके तुझ पर, तो जो तेरी ताक़त है, तेरी गति की जो काइनेटिक एनर्जी है वो चुंबक से आ रही है। तुम्हारा लक्ष्य तुम्हें ताक़त दे देगा।

ये करिएगा आज़माइएगा, आप अपने ही एक नए और गहरे और असली रूप को देख कर के बिल्कुल भौचक्के रह जाएँगे। आप कहेंगे, इज़ दैट मी? कोई कहेगा, “हाँ। दैट्स नॉट जस्ट यू, दैट्स द रियल यू।

वही हो तुम — तत्त्वमसि।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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