दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो।
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प्रश्नकर्ता: नमस्ते आचार्य जी। मेरा नाम कमर अहमद है और मैं गीता सत्रों से लगभग डेढ़ सालों से जुड़ा हुआ हूँ। मेरा सवाल ये है कि मैं अपनी चालाकियों को देख पा रहा हूँ। बट अक्सर ये होता है कि चालाकियाँ मैं करने के बाद ही उन्हें देख पाता हूँ। कभी-कभी पहले भी दिख जाती हैं, लेकिन ज़्यादा बड़ा हिस्सा उसका है जब मैं चालाकियाँ कर जाता हूँ और वो बाद में दिखती हैं और तब तक नुकसान हो चुका होता है। तो क्या कोई ऐसा तरीका है जिससे चालाकियों को पहले देखकर उसे रोका जा सके नुकसान होने से?
आचार्य प्रशांत: जिस चीज़ को कहते हो कि ये चालाकी नहीं है। है न? बस वहीं जान लो कि अब चालाकी शुरू हो रही है। चालाकी माथे पर खुदवा कर थोड़ी आएगी कि “मैं चालाकी हूँ।” वो क्या बनकर आएगी? मैं तो भोलापन हूँ, मैं तो प्यार हूँ। मैं ये हूँ, जो भी हूँ। तो जब वो सब हो रहा हो जो चालाकी जैसा नहीं लगता, तो उसी को जान लो ये चालाकी है।
दुख रोकना है, सुख को पकड़ो; वहीं दुख छिपा हुआ है। धोखा रोकना है, भरोसे को पकड़ो; वहीं धोखा छिपा हुआ है। चोट से बचना है, तो सहलाने वालों से बचो; वहीं से चोट आने वाली है। और चालाकी से बचना है, तो अपने भोलेपन को ध्यान से देखो; वहीं चालाकी छुपी हुई है। अज्ञान से बचना है, तो अपने ज्ञान को देखो; वहीं मूर्खता बैठी हुई है। और दुश्मनों से बचना है, तो दोस्तों से बचो। लूटने से बचना है, तो इकट्ठा करने से बचो।




