प्यार, मासूमियत, भोलापन - या छिपी हुई चालाकी?

Acharya Prashant

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प्यार, मासूमियत, भोलापन - या छिपी हुई चालाकी?
दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो। यह सारांश प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के स्वयंसेवकों द्वारा बनाया गया है

प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम कमर अहमद है और मैं गीता सत्रों से लगभग डेढ़ सालों से जुड़ा हुआ हूँ। मेरा सवाल ये है कि मैं अपनी चालाकियों को देख पा रहा हूँ। बट अक्सर ये होता है कि चालाकियाँ मैं करने के बाद ही उन्हें देख पाता हूँ। कभी-कभी पहले भी दिख जाती हैं, लेकिन ज़्यादा बड़ा हिस्सा उसका है जब मैं चालाकियाँ कर जाता हूँ और वो बाद में दिखती हैं और तब तक नुकसान हो चुका होता है। तो क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे चालाकियों को पहले देखकर उसे रोका जा सके नुकसान होने से?

आचार्य प्रशांत: जिस चीज़ को कहते हो कि ये चालाकी नहीं है। है न? बस वहीं जान लो कि अब चालाकी शुरू हो रही है। चालाकी माथे पर खुदवा कर थोड़ी आएगी कि “मैं चालाकी हूँ।” वो क्या बनकर आएगी? मैं तो भोलापन हूँ, मैं तो प्यार हूँ। मैं ये हूँ, जो भी हूँ। तो जब वो सब हो रहा हो जो चालाकी जैसा नहीं लगता, तो उसी को जान लो ये चालाकी है।

दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो।

अरे, अगर कोई चालाक होगा तो केंद्र से ही चालाक होगा न। चालाकी व्यवहार का कोई एक पक्ष नहीं होती, चालाकी कोई एक छोटा सा सीमित प्रकरण नहीं होती। चालाकी तो केंद्र होती है, और उस केंद्र से जो कुछ किया जाएगा, उस सब में चालबाजी छुपी ही होगी।

तो जो कुछ लग भी रहा है कि सीधा है, मासूम है, निष्काम है, सरल है, उसमें भी क्या बैठी होगी? चालाकी बैठी होगी। वहीं उसको पकड़ लो, धर दबोचो। जहाँ लगे कि “मैं अच्छा आदमी हूँ,” तहाँ कहो, “अच्छा तो तू है ही नहीं। तो यहाँ और तू कोई ज़्यादा ही गहरी चाल खेल गया, क्योंकि अच्छा तो तू है ही नहीं, पर अभी तूने काम ऐसा करा है, जिसको देख के ख़ुद तुझे भी लग रहा है कि तू अच्छा आदमी है। तो इस बार तो और भी तूने टेढ़ी वाली खेली है चाल।”

हम इन सब बातों को व्यवहार का हिस्सा मानते हैं। ये व्यवहार का हिस्सा नहीं है, ये व्यवहार का केंद्र है। अहंकार हो और चालाक ना हो, ऐसा हो सकता है। चालाक हो और मूर्ख ना हो, ऐसा हो सकता है? बोलो। अहंकार हो और हिंसक ना हो, ऐसा हो सकता है?

श्रोता: नहीं हो सकता।

आचार्य प्रशांत: पर हिंसा को हम व्यवहार के किसी हिस्से के रूप में देख लेते हैं। हमें लगता है कि “ऐसा व्यवहार किया तो हिंसा है, ऐसा व्यवहार किया।”

तो इसीलिए हिंसा हमको यदा-कदा ही दिखाई देती है। 24 घंटे में से एक घंटा हमें लगेगा कि हम हिंसक थे। समझ में आ रही है बात? ठीक वैसे जैसे कि आप कह दो, कि उदाहरण के तौर पर कि चेतन माने इंसान, कॉन्शियस माने ह्यूमन बीइंग। तो फिर आप कहोगे कि अभी आज पूरे दिन बस एक कॉन्शियस एंटिटी मिली, क्योंकि आपको इंसान एक ही मिला था, क्योंकि आपने चीज़ की परिभाषा बहुत सीमित कर दी, बहुत गलत कर दी। जबकि तथ्य ये है कि पेड़ भी थे, पौधे थे, बिल्ली थी, कुत्ता था, पक्षी थे। वो सब भी कॉन्शियस थे।

