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सवाल अच्छे हैं पर सवालों से मुक्ति और भी अच्छी || आचार्य प्रशांत (2016)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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वक्ता: कुछ उत्तम-कोटी के प्रश्न पूछे हैं। ये बताओ, ये न पूछते तो तुम्हारा क्या बिगड़ जाता? सो रहे होते हो क्या तब भी ये सवाल आते हैं मन में? किसी ने तो तुम्हें बोला होगा कि इन सवालों की कोई कीमत है। तुम्हें कैसे पता कि ये सवाल कीमती हैं, इन्हें कब पूछा जाना आवश्यक है? कैसे पता? सुबह-सुबह जब उठते हो तो ये सवाल होते हैं मन में? ये सवाल कब आ जाते हैं? (प्रश्न पढ़ते हुए) आज़ादी, निडरता, भगवान, अहंकार… क्या अस्तित्व मुझे सजा दे रहा है, क्या सब ठीक है? —ये सब सवाल कब आ जाते हैं? अभी-अभी सो के उठे हो, अभी ताज़ा-ताज़ा पैदा हुए हो, क्या ये सब विचार हैं मन में?

ये कब आते हैं? जब सोचना शुरू करते हो, जब समाज आता है, जब किताबें आती हैं, जब ज्ञान आता है। अब कैसा रहना चाहते हो? वैसा, जैसा सोते समय रहते हो या वैसा, जैसा उठने के पाँच मिनट बाद हो जाते हो; जब ये सब याद आ जाता है, जल्दी बोलो! ये सब याद आना बड़ा सुख देता है तुमको? (प्रश्न पढ़ते हुए) मैं अपराधी हूँ, मुझ में अहंकार है, मुझे अभी तक ब्रह्म-प्राप्ति नहीं हुई है, विकार कैसे दूर करूँ? मुक्ति कैसे पाऊं? हिंसा बहुत है।

ये सब विचार ही हैं न? अब ये आ गए, सो के उठे उसके पाँच मिनट बाद आ गए, पाँच मिनट पूर्व नहीं थे। अब तुम चुन लो तुम्हें क्या चाहिए दोनों में से, इनका होना या वो सोने वाली शांति।

श्रोता: सोने वाली शांति।

वक्ता: सोते समय क्या होता है? कुछ होता होगा, तुम्हारे लिए कुछ नहीं होता। तुम्हारे ऊपर सांप भी चढ़ के बैठा रहे तो भी कुछ नहीं होता। तो जगते में वैसे ही रहो जैसा सोते में रहते हो, फिर जगते में भी सोते वाली शांति रहेगी। सोते में कैसा रहते हो? तुम्हारे ऊपर सांप चढ़ कर बैठा है, तुम पर कुछ प्रभाव है? कुछ नहीं; कोई बहुत लुभावनी चीज़ आ गयी है पर तुम्हारे लिए, वो भी कुछ नहीं। न कोई डरावनी चीज़ तुम्हारे लिए कुछ है, न कोई लुभावनी चीज़ तुम्हारे लिए कुछ है। ये तुम्हारी स्थिति है सोते में, तो ऐसे ही जगते में रहो। जब जगते में भी ऐसे ही रहोगे, तो सोते समय की शांति जगते में भी रहेगी। कुछ बहुत डरावना आ जाये, कुछ नहीं; कुछ बहुत लुभावना आ जाए, कुछ नहीं।

सो रहे हो, तुम्हारे बगल में कोई दो-करोड़ रख दे, तो ललचा उठोगे? और सो रहे हो और तुम्हारी कनपट्टी पे कोई बन्दूक रख दे, काँप जाओगे? जगते में भी ऐसे ही रहो। वहाँ बस इतना है कि तुम्हें संज्ञान नहीं था; यहाँ पता है, यहाँ चैतन्य होते हुए भी वैसे रहो। बंदूक रखी भी है तो बहुत मोल नहीं है; और करोड़ रखा भी है तो बहुत मोल नहीं है।

दुनिया को ज़रा हलके में लो और ख़ास तौर पर वो जो बहुत भारी करता हो उसको तो लो ही हलके में। तुम्हें तो ये सवाल ही भारी करते हैं, सर्वप्रथम तो इन्हें ही हलके में लो।

श्रोता २: आ रहें हैं दिमाग में, आ रहे हैं सवाल।

वक्ता: उन्हें आने दीजिये, आप सोते रहिये! आप सो रहे हो आपके अगल-बगल लोग आ-जा रहें है, आपको क्या फर्क पड़ा? आप तो सो रहे हो न? आने दीजिये, जाने दीजिये, क्या फर्क पड़ता है! हम तो सो रहे थे, और सोते हुए को तो पूरी माफ़ी है। सोते हुए से कौन तर्क करेगा? आप घोर निद्रा में चले जाइये, उसी को समाधि कहते हैं, उसी को जागृत-सुषुप्ति कहते हैं।

श्रोते ३: आप उकता नहीं जाते?

