संसार है मोतियों की माला, और कृष्णत्व है उसमें छुपा धागा || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात्। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्।।
श्रीभगवान बोले – हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरा परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराटरूप तुझको दिखलाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११, श्लोक ४७
श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः।।
श्रीभगवान बोले – मेरा जो चतुर्भुज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दश है अर्थात् इसका दर्शन बहुत ही दुर्लभ है। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं।
—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ११, श्लोक ५२
प्रश्नकर्ता: परम पूज्य आचार्य जी, भगवान श्रीकृष्ण के जिन दो रूपों का वर्णन उक्त श्लोकों में है, कृपया उसका तात्पर्य समझाएंँ। श्रीकृष्ण अर्जुन को ऐसा क्यों कहते हैं कि उनके विकराल रूप को अर्जुन से पूर्व किसी ने नहीं देखा?