पर आपने उसकी परिभाषा इतनी सीमित कर दी कि आपको मौका मिल गया कहने का कि दिन में एक ही बार हुआ ऐसा। इसी तरीके से आप अपनी चालाकी की परिभाषा इतनी सीमित कर देते हो, या हिंसा की परिभाषा इतनी सीमित कर देते हो, कि आपको लगता है कि आप यदा-कदा ही चालाक या हिंसक होते हो। जब केंद्र ही अहंकार का है, तो चालाकी भी निरंतर है, और जहाँ वो हिंसा या चालाकी दिखाई नहीं दे रही, वहाँ मामला और ख़तरनाक है।

हो अहंकारी, जीवन चलाते हो, मान्यता, धारणा, परंपरा पर; इसी को अहंकार बोलते हैं। और किसी को लेकर दावा है प्यार का कि “मैं इससे बहुत प्यार करता हूँ।” ज़िंदगी दिखाए, वक़्त बताए, इससे पहले ख़ुद ही कह लो न कि मैं इसके प्रति हिंसक हूँ। तुम क्यों कह रहे हो कि कुछ लोगों से प्यार करता हूँ, सिर्फ़ एक-दो से हिंसा करता हूँ। जब केंद्र पर अहंकार है, तो तुम सबके लिए हिंसक हो। एक-दो को लेकर क्यों झूठ बोल रहे हो? कुछ लोगों को लेकर क्यों झूठ बोल रहे हो कि इनसे प्यार करता हूँ? तुम सबसे हिंसा करते हो।

हाँ, तुमने हिंसा की परिभाषा इतनी सीमित कर दी है, कि तुम डिटेक्ट नहीं कर पाते कि हिंसा चल रही है। जैसे तुम प्राणी की परिभाषा कर दो, प्राणी माने मनुष्य; तो तुम्हारे सामने से हाथी भी निकल जाएगा, बहुत बड़ा। तो कहोगे, “कोई प्राणी नहीं निकला,” क्योंकि प्राणी माने मात्र मनुष्य। तो हाथी भी निकल गया, तो कहोगे, प्राणी तो निकला नहीं।

इसी तरीके से आपने अपनी हिंसा, चालाकी और धूर्तताओं की परिभाषा इतनी सीमित कर दी है कि वो सब कुछ हो रहा होता है आपके भीतर, आपके सामने, पर आपको पता ही नहीं लगता। आप कहते हो, “ये तो प्यार है।” वो प्यार थोड़ी है, वो चालाकी है। आप कहते हो, “ये तो स्नेह है।” स्नेह नहीं है, हिंसा है। और फिर जब बिल्कुल एक स्थूल विस्फोट ही हो जाता है हिंसा का, तब आपको झटका लग जाता है। आप कहते हो, “अरे, ये बीच-बीच में हिंसा कहाँ से आ जाती है? ये बीच-बीच में मैं इतनी धूर्तता कैसे दिखा देता हूँ?”

ये “बीच-बीच में” नहीं दिखा रहे हो, एक निरंतर प्रवाह है धूर्तता का, क्योंकि केंद्र ही धूर्त है।

“पर हम इतने बुरे थोड़े हैं आचार्य जी। आप तो क्या करते हो, पूरा ही एकदम वाइट-वॉश कर देते हो!”

केंद्र ही धूर्त है, देखो, मैं इसमें कुछ कर नहीं सकता। केंद्र होगा तो धूर्तता का ही होगा। और केंद्र तो हमारा होता है। प्रमाण ये है कि “मैं-मैं-मैं” लगातार चलता है।

धूर्त तो सिर्फ़ वो नहीं होगा जिसने उस केंद्र को ही मिथ्या देख लिया। वो आपने देखा नहीं, क्योंकि आपको सत्य से ज़्यादा स्वार्थ प्यारे हैं। अहंकार है और चालू न हो, ऐसा नहीं हो सकता। और अहंकार से संबंधित जितनी बातें होती हैं वो हैं, तो पहले ही जान लिया करो कि चालाकी भी कूट-कूट कर भरी होगी।

ख़ुद को बचाने की पूरी कोशिश है, ख़ुद को सही साबित करने के लिए सौ तरह के कुतर्क हैं। “मेरा अतीत है तो उज्ज्वल ही होगा,” ऐसा आग्रह है। ये सब अहंकार के लक्षण हैं, हैं न? और अगर ये सब हैं किसी में, तो उसमें हिंसा और चालाकी भी खूब होगी। हाँ, प्रकट होने में देर लग सकती है।