वक्ता: सो रहे थे, उकता नहीं पाए; जब जगेंगे तो उकता लेंगे।

(सभी हँसते हैं)

श्रोता ३: विचार बार-बार आते हैं…

वक्ता: कोई आया था? हमें पता नहीं चला, हम तो सो रहे थे! कोई चला गया, कब?

दो रहिये, उपनिषद दो पक्षियों का चित्र खींचते हैं: एक खा रहा है, एक देख रहा है और दोनों बिलकुल एक से। वैसे ही आप भी दो रहिये; एक काम करता रहे, घूमता रहे, फिरता रहे, और एक? सोता रहे अभी एक यहाँ है जो बोल रहा है, और एक सो रहा है, पड़ा हुआ है। और सोते वाले को मत छेड़िए, जगा हुआ जो करे सो करे इसके मर्ज़ी है। इसका काम है इधर-उधर करना, चीखेगा, चिल्लायेगा, बोलेगा, कूदेगा, उठेगा-बैठेगा, जो करना है करे। सोते हुए को मत जगाना। सारी आध्यात्मिकता इस छोटे से सूत्र में है, क्या?

सोते हुए को मत जगाना; उसे सोने दो, छेड़ो मत!

शक्ति नाचती रहती है, शिव?

श्रोतागण: समाधि में रहते हैं।

वक्ता: समाधि में रहते हैं, उसी समाधि को सोना कह रहा हूँ।

श्रोता २: सोना कहिये या जागना कहिये, उस स्थित में नहीं हैं तो एक बार को और चीज़े याद भी रहेंगी।

वक्ता: जो जगा है उसे याद रहेंगी।

श्रोता २: मोह के समय वैसा नहीं होता है, उस समय तो जो सोया हुआ है वो भी जाग जाता है।

वक्ता: देखिए मोह भी इसी ‘धारणा’ पर बैठा है कि आपका कुछ छिनेगा। मेरा है – मम ! अब आपका एक रुपया छिने तो आपको तकलीफ नहीं होती ज्यादा; लाख छिने तो थोड़ी होती है। क्यों होती है? क्योंकि लाख आपको अपना ज़्यादा बड़ा हिस्सा लगता है। तो मोह आपको उस विषय से नहीं है, उस वस्तु से नहीं है, उस लाख रुपय से नहीं है; आपको जब भी मोह हुआ है अपने-आप से हुआ है।

ये मैं हूँ और ये एक लाख रुपय हैं (अपनी बांह की ओर इशारा करते हुए), एक लाख रुपय को मैंने अपना इतना बड़ा हिस्सा बना लिया है। अब अगर लाख रुपया छिनता है तो? मैं अपंग हुआ; अब अगर लाख छिना तो मैं अपंग हुआ, आप समझ रहे है न?

ये मत कह दीजियेगा कि मुझे तुझसे मोह है, उससे मोह नहीं है। वो ये(बांह) बन गया है। (बांह दिखाते हुए) वो ‘मैं’ से संयुक्त हो गया है, वो अब ये बन गया है। अब वो जाता है तो आपको लगता है कि ये कटा! अपने से मोह है। चलिए हो भी सकता है ये कट भी जाये, क्योंकि ये बात सही है कि वो ये बन गया है। पर उसके आगे कि जो आपकी कहानी है वो झूठी है। उसके आगे की कहानी ये है कि आप कहते हो कि “ये कटा तो मैं नष्ट हो जाऊंगा, मैं भी कटूंगा”। आप नहीं कटोगे, ये झूठ है!

