
प्रश्नकर्ता: रामचरितमानस में बालकांड में लिखा है कि शिव जी कहते हैं, सती जी को समझाया उन्होंने। फिर उन्होंने कहा, “होइहि सोई जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।” मतलब, सब उन्होंने कह दिया कि समझाने के बाद विचार का इसमें वो आया। उसी में लिखा कि “कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा।”
मतलब, विचार जो आ रहा है किसके अंदर? मतलब, शिव जी ने तो वो तो गलत नहीं है, मतलब वो तो बहुत जानते हैं, हर चीज़ जानते हैं। तो विचार में किसका कंट्रोल है? हम कह रहे हैं ये फ्री विल है, तो वो भी फ्री विल है कि वो भी कोई फ्री विल दे रहा है हमें।
आचार्य प्रशांत: इसका उत्तर आपको इसमें समझ में आ जाएगा कि जब आप भारतीय धर्म, अध्यात्म और फिर दर्शन के शिखर पर जाते हैं, तो वहाँ जितने भी आपके दैवीय चरित्र हैं, वो सब बिल्कुल एक हो जाते हैं, कन्वर्ज कर जाते हैं, और सबके लिए मात्र एक शब्द बचता है — बोध।
क्या बोलता हैं निर्वाण षटकम कि “शिव कौन है?” कौन है शिव? आपने कहा, शिव जी हैं। आपके बोलने में ही पर्सोनिफिकेशन बैठा हुआ है। और आप आदि शंकराचार्य से पूछते हैं, तो वो बोलते हैं, “अहं निर्विकल्पो निराकाररूपो। चिदानन्दरूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्।। निर्विकल्पो निराकाररूपो।”
तो उच्चतम जगह पर जाकर के, राम, शिव, श्रीकृष्ण, जितने दैवीय, और जो हमारे यहाँ पर जो उच्चतम चरित्र हैं, वो यही तीन हैं। जिनमें से दो को हम विष्णु की परंपरा से लेते हैं, एक शैव की परंपरा से हैं, और फिर शिव की परम्परा से शक्ति भी आ जाती है, और वहाँ से फिर जो गणपति वाला गणपत्य धर्म। पर ये तीन केंद्रीय हमारे रहते हैं राम, श्रीकृष्ण, शिव — हिंदू धर्म की आप करें तो यही तीन सबसे ज़्यादा हमारे पूज्य हैं। और ये तीनों एक हो जाते हैं। कहाँ पर जाकर के? जब आप अध्यात्म को उसकी निष्पत्ति तक ले जाते हो, तीनों एक हो जाते हैं। तीनों फिर चरित्र नहीं रह जाते, तीनों बोध बन जाते हैं। ठीक है?
“तो शिव पार्वती से बात कर रहे हैं,” इसका मतलब हुआ बोध, प्रकृति को समझा रहा है। प्रकृति माने वही जो हम हैं — इंसान। हमने कहा न, हमारे दो सेंटर होते हैं। तो जो सही सेंटर है, वो जो प्राकृतिक सेंटर है, जो जन्मजात सेंटर है, उसको समझा रहा है। इसे ऐसे पढ़ा जाता है। जब ऐसे पढ़ोगे तो सब ठीक हो जाएगा।
गीता के श्रीकृष्ण कौन हैं? गीता के श्रीकृष्ण वे हैं, जो शुरुआत करते हैं अर्जुन के सारथी होने से, अर्जुन के सखा होने से, और फिर गीता के दौरान ही बोल देते हैं कि “मुझको जीव या देही या मनुष्य मत मान लेना। मैं वो नहीं हूँ।”
शिव कौन हैं? अभी हमने बात की—चिदानन्दरूप:, अहम्, निर्विकल्पो निराकाररूपो। शिव वो हैं। इसी तरह आप अभी संत तुलसीदास की बात कर रहे हैं, तो क्या बोलते हैं वो राम के बारे में कि राम कौन हैं? “राम ब्रह्म परमारथ रूपा।” तो राम कौन हैं? ब्रह्म हैं। “बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।” इंसान तो नहीं होगा जो पग बिन चले और कान के बिना सुने। तो राम भी फिर कौन हो गए? वही निर्विकल्पो, निराकाररूपो।
जब ऐसे समझ में आता है कि राम, श्रीकृष्ण, शिव ये तीनों सिर्फ़ बोध के प्रतीक हैं, तब फिर इस तरह के सवाल सब सुलझ जाते हैं।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरा फॉलो अप है कि जो विचार हैं मन में आ रहे हैं, उसमें संयम कैसे रखें?
