इनोसेंस (निर्दोषता) और इग्नोरेंस (अज्ञानता) का महीन फ़र्क: नहीं समझे तो फँसे

मासूमियत में बड़ी ताकत होती है क्योंकि मासूमियत के पास कहानियाँ नहीं होती, और इसी को हम मासूमियत की परिभाषा भी कह सकते हैं। जिसके पास जीवन को देखने की सीधी-साफ़ दृष्टि है, जो देखने के नाम पर कहानियाँ प्रक्षेपित नहीं करता। हमारी तो देखने की दिशा ही विचित्र होती है। हम ऐसे थोड़ी देखते हैं कि बाहर क्या है; उसने भीतर प्रवेश किया, हमने उसको देखा। हमारी देखने की प्रक्रिया इससे उल्टी चलती है।
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आचार्य प्रशांत: मासूमियत में बड़ी ताकत होती है क्योंकि मासूमियत के पास कहानियाँ नहीं होती, और इसी को हम मासूमियत की परिभाषा भी कह सकते हैं। मासूम कौन है? इनोसेंट कौन है? निर्दोष कौन है? जिसके पास जीवन को देखने की सीधी-साफ़ दृष्टि है, जो देखने के नाम पर कहानियाँ प्रक्षेपित नहीं करता। हमारी तो देखने की दिशा ही विचित्र होती है। हम ऐसे थोड़ी देखते हैं कि बाहर क्या है; उसने भीतर प्रवेश किया, हमने उसको देखा। देखने की मासूम प्रक्रिया यही होनी चाहिए न — उधर कुछ रखा है, वो जो रखा है वो वहाँ था, फिर वो वहाँ से मेरे भीतर आया, उसकी एक छवि बनी मन में और फिर मैंने कहा कि मैं उसका अब द्रष्टा हुआ। हमारी देखने की प्रक्रिया इससे उल्टी चलती है।
कुछ बाहर थोड़ा-बहुत सा दिखाई देता है। हल्का-हल्का, धुंधलका, उसके बाद भीतर की कहानी सक्रिय हो जाती है। और जो थोड़ा-बहुत बाहर दिखाई दिया है उस पर भाव, इरादें, छवियाँ ये सब प्रक्षेपित कर देती है, आरोपित करती है, थोपती है, फॉइस्ट करना, सुपर इंपोज़ करना। नहीं समझ में आई बात?
वास्तव में, देखना ये होगा कि ये यहाँ बैठा हुआ है तो मैंने इसको देखा। मेरे भीतर पहले ही कुछ नहीं है। वहाँ (बाहर की तरफ़ इंगित करते हुए) से सूचना आई और इस पर (मस्तिष्क में) आ गई, ठीक वैसे जैसे मान लीजिए पुराने जो ऑडियो या वीडियो कैसेट्स आते थे। तो खाली कैसेट होता था, फिर उस पर रिकॉर्डिंग की जाती थी। ऐसे ही होता था न। या जैसे फोटोग्राफ़िक रील आती थी। तो खाली होती थी फिर उस पर एक्सपोज़र मारा जाता था तो उस पर छवि अंकित हो जाती थी।



