तुम मुक्ति से नहीं, मुक्ति की कल्पना से डरते हो || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।।
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु। एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्।।
आपके प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा सोचकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव!', 'हे सखे!' इस तरह जो कई बार बिना सोचे-समझे हठात् कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा हास्य विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजन इत्यादि के समय अकेले अथवा इन सखाओं के सामने भी मेरे द्वारा अपमानित किए गए हैं — वह सब अपराध अप्रमेयस्वरूप अर्थात अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११, श्लोक ४१-४२
आचार्य प्रशांत: तो भाई, क्या हो रहा है? कृष्ण अर्जुन के साथ सदा रहते थे और अर्जुन उनको सखा रूप में ही देखता था, हास्यविनोद भी कर लेता था। सखा को तो कई दफ़े हल्के में भी ले लिया जाता है। हल्के में भी ले लेता होगा। भाई, गुरु जब सखा बनकर आपके साथ रह रहा हो तो आप कई दफ़े उसके साथ धृष्टता करेंगे, अमर्यादा करेंगे, सीधे-सीधे कहूँ तो बदतमीज़ी करेंगे। अर्जुन ने भी करी होगी।
लेकिन अब जब कृष्ण ने अपना विकराल रूप दिखा दिया तो अर्जुन को याद आ रहा है, अरे! बाप-रे-बाप, ये तो बड़े आदमी हैं। और इनसे मैंने अतीत में कितनी धृष्टताएँ कर दी हैं, कितनी बदतमीज़ियाँ कर दी हैं। अब याद आ रहा है कि मैं इनके साथ जो खेल-खेल में और मज़ाक-मज़ाक में इनको जिस तरह से सम्बोधित कर देता था, वो सब इनका अपमान था। क्योंकि मुझे पता ही नहीं था कि ये वास्तव में कितने विराट और कितने अनंत हैं।