आचार्य प्रशांत: रखना ही नहीं है संयम। संयम एक लोकधार्मिक मूल्य है, “संयम रखो।” संयम में फिर वही नियंत्रण की बात आ जाती है। संयम का असली अर्थ ये नहीं होता। बोध ही संयम है।
प्रश्नकर्ता: मतलब, रियलाइज हो जाए।
आचार्य प्रशांत: हाँ तुम्हें रोकना ही नहीं है। कुछ नहीं रोकना है, जानना है। हम डर जाते हैं, हम कहते हैं कि “अगर रोकेंगे नहीं तो हो जाएगा।” ऐसा नहीं है। जब रोकने वाला वही है जो करने पर उतारू है, तो रोक करके भी जो निकलेगा, वो बहुत विकृत होगा। वॉचड अप होगा।
तुम ही हो जो प्रेशर कुकर के नीचे की आग हो। और तुम ही हो जिसने कुकर को बिल्कुल ऐसे इंसुलेट कर रखा है, और सीटी भी लगा रखी है। आग भी तुम ही हो, सीटी भी तुम ही हो। और कई बार तुम कहते हो, “मैं उसमें से कुछ भी नहीं निकलने दूँगा। मैं उसमें से थोड़ा भी अगर बाहर निकलने दे रहा हूँ, कुछ अगर उसमें से लीक कर गया, स्राव कर गया तो इससे तो मेरे संयम का नाश हो जाता है।”
सीटी भी तुमने बंद कर दी। अब क्या होगा? क्या होगा? फटोगे। तो ज़्यादातर यही होता है, लोकधर्म में फटते हैं, उसको बोलते हैं पाखंड। क्योंकि सबके सामने फटोगे, तो फिर बेइज़्ज़ती होती है, तो फटा जाता है एकांत में, अंधेरे में, बंद कमरों में फटा जाता है। तो वो नहीं होने देना है, पाखंडी थोड़ी बनना है कि ऊपर-ऊपर कुछ बोल रहे हैं, अंदर-अंदर कुछ चल रहा है, संयम अपने आप हो जाता है। आप जिसको जान जाते हो, चीज़ को, उसके बाद सही रास्ता अपने आप खुल जाता है। ठीक है।
प्रश्नकर्ता: थैंक यू।
प्रश्नकर्ता: सर, ऐज़ वी नो इन द रियल्म ऑफ़ फिलॉसफी। मेनी ऑफ़ द ग्रेटेस्ट इंटेलेक्चुअल्स हैव व्यू दिस वर्ल्डली प्लेन ऐज़ एन इल्ल्यूजन एंड अ फ्लेटिंग शैडो ऑफ़ अ डीपर रियलिटी। सो इफ एवरी सोल इज़ डेस्टिन्ड टू ट्रांसेंड दिस मटेरियल एक्ज़िस्टेंस बाय ओवरकमिंग द नेचुरल टेंडेंसी।
आचार्य प्रशांत: हु? एवरी सोल इज़ डेस्टिन्ड टू ट्रांसेंड दिस मटेरियल प्लेन। व्हेयर इज़ दिस कमिंग फ्रॉम? चैट जीपीटी?
