संसार पर शक़ और कृष्ण पर श्रद्धा || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

प्रश्नकर्ता: प्रणाम, आचार्य जी। दसवें अध्याय के लगभग पूरे ही श्लोकों में श्रीकृष्ण के विराटतम स्वरूप का वर्णन है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि देवता और महान ऋषि भी उनके स्वरूप एवं उत्पत्ति को नहीं जानते, स्वयं देवता और ऋषिगणों आदि का भी भगवान श्रीकृष्ण से ही उद्गम है। इसी प्रकार उनके कितने ही स्वरूपों और महिमाओं का वर्णन किया गया है। प्रश्न उठता है कि इस प्रकार सर्वोच्च और सर्वशक्तिमान होकर भी ईश्वर क्यों मनुष्य रूप में इस पृथ्वी पर आते हैं?
आचार्य प्रशांत: अब क्यों, कहाँ, कब, किसलिए, किसकी ख़ातिर, किस तरीके से, ये सारे प्रश्न भेद की भाषा में होते हैं, ये सारे प्रश्न द्वैत की भाषा में हैं। इन सारे प्रश्नों में कार्य-कारण विभाग अनुगत है न, कि कुछ हो रहा है तो उसे कोई करने वाला है और जो कर रहा है, उसके पास करने के लिए कोई वजह है। तो ये सारी बातें, ये सारे प्रश्न, यह सारा विवाद संसार पर लागू होता है; मनुष्य की दुनिया का है।
हम जो कुछ करते हैं, उसके पीछे कुछ वजह होती है, है न? - ‘क्यों’। हम जो कुछ करते हैं, वह कहीं पर होता है – ‘कहाँ’। हम जो कुछ करते हैं, वह किसी समय होता है – ‘कब’। हम जो कुछ करते हैं, वह किसी के लिए होता है – ‘किसके लिए’, ‘कौन’। तो हमने निष्कर्ष क्या निकाला? कि वह जो हमसे पार का है, वह भी कुछ कर रहा होगा तो कोई ‘क्यों’, ‘कब’, ‘किसलिए’, ‘कहाँ’ इत्यादि ज़रूर होगा।
इससे हमारे बारे में क्या पता चल रहा है? हम यह नहीं मान रहे हैं कि उन्होंने हमें बनाया है, हम मान रहे हैं कि हमने उन्हें बनाया है। हमने उन्हें बनाया है तो हमारे ही जैसे होंगे। हम बिना वजह कुछ करते नहीं तो उनके पास भी वजह होंगी। आदमी की यही करतूत है। यह तो अब हम नहीं जानते कि हम किसी ईश्वर की रचना हैं या नहीं, पर यह पक्का है कि जिसे हम ईश्वर कहते हैं, वह हमारी ही रचना है। इसीलिए हम अपने सब गुण, अपनी सब मंशाएँ अपने ईश्वर पर भी थोप देते हैं, आरोपित कर देते हैं। तो हमारा ईश्वर भी जो कुछ करता है, वो समझ लीजिए कि हमारी ही तरह करता है।