अपने आप को बेइज़्ज़त करने में मज़े लेना सीखो, नहीं तो ज़िंदगी बेइज़्ज़त करेगी।

किसी से जाकर आग्रह कर रहे हो प्यार का, कह रहे हो, “देखो, मैं तुम पर बिल्कुल दिल-जान-तन-मन-धन और जो कुछ है, सब लुटाता हूँ।” तभी खट से पकड़ लो अपने आप को। बोलो, “एक सेकंड! ऐसा कुछ है नहीं। असल में मैं झूठ बोल रहा था, कुछ नहीं है।”

थोड़ी-सी शर्म आएगी, थोड़ी-सी बेइज़्ज़ती लगेगी, पर ये कमाल का काम कर दिया तुमने ज़िंदगी में पहली बार, अगर ऐसा कर पाओ। कि जहाँ मामला बन ही रहा था, जहाँ प्रमाणित हुआ जा रहा था कि सीधे आदमी हो और बड़े प्यारे आदमी हो, फिदा हुए जा रहे हो, “ऐसा है-वैसा है,” जहाँ बिल्कुल अब दाल गल गई थी, वहाँ स्वयं ही कह दो: “ना-ना-ना-ना, अपना केंद्र याद आ गया। जब मैं भीतर से गड़बड़ हूँ तो किसी के प्रति अच्छा कैसे हो सकता हूँ? भीतर अगर अपूर्णता बैठी है तो वो बाहर हिंसा ही रखेगी। जो भीतर से अधूरा है, वो बाहर नोचने-खसोटने की फ़िराक में ही रहेगा। तो हाँ, मैं तुझसे बोल रहा था कि मैं तन-मन-धन सब न्योछावर कर रहा हूँ वग़ैरह-वग़ैरह। पर देख, असली बात ये है कि मुझे सेक्स चाहिए।”

बोल दो खुलकर। क्या होगा? थोड़ी बेइज़्ज़ती हो जाएगी। एक jhaanpad खा जाओगे, अच्छी बात है। किसी बहाने से उसने छुआ तो सही। मौज आई कि नहीं?

अपने आप को पकड़ना सीखो। भीतर चोर बैठा है, उस पर नज़र रखना, उसे गिरफ़्तार करना सीखो। इन द मिडिल ऑफ द ऐक्शन, रेड-हैंडेड बिल्कुल पूरे जान लगाकर के कुछ बोल रहे हो, किसी को कुछ साबित करने के लिए, कुछ जताने के लिए चढ़े जा रहे हो किसी के ऊपर, ठीक उसी वक़्त ब्रेक लगा दो और कहो, “एक मिनट! मैंने जो कुछ बोला अभी तक वो सब झूठ था।”

ये है साधना असली। वो सब नहीं चमत्कार होते कि “ये हुआ, वो हुआ।” ये है चमत्कार, करो।

श्रोता: यही पार्टी है।

आचार्य प्रशांत: तो इतने परेशान क्यों हो? पार्टी है, तो मौज करो।

किस-किस के साथ हुआ है, कि कोई ज़रूरी काम है, तभी सोचा है कि “5-10 मिनट की नींद ले लेते हैं,” और लेटे हैं? नहीं लेटके गुज़र ही गए, वो तो अक्सर होता है, मैं कुछ और पूछ रहा हूँ। लेटे हैं, नींद आ रही है, नींद गहरी होती जा रही है और तभी उचक के खड़े हो गए। किसके साथ हुआ है? (लगभग सारे श्रोता हाथ उठाते हैं)। ऐसे ये-ये करना सीखो। एक धार है जो बहाए लिए जा रही थी, और बहने की पूरी तैयारी थी। बह ही गए थे, बह ही गए थे, ब्रेक लगा दिया, खड़े हो गए। ये करना सीखो।

प्रश्नकर्ता: धन्यवाद आचार्य जी।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, गुड ईवनिंग। मेरा नाम जितेन्द्र है, मैं अबू धाबी से हूँ। तो इधर मैं काफ़ी टाइम से हूँ, ओवर अबाउट नाइन ईयर्स। इससे पहले मैं कभी फ़िज़िकल ऐक्टिविटी में ध्यान नहीं दिया था, बट रीसेंटली आई स्टार्टेड वॉकिंग।

