जब मन का आंगन पूरी तरह सूना, मैला और कचरे से भरा हो, और भीतर कोई शांति या पूर्णता न हो, तो इंसान दूसरों पर हावी होने की कोशिश करता है। वह दूसरों को अपना पैसा और रुतबा दिखाकर प्रभावित करने का प्रयास करता है, जो एक प्रकार की हिंसा है। इसलिए, जो लोग दिखावा कर रहे होते हैं, उन्हें समझ लेना चाहिए कि वे गहरे आंतरिक कष्ट में जी रहे हैं। वे भीतर से खाली और अशांत होते हैं। अपनी ही नजरों में गिरे हुए ये लोग दूसरों की नजरों में उठने की कोशिश करते हैं।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: सर, लोग इतना शो ऑफ (दिखावा) क्यों करते हैं?
आचार्य प्रशांत: दूसरों को दिखाते हैं न। अपने में पूरे नहीं हैं, इसीलिए दूसरों की आँखों से पूरापन चाहते हैं। ख़ुद को इज़्ज़त नहीं दे पाते, इसीलिए दूसरों से इज़्ज़त चाहते हैं। ख़ुद से कभी राज़ी नहीं हुए, सहमत नहीं हुए, इसीलिए दूसरों से वैलिडेशन (मान्यकरण) चाहते हैं।
तुमने पूछा, ‘लोग इतना दिखावा क्यों करते हैं?’ मैं पूछ रहा हूँ, किसको दिखाते हैं? ख़ुद को तो नहीं दिखाते न, दूसरों को दिखा रहे हैं न।
दूसरों की बहुत ज़रूरत ज़िन्दगी में तभी पड़ जाती है जब अपने मन का आँगन बिलकुल सूना हो। सूना ही न हो, बल्कि मैला हो, कचरे से भरा हुआ हो।




