दुःख सोचो तो दुःख, सुख सोचो तो भी दुःख, और आनंद सोचा नहीं जा सकता || आचार्य प्रशांत (2016)

प्रश्नकर्ता: इसमें हमने देखा कि जो हमारे अपनी मानसिक धारणाएँ हैं, उसी कारण कई समस्याएँ हैं; पर बगैर मेन्टल कंस्ट्रक्ट्स (मानसिक धारणाओं) के जीवन कैसे जी सकते हैं?
आचार्य प्रशांत: ये क्या है?
प्र: ये भी एक कंस्ट्रक्ट (धारणा) है; इस अर्थ में कि हम जैसे देखते हैं।
आचार्य: साधारणतया लगता है कि यही देखा, तो प्रतीत होता है कि इसके बिना ज़िन्दगी हो ही नहीं पाएगी। कैसे पता कि नहीं हो पाएगी?
पहली बात तो (यह कि) इस बात का कोई प्रमाण नहीं कि इसके बिना जीवन नहीं है। और दूसरी बात; इस बात में कोई शान्ति नहीं कि आप इसके साथ ही जिये जाएँ। इसके साथ जीने में कोई शान्ति नहीं और इसके बिना जीवन के न होने का कोई प्रमाण नहीं है; तो रुकने का क्या कारण है? मात्र डर। मात्र ये कि इसमें भले ही अशान्ति है, ऊब है; पर जो कुछ है, वो धारणाबद्ध तो है। जो कुछ है, वो जाना-पहचाना है, पूर्वनियोजित तो है। चोट लगती है, पर जानी-पहचानी सी चोट लगती है न, तो सह लेते हैं। अब पता होता है कि चोट भी लगेगी, तो एक सीमा पार नहीं करेगी। जब इसके अतिरिक्त किसी और चीज़ का ख़याल करते हैं, तो डर उठता है।
इस डर को समझिए। अभी आप जिन तरीक़ों से जी रहे हैं — आपने मेन्टल कंस्ट्रक्ट्स, मानसिक धारणाओं की बात करी — अभी आप जिन तरीक़ों से जी रहे हैं, उनमें कुछ विस्फोटक नहीं है। संस्कारों से, सामाजिक व्यवस्थाओं से, नियम-क़ायदों से हमें कुछ सुविधाएँ मिली हुई हैं। चोट लगती तो है, पर ज़ोर की नहीं लगती है। ज़ोर की अगर लग जाए, तो उसके इलाज मौजूद हैं। कोई आ जाता है सांत्वना देने, कोई आ जाता है मलहम देने। तो अभी जैसा हमारा संस्कारित, सुनियोजित, सुव्यवस्थित, योजनाबद्ध, सामाजिक, मानसिक जीवन है; उसके दो चिन्ह हैं, दो उसकी विशेषताएँ हैं। पहली; उसमें चोट लगती है। दूसरी; उसमें चोट के भी दायरे हैं। जैसे उसमें हर चीज़ के, हर भावना के, हर विचार के, हर रिश्ते के दायरे हैं, वैसे ही उसमें चोट भी सीमित है। ‘मन’ माने सीमा। मन माने वो सब-कुछ जो इधर से, उधर से, अतीत से, समाज से आयातित है। मन का सबकुछ सीमित है। तो जब आप मन पर चलते हो, तो जो चोट लगती है, वो सीमित होती है।