तो इधर मैं मेरे आसपास जब देख रहा था कि बहुत सारे लोग, उसमें इवन दे वर ओल्डर पीपल ऑल्सो; दे स्टार्टेड रनिंग ऐज़ वेल। सो एट द सेम टाइम आई केम अक्रॉस डेविड गॉगिन्स के जो पॉडकास्ट थे, तो उसमें ही वॉज़ एम्फ़साइज़िंग ऑन टू चैलेंज योर फ़िज़िकल लिमिट्स। उनका कहना ये था कि “आपके फ़िज़िकल आप जितना ज़्यादा हो सके उतना ज़्यादा अपने डिस्कम्फ़र्ट में जाना चाहिए, क्योंकि आपका ग्रोथ उधर से होता है।”

तो एट द सेम टाइम मैं आपके जो यूट्यूब पर वीडियोज़ थे, तो उसमें एक आपने कहा था कि “बिगिन फ़्रॉम द डेस्टिनेशन इटसेल्फ़।” तो इस कॉन्टेक्स्ट में मुझे अन्डरस्टैंड करना था कि *हाउ कैन आई रिलेट टू इट? ऐंड ऑल्सो, अगर मैं अपने आप को चैलेंज किया फ़िज़िकली तो हाउ डज़ आई कैन रीच दिस डेस्टिनेशन? तो ये मेरा प्रश्न है।

आचार्य प्रशांत: आप गीता सत्रों में कब से हैं? यूट्यूब वीडियोज़ की आपने बात करी, आप सत्रों में कब से हैं?

प्रश्नकर्ता: वन-एंड-अ-हाफ़ ईयर्स।

आचार्य प्रशांत: आप कुछ करने जाओगे, उसका संबंध अगर अपनी हस्ती से, ईगो से लगाओगे, कहीं न कहीं उसको आपको रुकना पड़ेगा।

इसलिए कहा जाता है, “बिगिन फ़्रॉम द डेस्टिनेशन।” और वो बहुत आगे की, बहुत ऊँची बात है। मुझे इसमें समस्या आती है कि वो पारमार्थिक बात को मैं वॉकिंग से कैसे जोड़कर आपको समझाऊँ। और मुझे समस्या आती है कि आध्यात्मिक, गूढ़ आध्यात्मिक बात को जिन भी आपने महानुभाव का नाम लिया था उनके पॉडकास्ट से कैसे जोड़कर बताऊँ। आप आते, आप किसी श्लोक की बात करते। आप पता नहीं किनकी बात कर रहे हो कि “मैंने उनका पॉडकास्ट देखा। उन्होंने बोला फ़िज़िकल करो, चैलेंज करो।”

आप सचमुच सत्र सुन रहे हैं? आप परीक्षाएँ दे रहे हैं? आपके पास समय कैसे मिल जाता है इधर-उधर के पॉडकास्ट देखने का? कहाँ से समय आ रहा है? वॉकिंग आप कर रहे हो सेहत के लिए। बूढ़े लोग दौड़ लगा रहे हैं, वो भी लगा रहे हैं सेहत के लिए। उसमें कोई आध्यात्मिक कोण कहीं से है ही नहीं। और जब मैं कह रहा हूँ, “स्टार्ट फ़्रॉम द डेस्टिनेशन” तो मैं कह रहा हूँ: आत्मस्थ होकर जो कर्म आता है, उसको करने दो।

अब इन दोनों बातों को कैसे एक करूँगा? माफ़ करिएगा, लेकिन समस्या ये आती है कि आप मुझे भी कोई “यूट्युबर” ही समझ लेते हो। तो आप यूट्यूब पर कुछ देखकर आते हो, और फिर मुझसे कहते हो कि “आचार्य जी, आप इसको एक्स्प्लेन कर दीजिए।” या आप किसी की किताब पढ़ लेते हो, कोई सेल्फ़-हेल्प वाला होता है और उसमें जो बातें लिखी होती हैं, उनको आप गीता की बातों के समतुल्य मान लेते हो। और आप उसे फिर रिकन्साइल भी करना चाहते हो।

हमारी कम्युनिटी को भी कुछ बातें स्पष्ट हो नहीं पा रही हैं। अभी कोई लेखक/गायक हैं भारत में, उन्होंने इतना बोल दिया कि “अद्वैत बड़ी अच्छी बात होती है।” वो मशहूर हैं। तो कम्युनिटी के कई लोग बिल्कुल एकदम उत्तेजित हो गए, बोले: “इनकी और आचार्य जी की अगर आमने-सामने बैठकर बातचीत हो, तो क्या बात होगी?” मैं उनसे क्या बात करूँगा? वो अधिक से अधिक मेरे सामने एक शिष्य की तरह आ सकते हैं, सवाल पूछने के लिए। पर ये बात ही आधी कम्युनिटी को अजीब लगेगी। कहेगी, “अरे, पर उनका तो नाम बहुत है, तो ज्ञान भी बहुत होगा। तो वो शिष्य बनकर थोड़ी आएँगे!”

