काम को टालना बुरा नहीं है, पर यह समझना ज़रूरी है कि टालने वाला कौन है और क्यों टाल रहा है। यदि टालने वाला छोटा बने रहने, डरे रहने या अहंकार बचाने के लिए टाल रहा है, तो यह गलत है। लेकिन यदि भीतर सच्चाई, प्रेम और बोध है, और इसीलिए तुम जानते हो कि कौन सा काम सही नहीं है, और उसे टालते हो, तो टालना गलत नहीं है।
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रोक्रेस्टिनेशन यानी काम टालने की बुरी आदत के बारे में कुछ बोलें।
आचार्य प्रशांत: नहीं, प्रोक्रेस्टिनेशन माने काम में टालमटोल करना, विलंबित करना, स्थगित करना, आवश्यक नहीं है कि अपने आप में कोई बुरी बात है। समझना होगा। किसी भी काम को टाल देना भी अपने आप में एक काम है। वो भी एक कर्म हो गया, है न?
तुमसे कोई पूछे, अभी-अभी तुमने क्या किया। तुम कहोगे, ‘मैंने एक काम को टाल दिया।‘ ठीक है? कोई काम तुमने अपने लिए अभी तय कर रखा था, उसको तुमने कल पर टाल दिया। तो कोई तुमसे पूछे अभी क्या किया, तो इसका सही जवाब ये थोड़ी होगा कि मैंने कुछ नहीं किया। इसका सही जवाब ये होगा कि मैंने अभी-अभी अपने काम को टाल दिया कल पर। तो कुछ तो तुमने किया न।
एक मूल सूत्र होता है कि कर्म को नहीं, कर्ता को देखना होता है। एक्शन से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है एक्टर। डीड (कर्म) से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है डूअर (कर्ता)। कर्म से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण होता है कर्ता। ये अलग बात है कि कर्ता तो अंदर छुपा हुआ है, उसका कुछ पता तो चलता नहीं। तो कर्ता की पहचान करने के लिए हमको परीक्षण किसका करना पड़ता है? कर्म का। लेकिन कर्म का परीक्षण भी करा इसीलिए जाता है ताकि कर्ता की सही-सही पहचान हो सके। ठीक है?