प्रश्नकर्ता: सर, बट अद्वैत बोलता है कि हम लोग तत्त्वमसि हैं। मींस, हम लोग पहले ही से उस परफेक्शन पर रीच कर चुके हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं, नहीं, नहीं। कर चुके हैं? कोई टाइम में प्रोसेस थोड़ी कि हिस्टोरिकली रीच कर चुके हैं।
तत्त्वमसि का मतलब यही है प्रज्ञानम ब्रह्म। *दैट व्हिच इज़ द प्युरेस्ट। दैट व्हिच इज़ फ्री ऑफ़ ऑल कंडीशनिंग। दैट्स व्हाट यू रियली आर, एंड दैट्स व्हाई, तत्। नथिंग एल्स। बिकॉज़ दैट सो प्योर, यू कैन नॉट इवन अकॉर्ड अ नेम टू इट। यू कैन नॉट इवन अकॉर्ड अ नेम टू इट। ओनली पॉइंट टू इट एंड से—“दैट।” दैट तत्त्वमसि श्वेतकेतु। दैट्स व्हाट यू आर। और इफ आई इवन गिव अ नेम, देन दैट इज़ करप्टेड। दैट डज़ नॉट मीन कि यू आर हिस्टोरिकली द प्योर आत्मन् एंड समथिंग। नो, नो, नो। इट्स अ मैसिव।
प्रश्नकर्ता: सर तो मेरा ये सवाल था कि अगर हम लोग सारे नेचुरल टेंडेंसीज़ को ट्रांसेंड ही करना चाहते हैं, जैसे *ग्रेट, जेलसी ट्रांसेंड।
आचार्य प्रशांत: ट्रांसेंड माने क्या? डिफ़ाइन करो पहले।
प्रश्नकर्ता: मींस,* हम लोग उसको रेसिस्ट करना चाहते हैं।
आचार्य प्रशांत: नहीं। अभी मैंने बोला था ना, कंट्रोल जैसे शब्दों का विधान में कोई स्थान नहीं है। तो रेजिस्ट कहाँ से आ गया? कंट्रोल और रेजिस्ट तो एक ही डायमेंशन के वर्ड हैं। हमें कुछ भी रेजिस्ट नहीं करना है।
बोधः अहम्, मेरा स्वभाव जानना है, नियंत्रण करना नहीं।
मुझे किसी के पीछे लठ ले कर नहीं दौड़ना कि लस्ट कहाँ से आ गई। मैं तो ब्रह्मचारी हूँ, मुझे वीर्य रक्षा करनी है। ये सब लोकधर्म में चलता है, रेजिस्ट करना, रोकना। वेदांत में ये सब नहीं होता। वेदांत कहता है, मैं जान गया। जो ठीक नहीं होगा, वो अपने आप रुक जाएगा। मैं जान गया। मेरे जानने से जो उचित होगा, वो स्वयमेव होगा। मेरा काम नहीं है एनफोर्स करना, मेरा काम है जानना। और जानने के फलस्वरूप फिर जो कर्म होता है, मुझे उसको बाधित नहीं करना है, मुझे अकर्ता रहना है। कर्म किससे होगा? बोध से होगा। मैं कुछ अच्छा कर तो नहीं सकता, पर मैं इतना होनहार हूँ कि कुछ अच्छा हो रहा हो, उसको रोक ज़रूर सकता हूँ। मेरी न्यूसेंस वैल्यू तगड़ी है।
वेदांत कहता है, तुम हट जाओ। हट जाओ अपने रास्ते से हटो। * यू आर द डिफरेंस बिटवीन यू एंड योरसेल्फ। यू आर योर ओन वर्स्ट एनिमी।* तुम अपने रास्ते से हटो। वेदांत नहीं कहता अपने लिए कुछ अच्छा करो। वेदांत नहीं कहता कि तुम महान बन के दिखाओ। वेदांत कहता है, अपनी शूद्रताओं को देखो, तुम लीचड़ हो। और अगर तुम अपना लीचड़पन हटा दो, तो महान तो तुम हो ही तत्वमसि।
तुम्हें महान बनना नहीं है। बिकमिंग की बात नहीं है। वहाँ नहीं जाना है। जिसको लोकधर्म कहता है कि आकाश में बैठा है, वेदांत कहता है वो तुम्हारे हृदय में स्थापित है। तुम्हें कहीं नहीं जाना है। हाँ, तुमने उसके चारों ओर बहुत कचरा भर रखा है। और उस कचरे से तुम आईडेंटिफाइड हो गए हो। तुम्हारा जो नकली मैं है, वो उस कचरे से तदात्म्य कर चुका है। तुम्हारा काम है वो कचरा हटाना, और हटाना भी ऐसे नहीं कि ऐसे हटाना (सफ़ाई करके)। ऐसे हटाना, देख के हटाना।
तुम्हारी दृष्टि ही अग्नि है, जो तुम्हारे सब मान्यताओं और भ्रमों को भस्मीभूत कर देती है।
