विश्वविद्यालय विज्ञान, तकनीक, अर्थशास्त्र और दुनिया का ज्ञान तो देते हैं, लेकिन जानने वाले मनुष्य की जाँच करना नहीं सिखाते। बाहरी उपलब्धियाँ तब अधूरी रह जाती हैं जब शिक्षा आत्मज्ञान, चेतना और इरादे की शुद्धता से न जुड़ी हो। केवल जानकारी बढ़ने से लोभ, भय और अहंकार समाप्त नहीं होते; वही ज्ञान शोषण और विनाश का साधन बन सकता है। पूर्ण शिक्षा वही है जो विद्या और अविद्या, दोनों का संतुलन सिखाकर मनुष्य को स्वयं को समझने और अपनी चेतना को मुक्त करने की दिशा दे।
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Originally published in Navbharat Times on 12 July '26
तीस मई को मैं कैम्ब्रिज यूनियन के उस कक्ष में, जहाँ कभी चर्चिल और हॉकिंग को सुना गया था, कैम्ब्रिज के प्रोफ़ेसर जयदीप प्रभु के साथ संवाद में था। सामने अर्थशास्त्र और प्रबंधन के विद्यार्थी भी बैठे थे। प्रश्न अच्छे थे, तीखे थे, ईमानदार थे। पर एक बात जल्दी साफ़ हो गई। पढ़ाई चाहे जितनी ऊँची हो, आदमी एक जगह आकर रुक जाता है। वहाँ कोई सिद्धांत साथ नहीं देता, कोई डिग्री मदद नहीं करती। वहाँ सवाल दुनिया का नहीं रह जाता, सवाल पूछने वाले का हो जाता है। सत्र एक घंटे का तय था, पर बातचीत दो दिनों तक चलती रही।
और जो कैम्ब्रिज में दिखा, वही पूरे दौरे में दिखा। ऑक्सफ़ोर्ड में, ब्रिटिश संसद में, लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में, खुले संवादों में। प्रश्न अलग-अलग थे, कमी एक ही थी। लोग बहुत कुछ जानते हैं, पर अपने बारे में नहीं जानते। यही इस लेख का विषय है: संसार के श्रेष्ठतम विश्वविद्यालय क्या पढ़ाते हैं, और क्या नहीं पढ़ाते।




