वेदांत कहता है, तुम हट जाओ। हट जाओ अपने रास्ते से हटो। यू आर द डिफरेंस बिटवीन यू एंड योरसेल्फ। यू आर योर ओन वर्स्ट एनिमी। तुम अपने रास्ते से हटो। वेदांत नहीं कहता अपने लिए कुछ अच्छा करो। वेदांत नहीं कहता कि तुम महान बन के दिखाओ। वेदांत कहता है, अपनी शूद्रताओं को देखो, तुम लीचड़ हो। और अगर तुम अपना लीचड़पन हटा दो, तो महान तो तुम हो ही तत्वमसि।
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प्रश्नकर्ता: रामचरितमानस में बालकांड में लिखा है कि शिव जी कहते हैं, सती जी को समझाया उन्होंने। फिर उन्होंने कहा, “होइहि सोई जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।” मतलब, सब उन्होंने कह दिया कि समझाने के बाद विचार का इसमें वो आया। उसी में लिखा कि “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।”
मतलब, विचार जो आ रहा है किसके अंदर? मतलब, शिव जी ने तो वो तो गलत नहीं है, मतलब वो तो बहुत जानते हैं, हर चीज़ जानते हैं। तो विचार में किसका कंट्रोल है? हम कह रहे हैं ये फ्री विल है, तो वो भी फ्री विल है कि वो भी कोई फ्री विल दे रहा है हमें।
आचार्य प्रशांत: इसका उत्तर आपको इसमें समझ में आ जाएगा कि जब आप भारतीय धर्म, अध्यात्म और फिर दर्शन के शिखर पर जाते हैं, तो वहाँ जितने भी आपके दैवीय चरित्र हैं, वो सब बिल्कुल एक हो जाते हैं, कन्वर्ज कर जाते हैं, और सबके लिए मात्र एक शब्द बचता है — बोध।
क्या बोलता हैं निर्वाण षटकम कि “शिव कौन है?” कौन है शिव? आपने कहा, शिव जी हैं। आपके बोलने में ही




