ज़िंदगी में जब ऊँचाई के लिए आकर्षण आ जाता है, लगाव-झुकाव आ जाता है, जिसको हम इश्क़ बोल रहे हैं, वास्तविक प्रेम बोल रहे हैं, तो फिर मेहनत अपने आप हो जाती है। तो मेहनत बहुत ज़रूरी है, पर अंधी मेहनत हमें सिर्फ़ गधा बनाती है। अंधी मेहनत से बचो, पर मेहनत से मत बचो। मेहनत तो करनी पड़ेगी। पर मेहनत ऐसे ही मत करने लग जाना कि कहीं भी लग गए, मेहनत किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं। नहीं-नहीं, ये मत करने लग जाना।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
आचार्य प्रशांत: जवान आदमी को मजबूरी एकदम शोभा नहीं देती, एकदम। मजबूरी किसी को भी शोभा नहीं देती, पर ख़ासकर मैं जवान आदमी की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आपके ऊपर तो न अभी आर्थिक कोई बंधन है, न आपके ऊपर अभी देह की बीमारी का बोझ है, न आप किसी अन्य तरीक़े से दबे हुए हो। तो आपकी मजबूरी तो बस एक जगह से आती है — मान्यता।
कुछ बातें ऐसी मान रहे हो जो आपको परेशान करे हुए हैं। और उनके कारण ही आपकी ऊर्जा अभिव्यक्ति नहीं पा रही है।
उनके कारण ही आपको बहुत दबा-कुचला सा, बहुत संकुचित जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ रहा है। तो मैं कहा करता हूँ कि अपनी मजबूरियों को परखो तो सही, और पूछो अपने आप से, इज़ इट नेसैसरी? है तो, पर क्या आवश्यक है?
मैं नहीं कह रहा हूँ कि काल्पनिक है मजबूरियाँ आपकी। लगती हैं आपको, तो होंगी। पर क्या ज़रूरी है? आवश्यक है? अब आवश्यक में भी फँस जाओगे, कई लोग कह देंगे, आवश्यक तो सब्जेक्टिव होता है। हमें लगता है आवश्यक है। तो अब मैं उसको और, क्या अनिवार्य है? इज़ इट कंपलसरी? और अगर नहीं है, तो यह देखो कि आपकी मजबूरी फिर आपका चुनाव है। जो चीज़ अनिवार्य नहीं है, पर है, इसका मतलब, वो चुनी गई है। चुनी गई है न? तो जो आप चुन करके जीवन में ला सकते हो, उसको आप चुन करके?




