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गर्लफ्रेंड की बुरी आदत || आचार्य प्रशांत
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। मेरा प्रश्न डिपेंडेंस (निर्भरता) के ऊपर था कि किस तरह लड़कियों को शुरुआत से पेरेंट (अभिभावक) डिपेंडेंट (निर्भर) बनाते हैं अपने ऊपर। इसका अगर मैं उदाहरण लूँ तो मेरी बहन है, आज तक उससे टिकट नहीं बनती है ट्रेन की। हमेशा मुझे बोला जाता है कि बनाकर दे दो। और मैं नहीं बनाऊँ तो बोलते हैं कि कैसा भाई है! मैं इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से हूँ तो मैं गुड़गाँव में एक जॉब करता हूँ एमएनसी में। यहाँ भी मैं देख पा रहा हूँ कि कितना ज़्यादा डिपेंडेंट हैं लड़कियाँ छोटे-छोटे डिसीजन्स (निर्णयों) के लिए भी अपने बॉयफ्रेंड के ऊपर। और उनको लोनली (अकेला) रहना पसंद ही नहीं होता। शुरुआत से मैं देख रहा हूँ कि मेरी एक्स भी थी तो उसको हज़ार लड़के मैसेज भेजते थे दिनभर में इंस्टाग्राम पर। तो मैं देख पा रहा हूँ कि अकेली लड़कियाँ रहती ही नहीं हैं मुख्य रूप से। और हमेशा बात करने को कोई होता है तो सेल्फ रिफ्लेक्शन (आत्मचिंतन) होता नहीं है उनके अन्दर। हमेशा दूसरों के ऊपर निर्भरता रहती है।

आचार्य प्रशांत: ये सुन रही हैं न, ये बहुत महत्वपूर्ण बातें हैं जो आपको एक पुरुष के मुँह से सुनने को मिल रही हैं (महिला श्रोताओं को कहते हैं)। ये जो बातें यहाँ पर एक पुरुष कह पा रहा है, बहुत कम महिलाएँ ही कह पाएँगी, क्योंकि इन्होंने कभी ये बातें ऑब्ज़र्व (अवलोकन) ही नहीं करी। अकेले नहीं रह पाते, लड़के पीछे लगे रहते हैं, तो हमेशा लड़कों का ख़याल चलता रहता है। आत्म-अवलोकन के लिए, सेल्फ रिफ्लेक्शन के लिए जो समय और जो एकांत चाहिए वह लड़कियाँ अपनेआप को देती ही नहीं हैं। सारा समय तो चला जाता है देह के ही फ़सानों में।

प्र: चैटिंग करने में लड़कों से।

आचार्य: या लड़कों से चैटिंग करने में। जिसमें उनकी पूरी ग़लती भी नहीं है, लड़के ही मँडराते हैं, भँवरे आ गये। पर फिर वो उसमें मुग्ध भी बहुत हो जाती हैं, ‘भँवरे आ गये, देखो मैं कुछ तो होऊँगी, मैं कली हूँ। कली खिली है तभी तो भँवरे आये हैं, मैं कली हूँ।‘ वह उतने में ही ख़ुश हो जाती है। काहे के लिए पढ़े-लिखे, ज्ञान काहे को अर्जित करे! इतने भँवरे तो ऐसे ही आ गये, बिना ज्ञान के ही आ गये। बिना ज्ञान के अगर भँवरे आ सकते हैं तो ज्ञान का करना क्या है!

यह शर्म की बात होनी चाहिए न कि आपको साधारण काम जैसे अमेज़न पर शॉपिंग करनी न आये, आपको अपना फ्लाइट का या ट्रेन का टिकट कराना न आये। कोई साधारण सा सरकारी दफ़्तर में काम है, वह कराने के लिए आपको पति पर या ब्वॉयफ्रेंड पर या बेटे पर आश्रित होना पड़े या पड़ोसी पर, यह तो शर्म की बात है।

