जवान आदमी को मजबूरी शोभा नहीं देती

Acharya Prashant

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जवान आदमी को मजबूरी शोभा नहीं देती
ज़िंदगी में जब ऊँचाई के लिए आकर्षण आ जाता है, लगाव-झुकाव आ जाता है, जिसको हम इश्क़ बोल रहे हैं, वास्तविक प्रेम बोल रहे हैं, तो फिर मेहनत अपने आप हो जाती है। तो मेहनत बहुत ज़रूरी है, पर अंधी मेहनत हमें सिर्फ़ गधा बनाती है। अंधी मेहनत से बचो, पर मेहनत से मत बचो। मेहनत तो करनी पड़ेगी। पर मेहनत ऐसे ही मत करने लग जाना कि कहीं भी लग गए, मेहनत किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं। नहीं-नहीं, ये मत करने लग जाना। यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।

आचार्य प्रशांत: जवान आदमी को मजबूरी एकदम शोभा नहीं देती, एकदम। मजबूरी किसी को भी शोभा नहीं देती, पर ख़ासकर मैं जवान आदमी की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आपके ऊपर तो न अभी आर्थिक कोई बंधन है, न आपके ऊपर अभी देह की बीमारी का बोझ है, न आप किसी अन्य तरीक़े से दबे हुए हो। तो आपकी मजबूरी तो बस एक जगह से आती है — मान्यता।

कुछ बातें ऐसी मान रहे हो जो आपको परेशान करे हुए हैं। और उनके कारण ही आपकी ऊर्जा अभिव्यक्ति नहीं पा रही है।

उनके कारण ही आपको बहुत दबा-कुचला सा, बहुत संकुचित जीवन जीने पर मजबूर होना पड़ रहा है। तो मैं कहा करता हूँ कि अपनी मजबूरियों को परखो तो सही, और पूछो अपने आप से, इज़ इट नेसैसरी? है तो, पर क्या आवश्यक है?

मैं नहीं कह रहा हूँ कि काल्पनिक है मजबूरियाँ आपकी। लगती हैं आपको, तो होंगी। पर क्या ज़रूरी है? आवश्यक है? अब आवश्यक में भी फँस जाओगे, कई लोग कह देंगे, आवश्यक तो सब्जेक्टिव होता है। हमें लगता है आवश्यक है। तो अब मैं उसको और, क्या अनिवार्य है? इज़ इट कंपलसरी? और अगर नहीं है, तो यह देखो कि आपकी मजबूरी फिर आपका चुनाव है। जो चीज़ अनिवार्य नहीं है, पर है, इसका मतलब, वो चुनी गई है। चुनी गई है न? तो जो आप चुन करके जीवन में ला सकते हो, उसको आप चुन करके?

श्रोता: हटा सकते हैं।

आचार्य प्रशांत: हटा भी तो सकते हो न। तो देखो कि जो भी आपको तकलीफ़ें हैं, दुख हैं, विषमताएँ हैं, वो आपके चुनाव हैं। और वो ज़िंदगी में आपकी तभी तक हैं जब तक आप उनको पाल-पोस रहे हो, दाना-पानी दे रहे हो। हम अपनी तकलीफ़ों को, अपनी कमजोरियों को ख़ुद ही पोषण देते हैं। जिस दिन तुम अपनी कमजोरियों को, मजबूरियों को दाना-पानी देना बंद कर दोगे, उस दिन ताक़त अपने आप प्रकट हो जाएगी। बाहर आएगी।

वेदांत कहता है — ताक़त बाहर से कहीं नहीं खोजनी पड़ती, ताक़त तो स्वभाव है, सब ताक़तवर हैं। यहाँ कोई नहीं बैठा है जिसमें ताक़त नहीं है, ताक़त स्वभाव है। लेकिन ताक़त के ऊपर झूठ-मूठ की कमजोरी, मान्यता हमने पकड़ रखी होती है ज़बरदस्ती। जिस दिन जो पकड़ रखा है कमजोरी बनाकर, उसको छोड़ देते हो, उस दिन वह जो ताक़त है, वह उद्भूत हो जाती है, मैनिफ़ेस्ट करने लग जाती है अपने आप को।

लेकिन हम उल्टा करते हैं, जवान लोग भी, दूसरे लोग भी। हम कमजोरी पकड़े-पकड़े बाहर कहीं ताक़त खोजने निकल पड़ते हैं। कमजोर तो रहेंगे, कमजोरी पकड़ रखी है अपनी। बड़ी प्यारी लगती है कमजोरी। मजबूरियों में बड़ी सुविधा लगती है, ऐसे थोड़ी मजबूरियाँ पकड़ी जाती हैं, उनसे कुछ सुविधा मिल रही होती है। तो वह सब तो पकड़ रखा है। लेकिन साथ ही साथ ताक़त भी चाहिए, ताक़त चाहिए तो आप क्या करेंगे? बाहर जाकर ताक़त खोजेंगे। कहेंगे, आई विल बी एन अचीवर। आई विल गो आउट एंड बी स्ट्रॉन्ग। बाहर कुछ नहीं मिलेगा।

