दिल और दुनिया के मारे, इतने दुखी क्यों ये बेचारे? || आचार्य प्रशांत, वेदान्त पर (2021)

आचार्य प्रशांत: हम जो कुछ भी करते हैं पूरी जो हमारी मानसिक व्यवस्था है, मनुष्यों ने जो भी व्यवस्था स्थापित करी वो ले-देकर के या तो अनुभव हो रहे दुख को मिटाने के लिए होती है या आशंकित दुख को दूर रखने के लिए।
तो माने हमारी सारी गतिविधियाँ, हमारे सारे कर्म, हमारे सारे विचार और हमारी सारी योजनाएँ होते एक ही केन्द्रीय उद्देश्य के लिए हैं। क्या? कि दुख से किसी तरह बच सको। कौनसा दुख? या तो वो जो सिर आ पड़ा है या तो वो जो सिर आ पड़ता दिख रहा है कि गड़बड़ होनी शुरू हो गयी है, अनिष्ट सामने है कुछ गड़बड़ होने वाली है चलो कुछ करते है।
तो इंसान जो कुछ भी करता है वो करता ही इसीलिए है कि या तो वो अतृप्त है, सन्तप्त है, अपूर्ण है, बीमार है, लालच में है, डर में है या उसको ये विचार आ गया है, ऐसी आशंका आ गयी है कि कुछ है सामने जो गड़बड़ हो सकता है। इससे पहले कि गड़बड़ हो जाए कुछ करो।
तो सारी हमारी व्यवस्था है तो दुख केन्द्रित ही लेकिन जो दुख हमें इतना सताता है कि हमें जीवन भर भगाता है हम उसका कभी केन्द्रीय उपचार नहीं करते। हम उसका उपचार पचास अन्य तरीको से करते हैं। एक तरीका होता है सुख की खोज। एक तरीका होता है कि दुख को किसी भाँति विस्मृत कर दो।
कुछ भी हम करने को राज़ी हो जाते हैं, जो एक सीधा-सरल उपाय है वो नहीं आज़माते हैं। और वो ये है कि सच्चाई जान लो। और सच्चाई क्या है? सच्चाई ये है कि जो दुखी है उसके पूरे साक्षात्कार के बिना दुख नहीं मिटने वाला।
दुख कहाँ से चला जाएगा अगर जो दुखी है उसकी हस्ती का नाम ही दुख है? दुख कहाँ से चला जाएगा अगर जो दुखी है उसके रग-रग में दुख ही प्राण बनकर घूम रहा है?



