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संसार की सारी उपलब्धि कृष्ण के बिना व्यर्थ है || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्।।

तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोमरस को पीने वाले, पापरहित पुरुष मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं।

— श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ९, श्लोक २०

प्रश्नकर्ता: इसका मर्म क्या है, आचार्य जी?

आचार्य प्रशांत: जो पहला प्रश्न था, वो यही तो प्रश्न था कि जो पूजोगे, वो पा जाओगे। सोमरस माने जो माँग रहे हो। जो भी तुम पूजोगे, वह तुम्हें मिल जाएगा। जिस भी चीज़ के लिए श्रम करोगे, इस दुनिया में वह देर-सवेर मिल ही जानी है। तो यही तो कह रहे हैं कि जो माँगोगे, वो देंगे। लेकिन भोगने के बाद पुनः वापस आओगे क्योंकि जो भोगा है वह पूरा नहीं पड़ेगा, मन नहीं भरेगा।

दुनिया में हमेशा ऐसा थोड़े ही होता है कि माँगो तो नहीं मिलता। अब तो धीरे-धीरे इंसान ने अपना भौतिक सामर्थ्य, अपनी बौद्धिक काबिलीयत इतनी बढ़ा ली है कि माँगता है तो पा ही लेता है। जैसे-जैसे समय बीतेगा और बढ़ा लेगा। यही बात यहाँ श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि, "तुम बोलो कौनसा सकाम कर्म करना चाहते हो?" सकाम कर्म माने कामना-युक्त कर्म। कौनसी कामना रखना चाहते हो? जो कामना रखोगे, पूरी तो हो ही जाएगी। आगे कहते हैं कि पूरी होने के बाद भी रहोगे तो तुम भिखारी जैसे ही।

तुम जाओ, स्वर्ग का सुख भोग आओ, तुम जाओ देवताओं की तरह रह आओ, लेकिन उसके बाद भी यही कहोगे कि बात कुछ बनी नहीं। भाई, आज का जो पाँच सितारा होटल है, वो उस समय के स्वर्ग लोक की कल्पना से बहुत नीचे तो नहीं है, कि है? नहीं है न? तो जाओ स्वर्ग में रह आओ, महीने भर रह आओ, उससे मोक्ष मिल जाएगा? मुँह तो फिर भी आलू जैसा ही रह जाएगा। या ऐसा होता है कि महीने भर वहाँ रह आए तो बिलकुल आमूल-चूल परिवर्तन हो गया? होता है क्या? नहीं होता न?

यही बात श्रीकृष्ण समझा रहे हैं कि तुम देवताओं की पूजा करो, तुम्हें स्वर्ग मिल जाए। तुम कर आओ मज़े जितने करने हैं, उसके बाद भी मुँह तुम्हारा ऐसे ही रहेगा जैसे सूखी तुरई। निर्दयी हैं बिलकुल, यह भी नहीं कह रहे हैं कि स्वर्ग नहीं मिल सकता। बड़ी आसानी से स्वर्ग उठाकर दे दिया। बोले कि, "हाँ! मिलेगा। बोलो क्या-क्या चाहिए? सोमरस चाहिए? मिलेगा। अप्सराएँ चाहिए? मिलेंगी। स्वर्ग को लेकर तुम्हें जो-जो कल्पनाएँ हैं, वह सब तुम्हारी साकार हो जाएँगी। सब मिलेंगी।"

एकदम सस्ती चीज़ बना दिया श्रीकृष्ण ने स्वर्ग को। अगर कहते कि नहीं मिलेगा, तो हममें थोड़ी उत्सुकता हो उठती, स्वर्ग का भाव थोड़ा और बढ़ता। हम कहने लगते कि बड़ी ऊँची चीज़ है, मिलती ही नहीं। उन्होंने कहा कि, "मिलेगा न, कुछ नहीं है! स्वर्ग में क्या है? अभी लो। यह लो स्वर्ग।" सूखी तुरई, चुसा आम, जैसी भी तुम्हारी शक्ल है, स्वर्ग में रहने के बाद भी वैसी ही रहेगी। कर लो तुम्हें जितने भी देवी-देवताओं की उपासना करनी है।

