आचार्य प्रशांत: परेश को अक्सर लगता है कि कोई उसे चेक कर रहा है, और ये चीज़ उसे असहज कर देती है।
छोटे बच्चों की क्लास होती है, छोटे बच्चे; उनकी टीचर सामने बैठती है उनकी कॉपी वगैरह ले कर के। उनके भी एग्जाम (परीक्षा) के पेपर होते हैं, वह अपना लेकर बैठी है चेक कर रही है। अनुभव से बता रहा हूँ, बचपन में ऐसा देखा है, अनुभव भी किया है। अब उसी क्लास में एक बच्चा होता है जो बहुत खुश होता है कि उसकी कॉपी चेक की जा रही है। वो इंतज़ार कर रहा होता है। देख रहा होता है ऐसे उठ-उठ कर बार–बार कि, "मेरी वाली चेक कर रही हैं कि नहीं कर रही हैं", और फिर जैसे ही देखता है उसकी कॉपी चेक हो रही है, वो तो बहुत खुश हो जाता है।
और एक और होता है, वो मन्नत माँग रहा होता है कि, "मेरी ना चेक हो। कोई चेक ना करे मुझे।"
तो तुम्हारी समस्या ये है कि तुम चेक किए जा रहे हो या ये है कि पर्चा खराब लिखा है? क्योंकि चेक किया जाना तो बड़े गौरव की और बड़े हर्ष की बात भी हो सकती है। हम तो चाहते हैं कि हमें चेक किया जाए।
हम छोटे थे, बचपन में टीचर चेक करके स्टार बनाती थी। वन- स्टार, टू- स्टार, थ्री- स्टार… और बड़ा शौक था फाइव- स्टार लेने का। वो बनाती थीं अपना पूरा समय लेकर। (इशारों में) ऐसे बनता था, एक ऐसे त्रिभुज और फिर उसको काटकर उसपर एक और ऐसे। बड़े बड़े फाइव- स्टार, बड़ा अच्छा लगता था! जिस दिन काम अच्छे से कर रखा होता था उस दिन इंतज़ार करते थे कि हमारी कॉपी कब चेक होगी, आज फाइव- स्टार मिलेगा।
चेक होने से दिक्कत क्या है?