बिलकुल हो सकता है कि कोई व्यक्ति आपके जीवन से जाये तो आपको ऐसा लगे कि जैसे बाजू कट गया आपका, बिलकुल हो सकता है। लेकिन, बाजू कटने से आप फिर भी नहीं कटोगे। अखंड रहना स्वभाव है। कुछ नहीं है जो आपको बढ़ा-घटा सके, संकुचित कर सके या आप में कुछ जोड़ सके। बड़ी से बड़ी प्राप्ति आपको कुछ दे नहीं सकती, और बड़े से बड़ा नुकसान देखना कितने मज़े में झेल जाओगे। उसकी कल्पना से डरते हो, बैठे-बैठे कल्पना करते हो कि, “कुछ हो गया तो मेरा क्या होगा”? जब कुछ होगा तो देखना यही कहोगे कि “फालतू डर रहे थे, हाँ दर्द हो रहा है, पर हम पी गए”। नहीं, ऐसा नहीं है कि दर्द नहीं हो रहा है, बाजू कटा पर हम जी गए। कुछ हमारे पास ऐसा है जिसे कोई नहीं काट सकता!

‘मोह’, ये मान के चलता है कि आप सिर्फ बाहरी हिस्सों का संकलन हैं। इसीलिए जानने वालों ने ब्रह्म को जो नाम दिए हैं, उनमे से एक नाम ये भी कहता है कि “वो हिस्सों का संकलन नहीं है”। उसके अनवयव नहीं है, अनवयव समझते हो? हिस्से; तो उसे अनवयव कहते हैं।

श्रोता ४: वो अखंड है मगर किसी खंडो का जोड़ नहीं है।

वक्ता: बहुत अच्छे! कट ही नहीं सकता! और तुम क्या हो? तुम अवयवो का ही समूह हो। कुछ यहाँ से लाये गए, कुछ वहाँ से लाये गए, कुछ जोड़े गए, तो इसीलिए डरते हो। तुम्हारी वास्तविकता के कोई हिस्से ही नहीं है, वो कट ही नहीं सकती।

थोड़ा सा प्रयोग करके देखो न, चलो बड़े वाले डर को चुनौती नहीं दे पाते हो, छोटे वाले को दे लो। देखो कितना बड़ा तुम्हारा नुक्सान कर जाता है और फिर ये भी देखो कि वो नुक्सान बड़ा है या तुम ज़्यादा बड़े हो? छोटे-मोटे प्रयोग तो कर ही सकते हो।

बलि का, क़ुरबानी का, भेंट का वास्तविक अर्थ यही है कि “जिससे बड़ा मोह हो गया हो, बड़ी आसक्ति हो गई हो, ज़रा उससे हट कर देखो, देखो कि क्या खोया?”

अब तुम डरते-डरते हटते हो, ये जांचने भर के लिए कि क्या खोया और अक्सर पाते ये हो कि कुछ पा लिया।

जिसने भी डर को चुनौती दी है, जिसने भी डर से लड़ने के बाद अपने घाव गिनने की कोशिश की है, उसने यही पाया है कि “सोचा ये था कि कुछ खोया! और खोया क्या हम तो नुकसान गिनने के लिए तैयार थे, यहाँ तो नफा हो गया”। हम तो तैयार थे कि “बड़ा नुक्सान हुआ होगा”, अब बस बताओ कि नुकसान हुआ कितना, और खबर ये आई कि “नफा हो गया”। पर नफे की उम्मीद में मत लड़ जाना फिर नुक्सान हो जाएगा। तुम यही मान के चलो कि नुकसान होगा, लेकिन साथ में…

श्रोता २: जो भी चीज़ें सुन लेते हैं न, खासकर यह कि ये उम्मीद नहीं करना वो उम्मीद तो पक्का होयेगी।

वक्ता: कर लो।

श्रोता २: जैसे ये हैं न कि ये शब्द मत सोचना तो फिर वो तो दिमाग में ही घूमता रहेगा।

वक्ता: घूमने दो, बस इतना और घूमने दो दिमाग में कि ‘जो भी कुछ घूम ले दिमाग में, कुछ है जो दिमाग से बड़ा है।

जैसे, रेलवे स्टेशन पे घूमती मक्खियाँ सामने से आते हुए इंजन पर कोई प्रभाव तो नहीं डालती न। वो भिन-भिना रही हैं और खूब घूम रहीं है, भिन्न… पूरे स्टेशन में भरी हुई हैं और सामने से आ रहा है हज़ारों घोडा-ताकत का इंजन। वो सत्य का इंजन है; ये आपके भिन-भिनाते हुए विचार हैं, ये उसका क्या बिगाड़ लेंगे? न ये उसको ज़्यादा जल्दी बुला सकते हैं, न उसका आना रोक सकते हैं। वो तो अपनी गति से चलता है, अपना मालिक आप है। इनका काम है भिन-भिनाना, ये तो विचार हैं भिन-भिनाने दो। या अब मक्खियाँ उद्घोषणा करेंगी कि ट्रेन लेट है, या कि जाके पटरी जाम करेंगी, कि अब बढ़ने नहीं देंगे इंजन को। इतनी ही हैसियत है विचारों की, जैसे इंजन के सामने मक्खियों की।

