क्या आत्मा शरीर के भीतर होती है? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2016)

प्रश्नकर्ता१: सर, हम ये भी अक्सर बोल देते हैं कि हमारे शरीर में सोल होता है पर विज्ञान कभी इस बात को स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन वो वास्तव में होता है। तो अगर होता है तो मौत के समय जब वो हमारे शरीर से बाहर निकल जाती है तो उसका क्या होता है?
आचार्य प्रशांत: बेटा सोल, शरीर में नहीं होती है। मौत के समय जो चीज़ शरीर से हटती है वो सोल नहीं है, वो तुम्हारी अहम्-वृति है, इगो टेन्डेन्सी है। सोल कोई पदार्थ थोड़े ही है कि पदार्थ में घुस जाएगी। कल बात करी थी न? शरीर पदार्थ है और पदार्थ में क्या घुसेगा हमेशा? पदार्थ। तो सोल शरीर में कैसे हो सकती है? जो भी चीज़ स्पेस में हो—और शरीर स्पेस में होता है न—जो भी चीज़ समय में चलती हो आगे को, वो चीज़ पदार्थ ही होगी।
प्र: अभी आपने कहा जो हृदय होता है, वो एक स्पेस है, तो वो शरीर में कैसे है?
आचार्य: वो, वो वाला स्पेस नहीं है। वो ये वाला स्पेस नहीं है कि जिसमें पदार्थ या वस्तुएँ होती हैं, वो अपना एक अलग आकाश है। वो ये वाला नहीं है जिसमें ये सब सामान होता है। मौत के समय जो मरता है, मौत के समय जो शरीर से अलग होता है, वो है तुम्हारा 'मैं' भाव। आत्मा नहीं, 'मैं' भाव, अहम्-वृति।
प्र: सर, ये जाता कहॉं है?
आचार्य: आया कहॉं से था? जहाँ से आया था वहीं को चला जाता है। शरीर जब एक हालत में रहता है, सिर्फ़ तभी तक उसमें 'मैं' भाव रह सकता है। अगर शरीर की उम्र बढ़ जाए या शरीर में टूट-फूट हो जाए तो फिर 'मैं' भाव और शरीर वैसे ही अलग-अलग हो जातें हैं जैसे कि किसी कंपाउंड का डिकॅम्पोज़िशन हो जाए, कि पहले उसमें दो चीज़ें जुड़ी हुईं थी—सोडियम और क्लोराइड–-और फिर सोडियम अलग और क्लोराइड अलग।



