उत्साह और निरुत्साह एक दूसरे की छाया है। बेईमानी हमारी ये होती है कि अचानक किसी दिन आएँगे 'आज मैं ये कर दूँगा, वो कर दूँगा।' ऊँचे-ऊँचे दावे, बड़ी-बड़ी बातें और वो बड़ी बातें हम कर ही इसीलिए रहे हैं ताकि कल से फिर कुछ न करना पड़े। जो असली आदमी होता है उसके पास एक शान्त, स्थिर, शीतल उत्साह होता है। जब उत्साह सहज बन जाए, उत्साह में जब एक सहजता हो, आपको उत्साह चाहिए ही नहीं, आपका सहज काम ही ऊर्जावान हैं।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न है कि आपने कहा था कि उत्साह में हम अधिकतर ऐसे कार्य करते हैं जो हमें बेचैनी देता है और मुक्ति से दूर ले जाता है, परन्तु अगर मैं अपने जीवन को देखती हूँ तो मैं पाती हूँ कि ज़्यादातर मैं उदासीन नहीं रह पाती हूँ। या तो मैं अति उत्साहित रहती हूँ या फिर निरुत्साहित रहती हूँ और मुझे पता होता है कि हाँ, मैं बहुत अधिक उत्साहित हूँ चीज़ों को लेकर के लेकिन मैं उसको रोक नहीं पाती हूँ और दैनिक जीवन में तो बिलकुल भी इसका अनुसरण नहीं कर पाती हूँ। तो आपके शिक्षाओं को कैसे दैनिक जीवन में, विशेष रूप से इस चीज़ का कैसे अनुकरण करूँ?
आचार्य प्रशांत: ये देखकर के कि उत्साह और निरुत्साह एक दूसरे की छाया है। उत्साहित होते ही कुछ करोगे, जो करोगे उससे वो तो मिल सकता ही नहीं है जिसके लिए करा था। तो फिर हतोत्साहित हो जाओगे। फिर हतोत्साहित होना पसन्द नहीं आएगा, तो फिर कहीं से उत्साह जुगाड़ लाओगे, फिर किसी दिशा में थोड़ा भागोगे, फिर भागकर के फिर निढाल पड़ जाओगे।
वास्तव में जो एकदम, आपसे नहीं कह रहा हूँ व्यक्तिगत तौर पर मत ले लीजिएगा कि बुरा मान जाएँ, पर बहुत सारे ऐसे बदनीयत लोग होते हैं जो क्षणिक आवेग बहुत दिखाते हैं, उनकी पहचान ही यही होती है मोमेंट्री बर्स्ट्स ऑफ़ ग्रेट एनर्जी, उत्साह का क्षणिक विस्फोट उनमें ख़ूब देखने को मिलेगा और वो विस्फोट देखने को मिलेगा तीन महीने में एक दिन। वो विस्फोट उनकी मजबूरी होता है क्योंकि तीन महीने में कुछ करा ही नहीं होता। तो फिर एक दिन जब बिलकुल पाप का घड़ा भर जाता है तो कहते हैं 'मैं ये कर दूँगा, मैं वो कर दूँगा।’ बड़ा उत्साह दिखाते हैं।