देखने मात्र से मुक्ति हो जाती है अगर तुम्हारे देखने में सच्चाई है। इसलिए वेदांत एक बड़ी कड़ी शर्त माँगता है न, सच्चाई, ऑनेस्टी, सत्य निष्ठा। वो होती नहीं है। तो इसलिए हमने कहा कि कभी भी वेदांत, एक बहुत छोटे मिश् से आगे नहीं बढ़ पाए। और शायद अब बढ़ जाए। आपके ऊपर है, आप बढ़ाओ तो।
तो भाई, मेरा वेदांत से आशय ये नहीं है कि कोई पुरानी चीज़ है, जिसको आज कल्ट या क्रीड की तरह बढ़ाना है। वेदांत शब्द ही हटा दो। मैंने जहाँ-जहाँ कहा था वेदांत, उसको कंट्रोल एफ कर दो। और फिर वहाँ पर सब्सटीट्यूट कर दो, सेल्फ इंक्वायरी। सेल्फ इंक्वायरी — वो ज़्यादा नॉन-पार्टीशन लगेगा।
क्योंकि हुआ क्या है न? कि बहुत सारी गड़बड़ चीज़ें हैं, जिनके साथ वेदों का संबंध जुड़ गया है। और वेदांत में भी वेद शब्द आता है, तो उसकी वजह से ट्रिगर हो जाते हैं लोग। और मैं उससे समझता हूँ। आई काइंड ऑफ़ एमथाइज विद दैट। तो वेदांत शब्द भी आवश्यक नहीं है। व्हाट्सेंट इज नोइंग वनसेल्फ। अब उसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए न। ख़ुद को जानने में क्या समस्या है?
प्रश्नकर्ता: सर, तो नेचर ने हम लोग को ऐसा डिजाइन ही क्यों किया?
आचार्य प्रशांत: ये है ना बात। देखो, असली प्रॉब्लम है कि हम पैदा ऐसे हुए क्यों? कि हम पैदा ही ऐसे क्यों होते हैं? तो इसीलिए अब तुम्हें समझ में आएगा कि ये जो दुनिया भर के श्लोक होते हैं, जो कहते हैं, “भवसागर पार करना है।” और ये जो आवागमन है। शंकराचार्य ने बोला था ना कि “बार-बार मरे, बार-बार आए।” ये क्या चल रहा है। नालायकी में कहाँ फंस गए?
वो इसीलिए, क्योंकि हर बच्चा जो पैदा होता है, वो पैदा ही होता है बेवकूफ़। और ये कोई किसी के सब्जेक्टिव इंटरप्रिटेशन की या ओपिनियन की बात नहीं है। बच्चा पैदा होता है। आपको दिखाई देता है उसकी स्थिति क्या है? कितना उसको ज्ञान है? क्या वो अपनी स्थिति को समझता है?
और इतना ही नहीं, वो पूरे तरीकक़े से परनिर्भर होता है। उसकी चड्डी भी गीली हो जाए, तो वो नहीं बदल सकता। आप तो कम से कम हाथ बढ़ा के खाना उठा के खा सकते हो। वो तो माँ को, माँ नहीं आई, तो भूखा पड़ा रहेगा। ताक़त कुछ होती नहीं है। हाथ-पाँव में कोई जान नहीं होती है। भाषा भी नहीं होती उसके पास, विचार नहीं होता उसके पास। ऊपर पंखा घूम रहा हो, बिल्कुल नहीं जान सकता कि ऊपर क्या घूम रहा है।
माँ-बाप, दुनिया भर के जो कांसेप्ट्स हैं, वो कुछ नहीं समझता। हाँ एक चीज़ उसके पास भरपूर होती है। क्या? फिजिकल कंडीशनिंग। पेट बजाएगा, भूख लगी, भूख लगी। ठंडी लगेगी, गर्मी लगेगी। जानवर का बच्चा, कम से कम, कपड़ा नहीं माँगता। हम, इवोल्यूशन में ऐसे हो गए हैं कि हमें कपड़ा ना मिले, तो मर जाएँ। छोटे बच्चे को आप कपड़ा नहीं दीजिए, तो वो कभी गर्मी से, जाड़े से, किसी न किसी चीज़ से मर जाएगा।
जानवर के बच्चे को कपड़ों के बिना ही मौज में आ जाती है। गाय का बच्चा पैदा होता है। कितनी देर में वो खड़ा हो जाता है? किसी ने कहा, गाय रखी हो, देखी हो कभी? ऐसे ही जानता हो।
श्रोता: कुछ घंटों में।
आचार्य प्रशांत: खड़ा हो जाता है, थोड़ी देर में। और वो माँ से स्वतंत्र भी कितने समय में हो जाता है? और आप इंसान के बच्चे को देखिए। उसे चलने में कितना समय लग जाता है?