बहुत कम महिलाएँ होती हैं, आप सरकारी दफ़्तरों में जाओ, वहाँ पर पुरुषों की भीड़ लगी होती है, लगी होती है कि नहीं? उदाहरण के लिए, आप आरटीओ चले जाओ, वहाँ आपको पाँच प्रतिशत नहीं दिखेंगी महिलाएँ। मुझे तो समझ में नहीं आता इनके लाइसेंस कौन बनवाता है? कैसे बन जाते हैं? भाई बनवा रहे हैं लाइसेंस। तीन हज़ार रुपये एजेंट को दिये, लाइसेंस बन गया। उसको पता भी नहीं है कि आरटीओ होता क्या है। तो आप चले जाओ वहाँ पर, वहाँ पर चाहे बिल जमा कराने की बात हो या ज़्यादा बिल आ गया है उसका डिस्प्यूट (विवाद) डालना है, वहाँ आपको सब पुरुष-ही-पुरुष मिलेंगे। महिला क्या कर रही है? वह घर में बैठी हुई है। और घर में बैठोगे तो खाल तो गोरी हो ही जाएगी न। हाँ, वह निकल रहा है धूप में और धूल फाँक रहा है, लेकिन फिर इसी कारण वह स्वामी भी बन जाता है। आप घर में बैठी रहिए।

मुझे अपने बचपन से याद आ रहा है, जब मैं छोटा था तो बहुत सारे ऐसे विज्ञापन आते थे जो ज़्यादातर आये ही दोपहर के समय में, बारह से लेकर के चार बजे तक। ग्यारह बजे से शुरू होता था, चार बजे तक (चलता था)। तो उसमें जो चैनल होते थे, उनमें सब अजीब-अजीब विज्ञापन आये। और वह विज्ञापन ऐसा लगे कि किसी विक्षिप्त आदमी को टारगेट (निशाना) करके विज्ञापन बनाया गया है, एकदम लो आईक्यू (निम्न बुद्धि) के लोगों के लिए विज्ञापन बनाया गया है। मैं कहूँ, ये इतने मूर्खतापूर्ण विज्ञापन जो हैं, ये सब ज़्यादा दोपहर में ही क्यों आते हैं। रात में भी कुछ आते थे, पर ज़्यादा सब दोपहर में ही क्यों आते हैं। फिर समझ गया दोपहर में ही क्यों आते हैं।

मतलब ऐसे विज्ञापन जिसमें सीधे-सीधे उपभोक्ता को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है। और उपभोक्ता ज़रा भी समझदार होगा तो समझ लेगा कि यह विज्ञापन में जो माल बेचा जा रहा है वह ग़लत है। पर वह विज्ञापन धड़ल्ले से चल रहा है और उपभोक्ता बेवकूफ़ बन भी रहा है। और यह सारा काम दोपहर में हो रहा है ज़्यादा। मैं कहूँ, दोपहर में ही क्यों होता है ज़्यादा। वह उपभोक्ता को सीधे बेवकूफ़ बनाया जा रहा है, उपभोक्ता की कभी तारीफ़ करके, कभी कुछ बोल कर, कभी कुछ बोल कर।

उदाहरण के लिए, ‘इससे आपका रूप निन्यानवे प्रतिशत निखर जाएगा।’ नाइंटी नाइन परसेंट ऑफ़ व्हॉट (किसका निन्यानवे प्रतिशत)? अब यह परसेंटेज वग़ैरा कैलकुलेट (गणना) करना तो चौथी-पाँचवी में ही सिखा देते हैं स्कूल में। तो वह बोल रहा है इससे आपका गोरापन निन्यानवे प्रतिशत बढ़ जाएगा। मैं पूछ रहा हूँ, निन्यानवे प्रतिशत किस स्केल पर, बेस (आधार) क्या है। वह बता ही नहीं रहा। और पता चले कि इस विज्ञापन से उस माल की बिक्री भी शुरू हो गयी। तो मैं सोचूँ, जो खरीद रहा है इस माल को वह कितना बेवकूफ़ है, वह क्यों खरीद रहा है।

कौनसे लोग हैं जिनको यह दिखाया जा रहा है कि यह माल लगाने से गोरापन बढ़ जाएगा और वो खरीद भी ले रहे हैं बिना पूछे कि नाइंटी नाइन परसेंट ऑफ व्हॉट ? और कौनसी रिसर्च है, कहाँ छपी है, बेस क्या है, आधार क्या है, कुछ नहीं बता रहे हैं, बस बोल दिया। और एक चित्र दिखा दिया जिसमें वह पहले काली-काली दिख रही है फिर गोरी-गोरी दिख रही है, और बीच में टैं टैंटैं टैं, ऐसी आवाज़ आयी। उसने उसे मुँह पर ऐसे-ऐसे मला और झनझना कर बिलकुल दूधनुमा गोरी हो गयी। और वह माल बिकना शुरू हो गया।