श्रीकृष्ण वास्तव में आपको आत्मनिष्ठा, ब्रह्मनिष्ठा सिखा रहे हैं। यह जो वर्तमान धर्म में पचासों और सैकड़ों तरह के देवताओं के पूजन का विधान चल पड़ा है—अगर कोई भी गीता को समझता हो तो तत्काल ही सब देवी-देवताओं से हाथ जोड़ लेगा, कहेगा, “नमस्कार! तुम्हारी हम बहुत पूजा कर भी लेंगे तो अधिक-से-अधिक क्या मिलेगा? स्वर्ग। तुरई तो फिर भी सूखी रहेगी न। तुम मुक्ति नहीं दिला सकते, तुम अधिक-से-अधिक क्या दिला सकते हो? स्वर्ग।”

स्वर्ग का अर्थ है कि कामना पूरी हुई। स्वर्ग का अर्थ यह नहीं है कि कामना मिट गई है। स्वर्ग माने जो तुम बड़ी-से-बड़ी कामना कर सकते थे, पूरी हो गई। मिटी तो अभी भी नहीं न, अभी भी लगी हुई है। चार अप्सराएँ मिल गईं, लग रहा है पाँचवीं और मिल जाए तो बढ़िया रहे।

एकेश्वरवाद है एक तरह का, लेकिन अगर उपनिषदों के पास जाओ तो वो कहते हैं कि ईश्वर भी माया से ही संबंधित है। तो यह एकेश्वरवाद से भी आगे की बात है। यह एकब्रह्मनिष्ठा की बात है, यह वास्तव में विशुद्ध अद्वैत है।

नचा रहे हैं अर्जुन को, “बोल जमूरे, क्या माँगता है? स्वर्ग माँगता है? ले! कुछ मिला? कुछ नहीं मिला न। वापस आओ।”

भाई, पुराने समय से अगर तुलना करो तो आज आप स्वर्ग में ही जी रहे हो। आज से हज़ार-दो-हज़ार साल पहले आदमी जैसा जीवन जीता था, उससे अपनी तुलना तो करो। आयु दोगुनी हो गई है, बाहर का जो तापमान है यहाँ का तापमान उससे दस डिग्री नीचे है। स्वर्ग का विवरण देते हुए यही तो बताते हैं कि वहाँ मलय पवन के झोंके चलते रहते थे, शीतलहर चलती रहती थी। लो चल रही हैं मलय पवन, शीत लहरियाँ (ए.सी.) चल तो रही हैं।

तो आज, खासतौर पर अगर आप थोड़े धनिक वर्ग से आते हो, तो स्वर्ग में ही तो जी रहे हो। तब स्वर्ग में होता था कि वहाँ विमान चलते थे जो वायु मार्ग से ले जाते थे, आज आम आदमी भी वायु मार्ग से ही तो चल रहा है। तब यह बड़ी बात होती थी कि जो बड़े-बड़े राजा-महाराजा, या ऋषि-मुनि हैं या चमत्कारी सिद्धजन हैं, वही वायु मार्ग से चल पाते थे। और आज देखो, ये लो दस एयरलाइन हैं, किसके टिकट चाहिए? चलो वायु मार्ग से। तो मिल तो गया स्वर्ग। आदमी ने स्वर्ग माँगा, लो मिल गया स्वर्ग।

तब भी यह होता था कि फलाने लोक से उतरे, तो आज भी तो हो रहा है। आदमी चंद्रलोक तक जा तो रहा है यान पर बैठ करके। तो उस समय जो मात्र कल्पना थी, आज तुमने सार्थक कर तो ली है। अब तो तुम्हारे डी.एन.ए. के आधार पर तुम्हारी मृत्यु के बाद भी बिलकुल तुम्हारे ही जैसा एक पैदा किया जा सकता है, है कि नहीं? क्लोनिंग जानते ही हो।