जो भीतर अपनी दुर्बलता झूठ-मूठ ज़बरदस्ती पकड़ रखी है, उसको ग़ौर से देखो। और देखो कि विकल्प है उसको छोड़ने का, छोड़ दो। यही है।

प्रश्नकर्ता: बहुत सुंदर बात आपने कही है, और आपकी बातों को आगे बढ़ाते हुए दो लाइनें मुझे याद आ रही हैं। ख़ासतौर से युवाओं के लिए, कि “तकाज़ा है वक़्त का कि तूफ़ान से जूझो। कहाँ तक चलोगे किनारे-किनारे।” तो ज़िंदगी में जब भी इस तरह की विपरीत परिस्थितियाँ आएँ, जब लगे कि यह राह बहुत कठिन नज़र आती है, आपके ख़ुद के भीतर का आत्मविश्वास ही आपको लेकर जाएगा। कोई कितना भी देखिए, जो भी सफल व्यक्ति है, कोई आपकी जान-पहचान का हो सकता है, कुर्सी पर ले जाकर थोड़ी देर के लिए बिठा दे। लेकिन वहाँ पर बैठे रहने के लिए तो आपको योग्य होना पड़ेगा, और वो योग्यता आपको ख़ुद के भीतर से लेकर आनी पड़ेगी। वो क्रिएट नहीं की जा सकती, उसके लिए आपको ख़ुद मेहनत करनी होगी।

अच्छा, अब मेहनत शब्द का मैं इस्तेमाल कर रही हूँ, तो मेहनत करने से आज का युवा पता नहीं क्यों भागता है। एक तो यह मोबाइल, मतलब बहुत अच्छी चीज़ है, हमारा भी सारा काम हमें इसी मोबाइल पे होता है। देश के किसी कोने में रहें, विदेश में रहें, कहीं पर भी। लेकिन मोबाइल एक तरीक़े से हमारे जीवन का अहम हिस्सा है, तो बहुत सारी चीज़ें हमसे छीन भी लेता है।

मैं अभी प्रयागराज कुंभ से आ रही हूँ। आज सुबह-सुबह ही मैं वहाँ से लौटी हूँ। तो कल रात को तक़रीबन 1:30 बजे के आसपास मैं अलग-अलग हिस्सों में प्रयागराज में जाकर देख रही थी। तो मैंने देखा कि रात में जो छोटी-छोटी दुकानें थीं, उनको हटा दिया जा रहा है भारी भीड़ की वजह से। रात में वो लोग दुकानें लगा रहे हैं और लोग कम आते हैं रात में ख़रीदारी के लिए। तो ज़्यादातर लोग वहाँ पर बैठकर मोबाइल में कोई लूडो खेल रहा है, कोई यूट्यूब देख रहा है, कोई अलग सोशल मीडिया पर है।

तो मुझे देखकर वो बहुत अच्छा लगा कि चलो। लेकिन जब ऑनलाइन क्लासेस होती हैं, तो पता चलता है, 15 मिनट बच्चा ऑनलाइन क्लास कर रहा है, 15 मिनट वो गेमिंग खेल रहा है। या इन्हीं लोगों में 15 मिनट ये कुछ पढ़ाई कर रहे हैं और 15 मिनट जाकर सोशल मीडिया झाँक लेते हैं। तो इसमें सुधार कैसे लेकर आया जाए? और सोशल मीडिया के ज़माने में क्या आपको लगता है कि कितना वक़्त उस पर गुज़ारना चाहिए और कितना उससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए?

आचार्य प्रशांत: अच्छा, जो पहला हिस्सा था आपकी बात का, वो मेहनत को लेकर के था। कि आज का युवा मेहनत से क्यों कतराता है? वह इसलिए कतराता है क्योंकि जिनको उसने मेहनत करते देखा है, उनको बिल्कुल बिना दिमाग़ की मेहनत करते हुए देखा है।

