तुम यहाँ आते हो, लौट कर जाते हो, जानते हो तुम्हारे मन में क्या भाव आता है? ‘चार दिन की चाँदनी, फिर अँधेरी रात’| ये तो होना ही था, ये सब चीज़े स्थायी थोड़े ही हो सकती हैं| भाव मन में ये है कि यहाँ से बाहर की जो पीड़ा है, वो आवश्यक है| तुम्हारे मन में ये भाव भरा हुआ है कि पीड़ा आवश्यक है| नहीं ऐसा नहीं है| तो इसलिए जब तुम लौट कर जाते हो, तुम कहते हो, ‘सपना जैसा था| सुन्दर था पर सपना था, बीत गया| अब हम वास्तविक जगत में वापिस आ गए हैं’| और कईयों ने तो लिख कर दिया हुआ है, ‘सर, होता तो बहुत अच्छा है, लेकिन रहना तो हमें इसी दुनिया में है न’| बिल्कुल यही शब्द हैं कि ये सब ठीक है, लेकिन रहना तो हमें उसी दुनिया में है न| मन में भाव बैठा हुआ है| किसने कह दिया कि उसी दुनिया में रहना है? क्यों रहना है ? क्यों रहना है? और जब तुम्हारे मन में ये भाव होता है, तो तुम फिर यहाँ आकर भी, इस मिले हुए मौके को गवाँ देते हो| जब दोबारा आने का मौका होता है, तुम आ नहीं पाते क्योंकि तुमने पहले ही तय कर रखा था कि ये तो नकली था, ये तो चार दिन का था, ये तो एक तरह का पलायन था| तुम ये मानते ही नहीं हो कि जीवन ऐसा हो सकता है|