प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न डिपेंडेंस (निर्भरता) के ऊपर था कि किस तरह लड़कियों को शुरुआत से पेरेंट (अभिभावक) डिपेंडेंट (निर्भर) बनाते हैं अपने ऊपर। इसका अगर मैं उदाहरण लूँ तो मेरी बहन है, आज तक उससे टिकट नहीं बनती है ट्रेन की। हमेशा मुझे बोला जाता है कि बनाकर दे दो। और मैं नहीं बनाऊँ तो बोलते हैं कि कैसा भाई है! मैं इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से हूँ तो मैं गुड़गाँव में एक जॉब करता हूँ एमएनसी में। यहाँ भी मैं देख पा रहा हूँ कि कितना ज़्यादा डिपेंडेंट हैं लड़कियाँ छोटे-छोटे डिसीजन्स (निर्णयों) के लिए भी अपने बॉयफ्रेंड के ऊपर। और उनको लोनली (अकेला) रहना पसंद ही नहीं होता। शुरुआत से मैं देख रहा हूँ कि मेरी एक्स भी थी तो उसको हज़ार लड़के मैसेज भेजते थे दिनभर में इंस्टाग्राम पर। तो मैं देख पा रहा हूँ कि अकेली लड़कियाँ रहती ही नहीं हैं मुख्य रूप से। और हमेशा बात करने को कोई होता है तो सेल्फ रिफ्लेक्शन (आत्मचिंतन) होता नहीं है उनके अन्दर। हमेशा दूसरों के ऊपर निर्भरता रहती है।
आचार्य प्रशांत: ये सुन रही हैं न, ये बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं जो आपको एक पुरुष के मुँह से सुनने को मिल रही हैं (महिला श्रोताओं को कहते हैं)। ये जो बातें यहाँ पर एक पुरुष कह पा रहा है, बहुत कम महिलाएँ ही कह पाएँगी, क्योंकि इन्होंने कभी ये बातें ऑब्ज़र्व (अवलोकन) ही नहीं करी। अकेले नहीं रह पाते, लड़के पीछे लगे रहते हैं, तो हमेशा लड़कों का ख़याल चलता रहता है। आत्म-अवलोकन के लिए, सेल्फ रिफ्लेक्शन के लिए जो समय और जो एकांत चाहिए वह लड़कियाँ अपनेआप को देती ही नहीं हैं। सारा समय तो चला जाता है देह के ही फ़सानों में।
प्र: चैटिंग करने में लड़कों से।