जो बातें एक हज़ार साल पहले ही कल्पनातीत थीं, वो बातें आज साकार हो चुकी हैं। बल्कि जिन बातों की कल्पना आपने तब स्वर्ग में भी नहीं की थी, कि स्वर्ग में यह सब होता होगा, वो सब बातें आज आम आदमी को भी सुलभ हैं। आदमी ने पा तो लिया स्वर्ग। उसके बाद भी शक्ल कैसी है? कैसी है? सड़ा करेला। तो मिला हुआ है स्वर्ग, लो।

विकसित मुल्कों में चले जाओ तो वहाँ तो पूरा-ही-पूरा स्वर्ग है। वहाँ तो जब बाहर का तापमान माइनस दस सेल्सियस होता है तो भी भीतर पच्चीस सेल्सियस होता है और जब बाहर पैंतीस-चालीस सेल्सियस हो रहा होता है तो भी भीतर बीस-पच्चीस सेल्सियस होता है। वहाँ तो धूल ही नहीं उड़ती। तो आ तो गया स्वर्ग।

अप्सराएँ-ही-अप्सराएँ हैं। चमत्कार के अड्डे (ब्यूटी पार्लर) हैं। वहाँ साधारण स्त्री घुसती है, अप्सरा बनकर निकलती है। उर्वशी वगैरह तो बेचारी शर्म खा जाएँ, हीन-भावना पकड़ लें आज की अप्सराओं को देखकर। यह चमत्कार तो उर्वशी को भी नहीं आता होगा कि बाल का रंग बदल लें और गोल-मोल बाल बिलकुल ऐसे सीधे हो जाएँ। रंभा-अंभा सब अचंभा मानेंगी, कहेंगे कि, "असली तो यहाँ है!"

तब तो अप्सरा बेचारी इस बात से सीमित थी कि जैसा तन उसको प्रकृति ने दिया है, वैसा ही रहेगा। अब तो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। बिलकुल सेब की बारीक कली जैसे आपके महीन होंठ हो, वो इतने बड़े-बड़े होंठ फुलाकर आ जाते हैं। देखा है? क्या बोलते हो उसको? लिप्स ऑग्मेंटेशन * । तब की किसी अप्सरा को यह करामात आती थी कि यह बड़े-बड़े होंठ निकले हुए हैं? नहीं-नहीं, * पाउट नहीं, पूरा-का-पूरा होंठ ही इतना बड़ा हो जाता है, सर्जरी से ही होता होगा।

शरीर के बाकी हिस्से भी आकार में दो गुना, चार गुना कर दिए जाते हैं। मेनका इत्यादि को यह सुविधा कहाँ उपलब्ध थी? यह तो आजकल है। बोलो कि कैसा बनना है? गोरा बनना है? बनेगा। बोल जमूरे बोल, जमूरी तू भी बोल।

बहुत पहले बता गए कृष्ण, ये सब कर लेने से कुछ पाओगे नहीं। ये सब देवता ही हैं जिनकी पूजा हो रही है। जब तुम जाते हो अपनी कॉस्मेटिक सर्जरी कराने तो तुम किसकी पूजा कर रहे हो, जानते हो? कामदेव की। तुम वहाँ पर भक्ति भाव से ही तो घुस रहे हो। तुम रति देवी के पुजारी हो।

भक्त तो सब हैं, पर सब भक्त हैं छोटे-मोटे देवी देवताओं के। कोई लक्ष्मी का पुजारी। क्यों? क्योंकि वह धन-पशु है। उसको पैसा-ही-पैसा कमाना है। वह भी तो भक्त है, काहे का भक्त है? वह लक्ष्मी का भक्त है। कोई कामदेव का भक्त है। किसी को गुस्सा बहुत आता है, वह अग्नि देव का बहुत बड़ा भक्त है। यही बात यहाँ बता रहे हैं कि छोटे-मोटे देवी-देवताओं की पूजा करते रहो, वह सकाम भक्ति है। वो सकाम भक्ति का फल तो तुमको मिल जाएगा, लेकिन उस फल में तुम पाओगे कि कीड़े लगे हुए हैं।

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