भारतीय आदमी बहुत मेहनत करता है, आज भी। मैं बिल्कुल वो जो जेनज़ी है, उनकी नहीं बात कर रहा। पर जो आम भारतीय है, बहुत मेहनत करता है। दिन भर खटता है। पर जो आज का लड़का है, लड़की है, वो जब उन लोगों को देखते हैं तो कहते हैं, ये इतनी मेहनत कर रहा है, इसको मिल क्या रहा है? तो ये जो मेहनतकश लोग हैं, ये फिर जवान लोगों के आदर्श तो नहीं बन पाते और बनना भी नहीं चाहिए। क्योंकि जो मेहनत कर रहा है, वो अंधी मेहनत कर रहा है। वो शायद इतनी मेहनत कर इसलिए रहा है क्योंकि वो सही काम का ख़तरा नहीं उठाना चाहता। तो वो कहता है कि एक सुरक्षित काम करूँगा, भले ही उसमें दिन भर गधे की तरह खटना पड़े।

अब गधा भी बहुत मेहनत करता है। कोई गधे को क्यों आदर्श बनाएगा, भले ही गधा बहुत मेहनती हो। तो एक ओर पर तो ऐसे लोग हैं जो मेहनती हैं पर जिनकी मेहनत अंधी मेहनत है। उस मेहनत में कोई बोध नहीं है। और दूसरी ओर उसने देखा है कि सफल वो सारे लोग हैं जिन्होंने कभी कोई मेहनत करी ही नहीं, बस चालाकियाँ करी हैं, बस झूठ बोले हैं। वो एकदम सफल हैं। और बहुत-बहुत जगहों पर, यहाँ भी, वहाँ भी, भारत में भी, दुनिया में भी, बिल्कुल शीर्ष पर बैठ गए हैं। बहुत कम मेहनत करके और बहुत ज़्यादा चालाकियाँ करके और ये सब करके।

दोनों ही स्थितियों में जवान आदमी कहता है, मेहनत करके क्या मिलेगा? हम इनको भी देख रहे हैं जो मेहनत करते हैं और मेहनत करके बस गधे बने। और हम उनको भी देख रहे हैं जो मेहनत नहीं करते हैं और मेहनत न करके, सब तरह की कुटिलताएँ करके, वो शीर्ष पर पहुँच गए। तो कहते हैं, मेहनत मैं भी नहीं करूँगा।

लेकिन जानने वालों ने जो हमें समझाया है, वो बात न इधर की है, न उधर की है। वो बात कुछ और है। वो कहते हैं, मेहनत तो पूरी चाहिए लेकिन समझदारी के पीछे। और जो समझदारी ज्ञान से थोड़ा कतराते हो, तो कह दीजिए प्रेम के पीछे।

ज़िंदगी में इश्क़ लाओ और फिर वह कमर-तोड़ मेहनत करवा ही देगा।

हम कौन से इश्क़ की बात कर रहे हैं?

प्रश्नकर्ता: यही मुझे लगा कि क्लियर करना बहुत ज़रूरी है। वरना पता चले कि यहाँ से जाने के बाद न जाने किस राह पर ये लोग चल पड़ें।

आचार्य प्रशांत: हाँ, पता नहीं फिर कौन से इश्क़ की और कौन से कमर-तोड़ की बात कर लें ये। हम कौन से इश्क़ की बात कर रहे हैं? ये बात हो रही है पारमार्थिक तल की, कि जो भीतर बैठा हुआ है अहम्, उसका जो सच्चाई के प्रति झुकाव होता है, वो इश्क़ कहलाता है। फ़िल्मी इश्क़ की बात नहीं हो रही है, है न? जो लोक संस्कृति का प्रेम है उसकी बात नहीं हो रही है, कि मैंने तुमको दिल दे दिया है, गुलाब का फूल ले लो। उसकी बात नहीं हो रही है।

तो ज़िंदगी में जब ऊँचाई के लिए आकर्षण आ जाता है, लगाव-झुकाव आ जाता है, जिसको हम इश्क़ बोल रहे हैं, वास्तविक प्रेम बोल रहे हैं, तो फिर मेहनत अपने आप हो जाती है। तो मेहनत बहुत ज़रूरी है, पर अंधी मेहनत हमें सिर्फ़ गधा बनाती है। अंधी मेहनत से बचो, पर मेहनत से मत बचो। मेहनत तो करनी पड़ेगी। पर मेहनत ऐसे ही मत करने लग जाना कि कहीं भी लग गए, मेहनत किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं, किए जा रहे हैं। नहीं-नहीं, ये मत करने लग जाना।

इतनी प्रजातियाँ हैं दुनिया में। इंसान की अकेली प्रजाति है जो कमर-तोड़ मेहनत करती है। पशु-पक्षी कोई उतनी मेहनत नहीं करते जितना इंसान करता है। लेकिन इंसान से ज़्यादा बदहाल भी कोई नहीं है। तो बेकार की मेहनत मत करने लग जाना। खोजो कि क्या है जिसके पीछे जान भी दी जा सकती है और फिर उसके लिए जी कर दिखाओ। वो होती है असली मेहनत।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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