जब असली शिकायतें दबा देतें हैं, तब असली ही शिकायत बन जाता है || आचार्य प्रशांत (2016)

श्रोता: सर, मैं संपादन करता हूँ तो अपना पूरा काम करने के बाद, मैं फ्री हो जाता हूँ। मैं ऐसा करता हूँ कि मैं एक मिनट फ्री हो गया, उसके बाद टाइम ऑफ ले लिया। उसके बाद जब थोड़े पैसे आ जाते हैं, फिर मेरा मन ही नहीं करता कि मैं काम करूँ। मन कहता है कि बस हो गया। अब मैंनें काम पर ही नहीं आना, तो उन दिनों लगता है कि चलो काम हो गया। काम नहीं करना पर अंदर से कभी-कभी लगता है कि आपको आत्मा-परमात्मा का तो पता ही नहीं है। उसको छोड़ो। पर हाँ, इतना पता है कि शरीर है, दिमाग है, कुछ तो कर लूँ? पर रुची ही पैदा नहीं होती। करना क्या है? अच्छा, जैसे आज मैं ये करता हूँ। मैं क्यों करूँ भाई? मैं क्यों करूँ इसको? समय वर्य्थ हो रहा है। तुम्हें जो चीज़ पता है कि तुम्हारे पास शरीर है, दिमाग है, तुम उसका भी इस्तेमाल नहीं कर रहे हो?
वक्ता: गौतम (प्रश्न करता की ओर इशारा करते हुए), जब बीमार रहने की आदत पड़ जाती है न, तो स्वास्थ्य से अपरिचय हो जाता है। वो बड़ा अनजाना सा लगता है। तब उन क्षणों में तुम बैचैन हो जाओगे, जो क्षण तुम्हारे स्वास्थ्य के हैं। जो बात तुमने अभी बोली, वो परम स्वास्थ्य का द्योतक है कि हो गया। शरीर के पालन के लिए, रोटी-कपड़ा-मकान के लिए जितना पैसा चाहिये था, अभी है। तो क्यों करे और काम? और न कोई काम करना है, न ही कोई दूसरा काम करने का मन है। ये मुक्ति है और ये तुम्हें उपलब्ध है। और तुम शिकायत कर रहे हो कि ऐसा क्यों होता है?
जब असली शिकायतें हम दबा देते हैं, तब जो असली है वही शिकायत बन जाता है।
जीवन में बाकी सब नकली। उसके प्रति कोई शिकायत नहीं। और जो असली है वो शिकायत की तरह फूट रहा है। शिकायत नहीं, इसके प्रति तो धन्यवाद प्रकट करो। ये अवस्था तो अधिकाँश लोगों को नसीब ही नहीं होती कि न वो कुछ कर रहें हो, और न उनका कुछ करने का मन हो। कल मैं चर्चा कर रहा था। एक गीता उपलब्ध होती है-अजगर गीत के नाम से। अजगर जानते हैं ना? ‛अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम।’ वो अजगर की गीता है। और उसमें जो प्रणेता है, वो अजगर धर्म का पालन करता है। आप में से कुछ लोग अगर अगले सप्ताह यहाँ मिले, और आपने मुझे अगर याद दिलाया तो मैं ले आऊंगा। लानी भी नहीं है, वो शायद मैंने कुछ लोगों को भेजी है, वो आपको दे सकते हैं। और अजगर धर्म यही है-कुछ नहीं कहेंगे। वो पूरी गीता समर्पित ही इसी को है कि कुछ नहीं करेंगे क्योंकि जिन्होंने करा है ,उन्होंने भुगता है। जो बोएगा सो काटेगा। ‛हमें काटने में कोई उत्सुकता नहीं है। हमें नहीं चाहिए तो हम बोने में क्यों श्रम लगाएं? हमें कोई नया कर्म शुरू करना ही नहीं अब। पूराने ही जल जाएं, उतना काफी है। तुममें करीब करीब अजगर भाव का उदय हो रहा है।