आप सब दुनिया के इतने पिछलग्गू लोग हो कि तुरंत हो जाते हो कि “किसी का दुनिया में नाम है तो बड़ा ही आदमी हो गया!” कहीं कोई कुछ कर रहा हो, “आचार्य जी, आप उसके समर्थन में बोलिए।”

मैं किसी के समर्थन में क्यों खड़ा होहूँ? मैं किसके समर्थन में हूँ तुम बहुत अच्छे से जानते हो; मुझे सत्य के अलावा किसी से कोई लेना-देना नहीं।

“आचार्य जी, इस मुद्दे पर बोलिए। आचार्य जी, उसके लिए बोलिए। आचार्य जी, उसके लिए बोलिए। आचार्य जी, आप जाकर उनका साथ दीजिए! आचार्य जी ये करिए।”

क्यों भाई? तुम्हें कुछ समझ में भी आ रहा है कि तुम जहाँ पर हो, उस जगह का स्तर क्या है? अब ये मैं अपने मुँह से बोलूँ, तो ये बात अहंकार जैसी लगेगी। अपना ढोल पीटने जैसी लगेगी।

एक बड़े फ़िल्म-निर्माता हैं, उनकी फ़िल्में चलती हैं, उनको पुरस्कार वग़ैरह भी मिलते हैं। और वो थोड़ा बौद्धिक-क़िस्म की फ़िल्में बनाते हैं। तो अभी उनकी फ़िल्म आने वाली थी, तो उन्होंने रोहित से संपर्क किया। “बैठे हैं रोहित जी यहाँ, कहाँ है?” तो बोले, “मैं आचार्य जी के साथ एक बातचीत करूँगा।” कहा, “बहुत अच्छी बात है। बताइए, आप क्या पूछना चाहेंगे उनसे?” तो बोले, “नहीं, मुझे कुछ पूछना नहीं है; इट विल बी जस्ट लाइक टू बुद्धाज़ टॉकिंग टू ईच अदर।”

इन्होंने उनको मुस्कुराकर देखा, मुस्कुराहट में लिखा हुआ था कि “दो बुद्ध नहीं होते। और जिसको अभी दुई दिख रही है, उसके लिए एक बुद्ध भी नहीं होता।” फिर कम्युनिटी ही बहुत ज़्यादा उत्तेजित हो गई होती अगर मैं वो जो निर्माता-निर्देशक के साथ बैठा होता तो। कहते, “देखा, आचार्य जी का सम्मान बढ़ गया! उनके साथ बैठकर के!”

मेरा सम्मान बढ़ गया? मुझे क्या पता आपने किसकी बात करी थी, जिसका नाम लिया। वो कौन है? मुझे क्यों पता हो। वो क्या बोल रहे हैं? उसका क्या अर्थ है? कुछ नहीं। जिस चीज़ का अर्थ है, शायद आप उसमें नियमित नहीं रहे हो। आपने सत्र नहीं सुने हैं। आपने कितनी परीक्षाएँ दी हैं, मैं जानना चाहता हूँ। आपने दी होतीं, तो आप उन व्यक्ति के पास जाते नहीं, उनकी बात आप सुनते नहीं।

देखो, विद्या और अविद्या दोनों ज़रूरी होते हैं। लेकिन दोनों में पहले तो विद्या ही आती है न? बताओ क्यों?

विद्या नहीं होगी तो तुम्हें कैसे पता कि अविद्या में क्या देखना है, क्या सुनना है?

