आलस करने में आलस क्यों नहीं आता तुम्हें? कोई मिला है जिसको सोने में आलस आता हो? आलस कुछ नहीं होता, बस नीयत ख़राब होती है। जेब में एक रुपया भी नहीं है, पर बैठे-बैठे सपने ले रहे हैं कि मेरे पास लाखों हैं, करोड़ों हैं। जहाँ उत्तेजना और मज़े की बात होती है, वहाँ हम खूब मेहनत करते हैं। और जो काम ज़रूरी और करने योग्य है, हमें वहीं बस आलस आता है। आलस का एक ही इलाज है — आज़ादी से प्रेम।
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। मेरा सवाल ये था कि हम जब ख़ुद के साथ बेईमानी करते हैं, जब ख़ुद को धोखे में रखते हैं, जैसे हम ये जानते हैं कि जो छोटी-मोटी बीमारियाँ हैं, जो छोटी-मोटी परेशानियाँ हैं वो — अगर रोज़ हम योग करें या मेडिटेशन(ध्यान) या कुछ ऐसा तो — वो ठीक हो सकती हैं। और वो योग ही नहीं, चाहे वो बात पढ़ाई की हो, गुरु की हो, साधना की हो, कोई भी बात हो जिसे हमें निरंतर करना चाहिए। लेकिन दो-तीन दिन करने के बाद या तो मन नहीं होता या आलस आता है या हम भटक जाते हैं। वो निरंतरता नहीं बन पाती है, हम रुक जाते हैं।
आचार्य प्रशांत: बेईमानी को तोड़ने के लिए इस पल की ईमानदारी भी काफ़ी होती है। क्योंकि पीछे तो जो हो गया सो हो गया, पीछे बेईमानी भी कर दी थी तो उसको बदल या पलट तो पाओगे नहीं। बेईमानी का इलाज होता है कि अभी ईमानदार हो जाओ। यही न! पीछे की बेईमानी की बार-बार चर्चा करने से पीछे की बेईमानी मिट तो जाएगी नहीं।
बेईमानी अगर इतनी ही बुरी लगती है तो उसका एक ही इलाज है—अभी मत करो बेईमानी। पहले करी सो करी। बेईमानी बुरी लगती है तो अभी तो मत करो।