श्रोता: 4-5 साल।
आचार्य प्रशांत: भाषा कितने समय में सीखता है? और मानसिक तौर पर हम कब कहते हैं कि उसकी शिक्षा पूरी हो गई? कितने साल के हो, भाई, आप?
प्रश्नकर्ता: सर, ट्वेंटी।
आचार्य प्रशांत: किसी जानवर को उसकी ज़िंदगी का लगभग एक-चौथाई देना होता है अपनी शिक्षा में। और एक-चौथाई हम तब मान रहे हैं, जब पूरे सौ साल जियो। नहीं तो एक-तिहाई कोई जानवर देता। हम इतने बुरे तरीक़े से परनिर्भर जीव हैं। प्रकृति ने हमें ऐसा पैदा किया है।
तो इसलिए, फिर समझने वालों ने काव्यात्मक तरीक़े से, एज अ यूफिमिज़्म कहा कि पहली माया तो जन्म लेना ही है। और जब कोई आकर बहुत रोता था, उनके पास सफरिंग है, दुख है, “हाय हाय, ये हो गया, वो हो गया, लड़का मर गया, दौलत छीन गई, ऐसा हो गया।” बीमारियों से बहुत लोग मरते थे। क्यों हो रहा है ये सब? तो पहले तो समझाया, उसके बाद भी वो छाती पीट रहा है। तो उससे कहा जाता था, “पैदा काहे को हुए? अगर दुख चाहिए ही नहीं था, तो पैदा क्यों हुए?” अभी सुनने में विचित्र बात लगेगी। कोई अपनी मर्जी से पैदा हुआ था?
तो संत कबीर उसे बोलते हैं, “देह धरे का दंड है। जो धरे, सो रोए।” ये जो तुम्हें दुख मिल रहा है, वो एक तरीकक़े से फंडामेंटली देह धरने का दंड है। फिर आगे बोलते हैं कि भुगतेंगे तो सभी, लेकिन भुगतने-भुगतने में अंतर होता है। सुंदरता देखिए वक्तव्य की। ज्ञानी भुगते ज्ञान से, और मूर्ख भुगते रोए। देह धरे का दंड है, जो जन्मे, सो होए। और ज्ञानी भुगते ज्ञान से, मूर्ख भुगते रोए।
देह धरे का दंड है, सब काहू को होय। ज्ञानी भुगते ज्ञान से, अज्ञानी भुगते रोय।।
तो आप पैदा हुए हो, तो ये जो उसके साथ एसोसिएटेड सिचुएशंस हैं, कंडीशंस हैं, वो तो रहेंगी ही। सबके लिए रहती हैं। अज्ञानी के लिए भी, ज्ञानी के लिए भी। लेकिन अज्ञानी रो-रो के भुगतता है, और ज्ञानी ज्ञान में उसका साक्षी हो जाता है। हाँ, ये सब चल रहा है। क्या करें? चलता ही है।
इतने बड़े-बड़े ज्ञानी हुए हैं, कैंसर से मरे हैं। अभी हमारी पिछली शताब्दी में जो दो हम बड़े मूर्धन्य व्यक्तित्व लेते हैं—रमण महर्षि हो गए और रामकृष्ण परमहंस हो गए। दोनों कैंसर से गए थे। विवेकानंद तो पता नहीं कितनी बीमारियाँ थीं। और पीछे आप जाइए—गौतम बुद्ध हैं, महावीर हैं। वो दोनों भी मात्र वृद्धावस्था से नहीं गए, वे भी बीमारी से गए थे।
तो जिसने देह धरी है, उसको ये सब होता है, और इसका हम कुछ कर नहीं सकते। ये फंडामेंटल ह्यूमन कंडीशन है। तो ये कहना कि ऐसा है ही क्यों? बस है। हम पैदा हुए हैं इसलिए है, यही आंसर है। हम पैदा हुए हैं, इसलिए है।