जैसे डरने की लत लगती है , निर्भयता की भी समझ लो कुछ-कुछ वैसी ही लत लगती है; उसका भी चस्का होता है। दोनों तरफ कुछ-कुछ आदत जैसी ही बात होती है, किसी को डरने की आदत लग जाती है किसी को न डरने की। हालांकि दोनों में बड़ा अंतर है; बड़ी दूर की बातें हैं, अलग-अलग आयाम हैं लेकिन फिर भी समझाने के लिए कह रहा हूँ कि दोनों समझ लो आदतें जैसी ही हैं। एक बार न डरने का चस्का लग गया फिर उसमें ऐसा रस है, कि फिर डर लाख बुलाएगा और तुम हाँ नहीं बोलोगे, तुम कहोगे, “यही ठीक है”। पर शुरुआत करनी पड़ती है, शुरुआत हमेशा सबसे ज़्यादा मुश्किल होती है।

डर को समझ लो कि जैसे ज़बरदस्ती का वज़न हो किसी मोटे आदमी पर। अब जब वज़न ज़्यादाहै तो मांस ही मांस है; मांसपेशियाँ बहुत कम हैं, चर्बी खूब। उसे जब वज़न घटना है दौड़ के, सबसे ज़्यादातकलीफ कब होगी उसे?

श्रोतागण: शुरू में।

वक्ता: बिलकुल शुरू में सबसे ज़्यादा तकलीफ होगी उसे क्योंकि अभी वो बहुत ज़्यादा है जिसे घटना है जिसको हटाना है और वो कम है जो हटाने में मदद करेगा। हटाने में मदद क्या करेगा? दौड़ना। दौड़ने के लिये क्या चाहिए? मांसपेशियाँ। मांसपेशियाँ हैं कम और बोझ है बहुत ज्यादा, तो न दौड़ने की सबसे ज़्यादा इच्छा तब होगी जब दौड़ने की तुम्हें सबसे ज़्यादा आवश्यकता है। और सबसे ज़्यादा दौड़ कौन रहे होतें हैं?

श्रोतागण: जिनकी मांसपेशियाँ ज़्यादा हैं।

वक्ता: जिनके मांसपेशियाँ खूब हैं, और वसा-चर्बी भी कम हैं; वो न भी दौडें तो चलेगा पर अब उनको मज़ा आ रहा है, और दौडें जा रहे हैं। देख रहे हो दोनों ओर आदत है और दोनों ओर जो जहाँ हैं उसको वहीं पर रस है। अब जिसका शरीर सुगठित हो गया, वो तो दौड़ेगा उसको तो चलने का भी अवसर मिलेगा तो दौड़ जाएगा। और जिसका शरीर बेडौल हो गया, उसको तो दौड़ने को भी कहोगे तो थोड़ी देर में सरकने लगेगा। यही बात मन पर भी लागू होती है, जैसा शरीर है, समझ लो कि मन में, मानसिक दुनिया में भी यही बात लागू होती है।

भय को, विचारों को, संस्कारों को—इनको मन की चर्बी जानो। ये मन का नाहक का बोझ है, ये ज़बरदस्ती चढ़े हुए हैं।

और आत्मा को मन की माँसपेशी जानो; आत्मा को मन की ऊर्जा जानो। वो मन को सुन्दर गति देती है!

और ये बाकि सब, ये मन को तामसिक बनाते हैं या मन को भगाते भी हैं तो ऐसी दिशा में जहाँ वो और वसा इकठ्ठा करे। जो राजसिक मन होता है वो भागता तो ज़रूर है, पर उसके भागने से उसका बोझ कम नहीं होता। वो भाग-भाग के और बोझ इकठ्ठा करता है कि जैसे कोई कुली जिसने सर पे खूब बोझ रखा हुआ हो, वो और भाग रहा है और इकठ्ठा करने के लिए।

~ ‘शब्द योग’ सत्र पर आधारित। स्पष्टता हेतु कुछ अंश प्रक्षिप्त हैं।

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