प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, बहुत सारे गुरु हैं जो बोलते हैं कि अनुभव ही सबकुछ होता है, एक्सपीरियंस। जब तक आप अनुभव न करें तो आप उसको सच न माने। तो मेरा प्रश्न है कि क्या अनुभव ही सच है?
अचार्य प्रशांत: गुरु लोग तो चलिए ऐसा बोलते होंगे कि भई, अनुभवी सत्य है और जो चीज़ तुम्हारे अनुभव में हो उसको ही सच मानो। लेकिन सिर्फ़ गुरु ही ऐसा नहीं बोलते, हर आदमी की यही धारणा है। हम सभी अपने अनुभवों को सच तो मानते ही हैं न? इसमें ही समझ लीजिए कि आदमी का अपनी तरफ़ और ज़िन्दगी की तरफ़ पहला अज्ञान है, मूल नासमझी है कि अनुभव को ही सच मान लिया। ये कह दिया कि जिस चीज़ का मुझे अनुभव हो गया वो चीज़ सच्ची ही होगी क्योंकि मुझे उसका अनुभव हुआ है।
प्र: तो मेरा प्रश्न ये है कि अध्यात्म में जैसे आप भी ये बोलते हैं कि जब तक आपको…।
आचार्य: (प्रश्नकर्ता को टोकते हुए।) नहीं, अध्यात्म हटाइए बात अध्यात्म, वगैरह ये कुछ नहीं। अध्यात्म कर ले तो वो बंबो-जंबो बन जाता है।
प्र: जैसे आपके भी मैंने वीडियो सुने तो आपने ये बोला है कि पूरे तरीक़े से जाँचिए किसी चीज़ को और गहराई तक उसको परखिए। तो जब तक मैं उसको अनुभव नहीं करूँगा, जब तक मैं वेरीफाई नहीं करूँगा तो मेरे को कैसे पता लगेगा कि ये सच है।
आचार्य: वेरिफकेशन और अनुभव दो बहुत अलग-अलग बात होती है। किसी चीज़ को जाँचना एक बात है, किसी चीज़ का अनुभव बिलकुल दूसरी बात है। इन दोनों को एक कैसे मान लिया आपने? अनुभव को ही तो जाँचना होता है। अनुभव के माध्यम से नहीं जाँचना होता, अनुभव को जाँचना होता है। अनुभव कैसे कसौटी हो गया सच्चाई की?




