परिपक्वता है अनावश्यक से मुक्ति || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2015)

उद्धरण : ये धारणा मन से निकाल दो कि तुम्हें गंभीर रहना है। तुम में से कोई ऐसा नहीं है जिसे खेलने-कूदने का मन न करता हो; तुम में से कोई ऐसा नहीं है जिसका व्यर्थ ही दौड़ लगाने का मन न करता हो; जिसका सब कुछ छोड़-छाड़ कर के यूँ ही किसी पहाड़ पे कभी बैठ जाने का मन न करता हो। पर तुम्हें लगता है कि ‘ये सब तो बचपना हो जाएगा, हम बचपना कैसे कर सकते हैं!‘ अपने आप को बचपने की अनुमति दो।
वक्ता: सवाल हैकि आज से पाँच-सात साल पहले खाते थे, पीते थे, खेलते थे और चैन की नींद सो जाते थे पर अब ऐसा नहीं होता। कुछ बदल सा गया है, तो तुम ही मुझे बताओ कि क्या बदला है?
श्रोता १:सर, सोचने का नज़रिया बदल गया है, टेंशन आ गई है मन में।
श्रोता २:सर, अब ज़्यादा ज़िम्मेदारियाँ आ गयीं हैं। उस वक़्त किसी और चीज़ की टेंशन होती थी और अब किसी और चीज़ की टेंशन होती है।
श्रोता ३:सर, हम जब छोटे थे तो ऐसा लगता था कि हम कब बड़े होंगे और जब बड़े हो गए तो ऐसा लगता है कि काश मुझे कोई वो बचपन लौटा दे। वो बचपन की छोटी-छोटी बातें बहुत याद आती हैं। सर ऐसा क्यों होता है?
वक्ता:



