आतंकवाद आपके मन में डर पैदा करने का काम करती है, तभी इसका नाम ही है आतंकवाद। आतंकी का निशाना बस वह लोग नहीं होते जिन्हें गोलियों से मार दिया जाता है। आतंकी का निशाना वो करोड़ों लोग होते हैं, जिन तक ना गोली पहुँचती है, ना गोली की आवाज़ पहुँचती है — जिन तक बस हत्याकांड की खबर पहुँचती है। आतंकी का इरादा, भारत के जितने 150 करोड़ लोग हैं, उनमें डर बैठाना है। आतंक और डर क्या है — यह भगवद्गीता समझाती है। जो जितना कम डरेगा वो आतंकवादियों के लिए उतना अनुपलब्ध होता जाएगा। और भारत अगर गीता का हो जाए, तो भारत डरना ही बंद कर दे।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्कार आचार्य जी, अभी आपसे कई मीडिया चैनल्स ने पहलगाम आतंकी हमलों के बारे में प्रश्न पूछा था। तो आपने अपने उत्तर में भगवद्गीता का उल्लेख किया था तो मुझे ये बात तो बहुत रोचक लगी है, तो इस बात को मैं थोड़े और विस्तार से जानना चाहता हूँ कि आपने भगवद्गीता का उल्लेख क्यों किया था इसमें।
आचार्य प्रशांत: देखिए कोई भी चीज़ गड़बड़ हो जाती है तो हम उसे सुधारना चाहते हैं, कोई बीमारी लग जाती है तो हम उसका इलाज करना चाहते हैं। ये है (माइक की ओर इंगित करते हुए) ये खराब हो जाए ये बिल्कुल चीखने चिल्लाने लगे ये बहुत पागलों सा व्यवहार करने लगे तो मुझे इसे ठीक करना पड़ेगा ना? विक्षिप्त हो गया ये, पर इसे ठीक करने की अनिवार्य शर्त ये है कि पहले मैं इसको समझूँ और समझे बिना कुछ सुधार नहीं हो सकता।
जिस चीज़ को सुधारना चाहते हो उसको समझना पड़ेगा। इसी तरीक़े से आपको कोई बीमारी लग गई है कोई कीटाणु, जीवाणु, बैक्टीरिया आपको कुछ लग गया है आपको अगर उस बीमारी को खत्म करना है तो पहले आपको वो जो जीवाणु है ना जो पैथोजन है जो बीमारी का जीव है कारक है, आपको उसकी पूरी प्रक्रिया समझनी पड़ेगी कि वो पैदा कैसे होता है? आप में कैसे आता है? आप में फलता फूलता कैसे है? आपको नुकसान कैसे पहुँचाता है? ये सारी बातें जब आप समझ जाते हो तो फिर उसका इलाज बहुत आसान हो जाता है ना।




