रिज़र्वेशन इसलिए है, ताकि एम्पावरमेंट हो पाए। और जब वास्तविक सशक्तिकरण होने लगता है, तो उसका एक लक्षण यह सामने आता है कि लोग फिर आरक्षण, अनुदान लेने से स्वैच्छिक रूप से मना करने लगते हैं। इंसान कहता है — ‘मैं आज़ाद आदमी हूँ। अब और किसी से नहीं लूँगा, मैं तो अब दूँगा।’ ऐसे जीने में अपनी एक शान होती है। और यह तब होगा, जब स्पिरिचुअल एम्पावरमेंट होगा।
यह सारांश AI द्वारा तैयार किया गया है। इसे पूरी तरह समझने के लिए कृपया पूरा लेख पढ़ें।
प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम अंकित कुमार है। मैं किरोड़ीमल महाविद्यालय का द्वितीय वर्ष का भूगोल विभाग का छात्र हूँ। अभी तक हमने एक पहलू से समझने की कोशिश की, कि कैसे वंचित वर्ग जो समाज में रहा, उनके साथ शोषण हुआ और उस शोषण को समझकर, उस चेतना को अपने अंदर जगाकर जो उत्पीड़न उनके साथ हुआ, हम समाज को सुधार सकते हैं, समाज में बराबरी का दर्जा प्राप्त कर सकते हैं।
वहीं संविधान निर्माता, जो भीमराव अंबेडकर जी थे, उन्होंने रिज़र्वेशन पॉलिसी को अडॉप्ट करने की बात की और उसमें लगातार निरीक्षण की भी बात की। लेकिन हम यहाँ देख रहे हैं महोदय कि जो आरक्षण है वो बढ़ता ही जा रहा है। जबकि एक पहलू जो आपने अभी कहा, कि जब आरक्षण मिला उसके बाद आज की अगर दोनों में तुलना की जाए तो उन समाज के लोगों की स्थिति पहले से बेहतर हुई है। और सरकार भी इसको एक टूल की तरह इस्तेमाल कर रही है कि रिज़र्वेशन बढ़ाएगी, तो उनके वोट बैंक बढ़ेंगे।
तो इस पहलू में आपका क्या विचार है?
और मैं जानना चाहूँगा कि क्या ऐसे मेज़र्स हम ले सकते हैं, जिससे ये जो