कोई थोड़ा भी बुद्धिमान आदमी ऐसा माल खरीदेगा नहीं। लेकिन यह हाल करा है हमने अपनी महिलाओं का। हमने उनकी चेतना और बुद्धि को विकसित ही नहीं होने दिया। हम विकसित करते हैं बस उनकी देह को और वो भी बस उपभोग के लिए, सेक्सुअल उपभोग के लिए; देह की बढ़िया हो जाए और दिमाग की औंधी रहे।

जो बिलकुल पढ़ा-लिखा वर्ग होता है, मैं फिर वही आईआईटी के अपने दिनों की बताता हूँ। मेरे भी बैच में कई ऐसे लड़के थे जो बोलते थे, हमें बहुत ज़्यादा समझदार और बहुत सोचने वाली लड़की चाहिए ही नहीं। बोले, साधारण चाहिए दिमाग से और सुन्दर चाहिए शरीर से। बोले, दिमाग ज़्यादा होता है न तो उपद्रव करती है, बुद्धि कम चले तो अच्छा है। बहुत सारे माँ-बाप अभी भी यह करते हैं, कहते हैं ज़्यादा पढ़-लिख लेगी तो शादी नहीं होगी, बुद्धि कम चले तो बेहतर है। तो उसको बुद्धिहीन बना दिया गया। उसको बना दिया गया भावना-प्रधान और बुद्धिहीन। भावनाएँ, इमोशंस, फीलिंग्स में जियो तुम, क्योंकि तुम तो स्त्री हो न, तुम्हारे पास भावनाएँ हैं, तुम्हारे पास आँसू हैं। और बुद्धि, वह पुरुषों के लिए छोड़ दो।

प्र२: आचार्य जी, मेरा प्रश्न है, एक लड़की है एक लड़का है, अगर हाइयर एजुकेशन (उच्च शिक्षा) की बात आती है तो तुलनात्मक रूप से जो प्रेफरेंस (प्राथमिकता) दी जाएगी वह ब्वॉयज़ को दी जाएगी कि चलो आप पढ़ने जाओ। लड़की को कहा जाएगा आपकी यहीं अरेंजमेंट (व्यवस्था) कर देते है गाँव में ही या अपने आसपास में। मैं एक गाँव में रहता हूँ, गाँव में ऑब्ज़र्व करता हूँ इन चीज़ों को। तो सर, जो ग्रामीण महिलाएँ या लड़कियाँ हैं उनके लिए क्या सन्देश देंगे?

आचार्य: कोई कहीं फँसा होता है तो उसे क्या सन्देश दिया जाता है? बाक़ी सारे अपने धंधे बंद करो, एक काम पर ध्यान लगाओ, क्या? आज़ादी। बाक़ी जिन भी चीज़ों में तुमने अपना ध्यान बाँट रखा है वो चीज़ें तुम्हारे काम नहीं आएँगी। न सजना-संवरना काम आएगा, न इधर-उधर रिश्ते बनाना तुम्हारे काम आएगा। न घूमना-टहलना तुम्हारे काम आएगा, न मनोरंजन करना तुम्हारे काम आएगा। तुम्हारे तो एक ही चीज़ काम आनी है — तुम्हारी आज़ादी, क्योंकि तुम फँसी हुई हो। तो बाक़ी सारे अपने काम-धंधे बंद करो और एक चीज़ पर ध्यान पूरा केंद्रित करो, किस चीज़ पर? आज़ादी पर। बस यही है।

जो चिड़िया जाल में फँस गयी हो, उसको शोभा देता है कि वह चिड़े के ख़याल करे और बैठ कर रूमानी सपने बुने? बोलो! या सोचो, चिड़िया जाल में फँसी हुई है और कह रही है, ‘लाना ज़रा काजल, काजल लगाना है।‘ यह शोभा देता है क्या? जानो कि तुम एक फँसी हुई चिड़िया हो और अपनी पूरी ऊर्जा सिर्फ़ एक काम में केंद्रित कर दो — आज़ादी। बाक़ी सारे काम बंद करो बिलकुल।

हाँ, आजादी का अगर मार्ग पढ़ाई से होकर जाता हो तो पूरी उर्जा किसमें लगानी है? पढ़ाई में। आज़ादी का मार्ग अगर विद्रोह से होकर जाता है तो विद्रोह में लगानी है। आज़ादी का मार्ग अगर किसी और ज्ञान, गुण, कौशल वर्धन से जाता है तो उन चीज़ों का वर्धन करना है; वर्धन करना माने बढ़ाना है। जिस भी रास्ता से तुम्हें आज़ादी मिलती हो उस रास्ते पर अपनी पूरी ऊर्जा, अपना पूरा समय लगाओ। बाक़ी सब काम बंद करो।

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