आचार्य प्रशांत: विषय-वासना, विषय माने ऑब्जेक्ट। जब भी आप विषय बनते हो तो आप किसी चीज़ को वस्तु बना देते हो। विषय और वस्तु बनने का मतलब ही यही होता है कि आप अधूरे हैं, कुछ है जो बाहर है और आपसे अलग है। अलग होने का अर्थ ही यही है न कि मैं अधूरा हो गया। विषय जहाँ है, वहाँ वासना रहेगी ही – वासना, ‘पूरा होने की’। हर वासना ‘पूरा होने’ की वासना है। वासना का अर्थ ही यही है कि मुझे पूरा होना है, पूरा होना है!
वास करने का अर्थ समझते हैं? रहना। वासना – जो आपके होने में ही समाहित है; रहती है वो, आप हैं तो रहती है। आप जब तक हैं, तब तक ये चाह रहेगी ही कि कुछ मिल जाए। क्योंकि जो बाहर है वो आपसे अलग है नहीं, आप दीवाल तो नहीं हो न, दीवाल का आकर्षण रहेगा — आकर्षण रहेगा, विकर्षण रहेगा — कोई न कोई इस तरह का सम्बन्ध रहेगा, इसी का नाम वासना है। वासना का मतलब वो है जो आपके होने में ही निहित है। ‘विषय’ का होना ही वासना है। आप कुछ हो, तो विषय होगा। जहाँ विषय होगा, वहाँ वासना होगी।
प्रारब्ध कर्म; कर्मो को दो-तीन तरीकों से बांटा गया है, उनमें से एक प्रारब्ध कर्म है। सही बात तो यह है कि जितने कर्म होते हैं, वो सब प्रारब्ध कर्म ही होते हैं।
प्रारब्ध कर्म का जो दृष्टांत दिया जाता है शास्त्रों में, वो यह है कि तीर चला दिया, और चलाते ही याद आया कि गलत चला दिया है। गलत दिशा में, गलत लक्ष्य पर चला दिया है, पर अब उस तीर को रोक नहीं सकते। वो जा कर के निशाने पर लगेगा ही, यह प्रारब्ध कर्म है। कर दिया है, तो अब तो परिणाम भुगतना पड़ेगा। भले ही पता चल गया करते ही कि गलत हो गया, पर अब परिणाम भुगतना पड़ेगा। जैसे कि कुछ लोग आते हैं कि समझ में तो आ गया कि गड़बड़ हो गयी है, पर अब ये दो छोटे- छोटे बच्चे हैं, इनका क्या करें?
(श्रोतागण हँसते हैं)




