प्रश्नकर्ता: जैसे कि हम पूजा करते हैं, जैसे जो साकार कृष्ण हैं उनसे हम निराकार कृष्ण तक कैसे जा सकते हैं? मुझे ये जानना है।
आचार्य प्रशांत: साकार कृष्ण ऐसे हैं जैसे भगवद्गीता की ‘प्रती’, निराकार कृष्ण ऐसे हैं जैसे भगवद्गीता का ‘ज्ञान’। भगवद्गीता की प्रती न रखी हो आपके सामने, तो ज्ञान लेना मुश्किल हो जाएगा न। भगवद्गीता की वो जो प्रती है, वो साकार है, सगुण है। है न? और जो उसका मर्म है, उसके भीतर जो बोध है वो निराकार है, निर्गुण है। लेकिन बड़ा मुश्किल होगा, अगर आपके सामने कागज़ की वो प्रती न रखी हो। ठीक उसी तरीक़े से जैसे कागज़ की प्रती की महत्ता है, उसी तरह से पत्थर की मूर्ति की महत्ता है। प्रती की जो महत्ता है वही प्रतिमा की है। लेकिन अगर कोई कागज़ पर ही अटक कर रह जाए, जैसा बहुत लोग करते हैं; उनके घर में कागज़ की गीता होती है, लेकिन गीता का ज्ञान उन्होंने बिलकुल भी गहा नहीं होता। होता है न? घर में गीता रखी है, कभी पढ़ी नहीं, पढ़ी भी तो गुणी नहीं। उसी तरीक़े से अगर प्रतिमा आपको अप्रतिम तक नहीं ले जा पायी, मूर्ति आपको अमूर्त तक नहीं ले जा पायी, तो व्यर्थ हो जाएगी।
जैसे गीता रखना काफ़ी नहीं है, गीता के मर्म को ग्रहण करना आवश्यक है। वैसे ही साकार कृष्ण की प्रतिमा को पूजना काफ़ी नहीं है; कृष्णत्व के मर्म को ग्रहण करना आवश्यक है। मूर्ति पूजा में यही दोष रह जाता है, मूर्ति को अमूर्त तक पहुँचने का माध्यम होना चाहिए। लेकिन बहुत लोग सोचते हैं कि मूर्तिपूजा पर्याप्त है; वो बेकार की बात है।
प्र: जैसे कि मम्मी जी बोलती हैं कि पूजा करो बेटा, सुबह भोग लगाओ ठाकुर जी को; तो वो सब करने से मन को शांति तो मिलती है, लेकिन सुकून नहीं मिलता। जैसे कि अब प्रभु जी थे उनकी मैं प्रवचन सुन रही थी। तो उनकी एक बात मुझे याद है, उन्होंने बोला था कि जब आप कृष्णा को जान जाओगे तो वो आपको इतने क्लियर (साफ़) दिखाई देंगे जैसे कोई वस्तु आपको दिखाई दे रही है। मतलब वो इतने क्लियर हैं कि……।










