प्रश्नकर्ता: भगवान श्री प्रणाम। आप कह रहे हैं कि जैसे मन घेरा है, अहम् केन्द्र है। तो अपने अन्दर तो कुछ नहीं दिखता, विचार तो दिख रहे हैं, कि विचार है, वस्तु से सम्बन्ध है, व्यक्तियों से सम्बन्ध है। तो क्या ये विचार ही कन्डैन्स्ड (घनीभूत) होकर अहम् है? ये जो सब सम्बन्ध, उसका अलग कोई अस्तित्व नहीं है, मतलब उस घेरे का, जो नॉट (गाँठ) हो गयी, जिसको कृष्णमूर्ति साहब कहते हैं, ‘इट इज़ अ नॉट ऑफ़ मेमोरी‘ (ये स्मृति की एक गाँठ है)।
आचार्य प्रशांत: एकदम ठीक! वास्तव में अगर आप उस घेरे को संकुचित करते जाएँ, करते जाएँ, तो भीतर जो बैठा है, जो केन्द्र पर है, उसका दम घुट जाएगा, वो जी नहीं पाएगा। इसीलिए तो वो अपने घेरे को और ज़्यादा विस्तृत करता रहता है न। हम अपनी ज़िन्दगी में और-और चीज़ें क्यों भरते रहते हैं, और ज़िन्दगी से कुछ भी निकालना मुश्किल क्यों पड़ता है, देखा है?
कभी कोई बोलता है कि मुझे अनासक्ति की समस्या है? सुना है, कि मुझे समस्या ये है कि मैं बहुत डिटेच्ड (अनासक्त) हूँ? समस्या हमेशा क्या होती है? कि भर लिया, भर लिया, और जो भर लिया फिर उसे बाहर नहीं फेंक पा रहे। भरने को हम आतुर रहते हैं, कभी ग़ौर तो करा करिए क्यों। क्योंकि जितना तुम भर रहे हो मन के घेरे में, उतना ज़्यादा मन को प्राण दे रहे हो।
और मन को तो प्राण चाहिए न, वो जीना चाहता है; कौन? जो मन के बीचों-बीच है। वो सामग्री माँगता है - ‘और दो सामग्री, और दो सामग्री।‘ जितनी चीज़ों को वो छू सकता है, जितनी चीज़ों का वो अनुभव कर सकता है या विचार कर सकता है, वो हर चीज़ उसके प्राण के लिए उपयोगी हो जाती है। उसके पास से चीज़ें हटा दोगे, तो फिर उसके पास कुछ नहीं बचता, उसके पास फिर जो आख़िरी विषय बचता है जीने के लिए, वो है ‘मैं’ ही।
और वो फिर अहम् की आख़िरी अवस्था होती है जब अहम् के पास जुड़ने के लिए, सम्बन्धित होने के लिए कुछ नहीं बचता, तब वो अवस्था आ जाती है जिसको बोलते हैं ‘मैं’ — मैं,