पर हमारे ही यहाँ पर ये खूब चलन हुआ है कि “देखो, आचार्य जी ने ही कहा है न? जनरल नॉलेज होना चाहिए। दुनिया भर के पॉडकास्ट देखो, इधर-उधर की किताबें पढ़ो।” तुम्हें कैसे पता कि तुम्हें दुनिया भर की किताबों में भी क्या पढ़ना है, अगर पहले तुमने सत्रों में अपने आप को पूरी तरह झोंका नहीं है तो? अगर सत्रों में तुमने अपने आप को पूरी तरह नहीं झोंका, तो तुम्हें कैसे पता कि तुम्हें बाहर क्या देखना है, क्या पढ़ना है? बताओ। और बाहर अनन्त लाइब्रेरिज़ हैं, तुम्हें कैसे पता तुम्हें कौन-सी किताब उठानी है? दूसरी बात, तुम्हें कैसे पता उन किताबों का वास्तविक अर्थ क्या है?

तो विद्या-अविद्या दोनों नहीं ज़रूरी हैं। वास्तव में तो सिर्फ़ विद्या ही ज़रूरी है, क्योंकि विद्या ही बताएगी कि अविद्या भी कहाँ से और कितनी लेनी है, और क्या अर्थ करना है उसका। विद्या आ गई, तो अविद्या अपने-आप आ जाएगी। इसका मतलब ज़रूरी तो सिर्फ़ विद्या होती है। पर मैंने अगर बोल दिया कि “विद्या-अविद्या दोनों ज़रूरी है” तो उसका अर्थ आप इस लाइसेंस के तौर पर लेते हो कि “अब जाओ, इधर-उधर की सौ चीज़ें देखो और फिर मुझसे आकर पूछो, कि उन्होंने ऐसा बोला है आचार्य जी, आप टिप्पणी करिए।”

वो क्या हैं? वो भगवान श्रीकृष्ण हैं कि मैं उनके श्लोक पर व्याख्या दूँ। मैं बोलूँगा अभी, तो कृष्णों-कबीरों के कथनों पर कुछ बोलूँगा न? कोई सेल्फ-हेल्प गुरु हो, कोई पॉप-फ़िलॉसफ़र हो, कोई यूट्युबर हो, मैं उसकी बात की व्याख्या थोड़ी करूँगा कि “आचार्य जी, उन्होंने ऐसा बोला है, अब आप बताइए उन्होंने ऐसा क्यों बोला?” तरह-तरह के लोग होते हैं, तरह-तरह की बातें बोलते हैं, बोल दिया होगा कुछ। दोबारा पूछोगे तो कुछ और बोल देगा। तुम्हें समझाता फिरूँगा क्या? जो समझाने लायक हैं, उनकी बात मैं आपको समझा रहा हूँ और बाकियों की मैं कोई हैसियत नहीं मानता।

आपके लिए होंगे वो बहुत बड़े-बड़े नाम दुनिया के। होगा किसी के पास लिटरेचर में नोबेल प्राइज़ भी। मैं कह रहा हूँ, ये किताब उसकी हर किताब से ऊपर की है। और कह रहा हूँ तो कह रहा हूँ। आपको बहुत शौक है जाकर के दुनिया की किताबें पढ़ने का तो पढ़ते रहिए। ठसक के साथ कह रहा हूँ। नहीं तो बहुत घूम रहे हैं, बड़ी-बड़ी किताबें लिखी गई हैं। आप जाओगे कि “टॉप 100 वर्क्स इन लिटरेचर।” 100 की जगह वो 1000 बता देगा, आपकी ज़िंदगी बीत जाएगी। और फिर आप मेरे पास आओ कि “वो फलाँना है, वो लैटिन-अमेरिकन राइटर है, उसने एक जगह ऐसा बोला है, तो आप बताएँ इसको या फिर समझाएँ कि आपने जो बोला था सत्र में, उससे मैच नहीं कर रहा है।”

लेना एक, न देना दो। जितने मुँह उतनी बातें, “मुंडे मुंडे मतिर् भिन्ना।” मैंने ठेका ले रखा है सब मूर्खों की बातें समझाने का? और होगा किसी के पास, फिर कह रहा हूँ, नोबेल प्राइज़ भी हो तो भी क्या फ़र्क़ पड़ता है? ले-देकर के बात तो दुनिया-जहान की ही कर रहे हो न; चाहे साहित्य है, चाहे विज्ञान है। जो भी बात कर रहे हो, उस बात से आगे तो नहीं जा पाए न। बहुत बड़े वैज्ञानिक भी हो, तो भी पदार्थ को सच ही तो मान रहे हो न।

