प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, जीवन में माया की प्रचुरता साफ़ दिखती है। यह सुना है कि माया को सक्षित्व से नियंत्रित कर लो। और यह भी सुना है कि माया को अवेयरनेस (ध्यान) के साथ भोगने से इससे बाहर आया जा सकता है। कृपा करके सत्य दिखाने का कष्ट करें।
आचार्य प्रशांत: ये जो दोनों बातें हैं इनमें कोई अंतर नहीं है। जो साक्षी है, वही सम्यक भोग कर सकता है। हमने बात करी कि तुम अपनी पहचान याद रखो – मन नहीं हो, शरीर नहीं हो तुम। भोगने का काम शरीर का है और मन का है। उनका भी भोग अस्त-व्यस्त, अव्यवस्थित, उपद्रवपूर्ण तब हो जाता है जब तुम उनके साथ तादात्म्य कर लेते हो। तुम तादात्म्य नहीं करोगे तो वो भी सुव्यवस्थित तरीक़े से सम्यक भोग ही करेंगे।
उदाहरण समझना। शरीर भोजन माँगता है, पर जब तुम शरीर के साथ एक हो जाते हो तो तुम शरीर को उतना भोजन दे देते हो जितने कि उसको ज़रूरत भी नहीं है। जंगल चले जाओ, वहाँ सब जानवरों के लिए पर्याप्त भोजन है, पर वहाँ तुम्हें कोई मोटा जानवर नहीं मिलेगा। क्योंकि किसी जानवर को देह के माध्यम से शान्ति नहीं चाहिए। उसकी देह की अपनी एक व्यवस्था है, उसका वो पालन कर रहा है। शेर ने हिरण को मारा है, वो उतना ही खाएगा जितना उसको खाना है; बच जाएगा जो, वो छोड़कर चल देगा। फिर सियार वगैरह आकर के भक्षण करते रहते हैं। मैदान में बहुत सारी घास होगी, लालचवश कोई गाय पूरी घास नहीं चर लेगी। वो उतनी ही चरेगी जितनी उसके पेट को चाहिए और चली जाएगी।
आदमी का किस्सा दूसरा है। आदमी को जितना चाहिए वो उससे कहीं ज़्यादा का भोग करने लग जाता है। जब मैं कह रहा हूँ आदमी को कितना चाहिए, तो मेरा आशय है शरीर को कितना चाहिए। इसलिए तुम्हें आदमियों में मोटापा दिखता है।
जब तुम साक्षी हो जाते हो शरीर के तो तुम शरीर को छोड़ देते हो। अब शरीर उतना ही भोग करेगा जितना उसे करना है। नहीं तो तुम फिर कहते हो कि मैं शरीर हूँ, मुझे तृप्ति चाहिए तो मुझे फिर शरीर के माध्यम से तृप्ति चाहिए। तो भीतर की ये जो बेचैनी है उसको मिटाने के लिए तुम भोजन का सहारा लोगे। तुम सोचोगे खा-खाकर अंदरूनी बेचैनी मिट जाएगी। तुम कहोगे एक पिज़्ज़ा और लाओ।




