प्रश्नकर्ता: नमन आचार्य जी। हार्दिक आभार आपको। मेरी सुई एक जगह पर बहुत गहरी अटकी हुई है — साधना में प्याज़-लहसुन का सेवन वर्जित कहा जाता है, तो मैं जब विदेश जाती हूँ तो मुझे वहाँ खाना पड़ता है। और जिह्वा दोष भी है, मुझे अच्छा भी लगता है, तो मैं खा लेती हूँ कुछ परहेज़ के बाद। तो मेरा प्रश्न है कि यम-नियम कहाँ तक सही है?
और दूसरा प्रश्न है कि जब हम किसी अच्छे काम को करने जाते हैं तो मन इतना ज़ोर से विरोध करता है, ये मैं इस सत्र के लिए बहुत बारीकी से देख पायी। बहुत विरोध था उसका, लेकिन कहीं-न-कहीं उसको जीत भी पायी, इस बात की प्रसन्नता है। बहुत-बहुत धन्यवाद।
आचार्य प्रशांत: जो प्याज़-लहसुन इत्यादि वाली बात कही, उसके दो पक्ष हैं और दोनों को समझना होगा।
एक ओर तो ये बात बिलकुल सही है कि आप जो कुछ खाते हैं उसका आपकी मनोस्थिति पर अन्तर पड़ता है। जिसको हम शाकाहारी भोजन कहते हैं उसमें भी सब शाक-पत्ते एक समान नहीं होते। अलग-अलग खाद्य पदार्थों के अलग-अलग गुण होते हैं और जब वो भीतर जाते हैं तो अपनी प्रकृति के अनुसार शरीर पर प्रभाव डालते हैं। शरीर पर प्रभाव पड़ा नहीं कि मन पर प्रभाव भी पड़ ही जाएगा।
तो जो कहा गया है कि साधक को या सतोगुण के उपासकों को प्याज़-लहसुन इत्यादि से परहेज़ करना चाहिए, वो बात अपनी जगह बिलकुल ठीक है। आप वैज्ञानिकों से पूछेंगे तो वो भी आपको प्याज़ इत्यादि में कुछ रसायनों की उपस्थिति के बारे में बता देंगे जो शरीर को उत्तेजित करते हैं, स्थिरता में थोड़ा विघ्न लाते हैं इत्यादि।
और आप वैज्ञानिकों से न पूछें, आप स्वयं ही प्रयोग करके देख लें, तो भी आपको पता चल जाएगा कि हाँ, कुछ अन्तर तो पड़ता ही है। आप किसी दिन, उदाहरण के लिए, प्याज़ से ही भरपूर भोजन कर लें, उसके बाद आप दिनभर अपनेआप को देखिएगा, अपनी चेतना की स्थिति में, मनोभावों में थोड़ा अन्तर पाएँगे। ये बात का एक पक्ष है कि हाँ, निश्चित रूप से आप जो कुछ इस शरीर में प्रविष्ट करा रहे हैं उसका शरीर पर और मन पर प्रभाव पड़ता है।