तुम कहो, “इतने बड़े वैज्ञानिक हैं, आचार्य जी आपकी तो किस्मत खुल गई। आपको उनके साथ बात करने का मौका मिलेगा भैया।” सामने आएँगे तो शिष्य की तरह आएँगे, और नहीं तो नहीं आएँगे। यहाँ “टू बुद्धाज़ टॉकिंग टू ईच अदर” नहीं चलता। क्या गर्वोक्ति करी है! कितना अहंकारी आदमी है ये! बाप रे, नेवर सीन अ मोर एरोगेंट मैन! ठीक है, जो है सो है। पसंद नहीं आ रहा तो निकलो।

तुम्हें इतनी-सी बात एरोगेन्स की लग रही है, तो जिस दिन कोई बोल देगा “अहम् ब्रह्मास्मि,” उसको क्या बोलोगे तुम? क्या बोलोगे? फिर इसीलिए तुम जल-भुन करके जब कोई "अन-अल-हक़" बोल देता है, तो उसको मार ही देते हो। बर्दाश्त ही नहीं होता, इतनी बड़ी बात कैसे बोल दी? सीधे अपने-आप को ब्रह्म बोल दिया। पर उसने सिर्फ़ अपने-आप को ब्रह्म नहीं बोला है, उसने कहा तुम भी वही हो; तत्त्वमसि। अगर मैं ब्रह्म हूँ; अहम् ब्रह्मास्मि, तो तुम भी वही हो; तत्त्वमसि। पर तुम्हें ख़ुद तो ब्रह्म होना ही नहीं है। कोई और भी अगर हो रहा हो, तो तुम्हें बड़ी आग लगती है। तो, “अरे, सच एरोगेन्स, वेरी कन्सीटेड मैन! लगती है तो लगे।

जो लोग इज़्ज़त पाने लायक हैं, उनके नाम मैं आपको बताता हूँ और बताता ही जाता हूँ। और हुए हैं ऐसे सैकड़ों में, और उनके आगे सर झुकाता हूँ, अपनी ओर से उनके नाम आपको बताता हूँ। और आप अपनी ओर से मुझे नाम मत बताया करिए; आपकी दुनिया में आप जिनको बड़ा आदमी या इज़्ज़तदार मानते हो, मेरी दुनिया में वो कुछ नहीं है। आप उनसे इम्प्रेस हो जाते हो क्योंकि आपके सांसारिक सपने हैं, और कोई बात नहीं। किसी के पास पैसा बहुत हो, किसी का नाम बहुत हो, आप तुरंत उसके सामने दब जाओगे, उसको इज़्ज़त दोगे, हें-हें करोगे। मैं थोड़ी उसको कोई बहुत भाव दूँगा।

जितना समय आपने इधर-उधर सुनने में लगाया, उतना समय आपने गीता सुनने में लगा दिया होता तो क्या ये प्रश्न बचता? पर देखिए, कितनी छोटी-सी बात है कि वॉकिंग, रनिंग कि ये और वो, पर इस छोटी-सी बात में भी फँसना पड़ रहा है। क्योंकि जो छोटा-सा काम था सही, वो आपने करा।

इसी साल की बात है, बल्कि पिछले साल के अंत और इस साल की शुरुआत के बीच की बात है, एक बहुत बड़े राष्ट्रीय नेता पॉलिटिशियन आप सब जानते हैं उनको। उन्होंने 3-4 महीने तक इनका पीछा करा है कि “आचार्य जी से बात करवा दो।” उन्होंने कहा, “बात करने में कोई समस्या नहीं है। ओपन-सेशन से आप आइए, बैठिए सामने सवाल पूछ लीजिए।” पर उनका आग्रह था, “नहीं, हम मंच पर बैठेंगे आमने-सामने और गीता पर चर्चा करेंगे।”

तुम चर्चा क्या करोगे? नहीं करा तो नहीं करा। हाँ, सामने बैठकर कुछ पूछना चाहते हो तो पूछ लो। मेरे देखे तो आप लोग ज़्यादा सम्मान के हक़दार हैं। और आप अगर सामने इतनी विनम्रता से बैठ सकते हैं, तो इन महाशय को भी यहीं बैठना होगा।

आपके लिए ये सब बड़े नाम बहुत बड़े नाम होते हैं। आध्यात्मिक आदमी के लिए कोई नाम बड़ा नहीं होता। उसके लिए बस एक नाम बड़ा होता है, जिसका कोई नाम नहीं।

This article has been created by volunteers of the PrashantAdvait Foundation from transcriptions of sessions by Acharya Prashant
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