असल में नकली ग्रंथ को, या नकली साधक को, या नकली आध्यात्मिक गुरु को पहचानने का ये एकदम रामबाण तरीका है। ये देखो कि उसका साइंस, विज्ञान के प्रति रुख क्या है। जिस स्पिरिचुअल (आध्यात्मिक) ग्रंथ में, या टीचर में साइंस के लिए इज़्ज़त न हो, वो आदमी साइंस को ही नहीं स्पिरिचुअलिटी को भी इज़्ज़त नहीं देता। अगर आपको कोई स्पिरिचुअल लीडर मिला जो साइंस का मज़ाक उड़ाता है, या साइंस के महत्व पर ज़ोर नहीं देता, तो वो आदमी साइंस ही नहीं स्पिरिचुअलिटी से भी अनभिज्ञ है। उसको पूरी तरह हटाओ।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। आचार्य जी, हम सब आपकी सेहत को लेकर काफ़ी चिंतित हैं। तो आप कैसे हैं अभी?
आचार्य प्रशांत: तुम्हारे सामने बैठा हूँ, बात कर रहा हूँ, कैसा हूँ? क्या प्रश्न है? अगर खराब हो जाऊँगा तो सामने नहीं आऊँगा। जब तक सामने आ रहा हूँ तो ठीक ही है। कोई इसमें ऐसी दिक्कत की बात नहीं है।
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, मेरा जो सवाल है, जो मेन सवाल, वो जो हमारे जन-सामान्य सब लोग हैं, उनसे काफ़ी रिलेटेड (संबंधित) है। ये सवाल इस प्रकार है कि क्या जो ये काला जादू या जो काली शक्तियाँ जिसकी बात हम करते हैं, क्या ये सही में एग्ज़िस्ट (अस्तित्व) करती हैं? जैसे कि किसी इंसान के ऊपर काफ़ी वशीभूत हो जाना, या किसी आदमी को ज़िंदा लाश बना देना, या किसी लाश को ज़िंदा आदमी बना देना।
आचार्य प्रशांत: इस पर कई बार बात की है न? प्रकृति के नियमों में बेटा, कोई नहीं छेड़-छाड़ कर सकता। लोहे को जिस स्थिति में और जिस प्रक्रिया से जंग लगता है, वो लगेगा ही। ये नियम है प्रकृति का। उसमें ये थोड़े ही होता है कि कभी ऐसा होगा, कभी वैसा होगा। बँधा हुआ ठोस नियम है, ऐसा होगा तो ऐसा ही होगा। वैसे ही शरीर भी भौतिक है, उसके भी अपने नियम हैं। उन नियमों को कोई नहीं बदल सकता।




