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क्या गृहस्थी में उलझे लोगों के लिए भी अध्यात्म में जगह है? || आचार्य प्रशांत (2019)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आचार्य जी मेरा प्रश्न ये था कि जैसे हम यहाँ से शिविर करके जाते हैं और जिससे भी बात करते हैं, वो पूछते ही हैं कि भाई कहाँ गये थे, क्या किया। तो हम शिविर के बारे में पहले तो बता देते हैं कि अद्वैत बोध का शिविर इस तरीक़े से होता है। फिर उनका प्रश्न होता है कि आचार्य जी जिस तरीक़े से बेबाक, स्पष्ट बातें बताते हैं, तो हम घर-गृहस्थियों का क्या? जो शादी-विवाह में पहले से उलझ चुके हैं, जिनकी समस्याएँ ऐसी होती हैं कि पत्नी आना चाहती है तो पति इजाज़त नहीं देता या पति आना चाहता है तो पत्नी रोकती है।

तो उन लोगों के लिए क्या मार्गदर्शन है? कि क्या करें ऐसे असमंजस की स्थिति में? कभी बच्चे आड़े आ जाते हैं, कभी पति का समर्थन नहीं मिलता, कभी परिस्थितियाँ नहीं होतीं। तो क्या उनके लिए कोई मार्ग है या बिलकुल मार्ग ही नहीं है?

आचार्य प्रशांत: बात ये है ही नहीं कि मैं इस पर क्या मत रखूँगा। आप बीमार होते हो या आपका कोई स्वजन, प्रियजन बीमार होता है, आप उसे चिकित्सक के पास ले जाते हो। वो ये मत रख भी देता है कि भाई बहुत देर हो चुकी है, इनका कोई उपचार संभव नहीं है, तो आप क्या करते हो?

प्र: फिर भी कोशिश करते हैं।

आचार्य: आप फिर भी कोशिश करते हो। बल्कि जो चिकित्सक कह दे कि अब कोई उपचार नहीं हो सकता, उससे आप तत्काल आगे बढ़ जाते हो। आप दूसरे, तीसरे, चौथे, दसवें चिकित्सक के चक्कर लगाते हो। किसी चिकित्सक के ये कह भर देने से कि तुम्हारी हालत अब इतनी बिगड़ चुकी है कि कोई उपचार, कोई सुधार संभव नहीं है, मान तो नहीं जाते न!

प्र: नहीं।

आचार्य: तो बात चिकित्सक के मत की है या तुम्हारे प्रेम की है?

प्र: प्रेम की है।

आचार्य: चिकित्सक कुछ भी मत देता रहे, अगर तुममें प्रेम है जीवन के प्रति तो तुम मरे हुए जीवन को स्वीकार तो नहीं कर लोगे न! इसी तरीक़े से मुझसे पूछ रहे हो, ‘आचार्य जी, जो गृहस्थी में उलझ गये हैं, वहीं तड़प रहे हैं, उनके लिए कोई उम्मीद है या नहीं?’ मान लो मैंने कह दिया कि कोई उम्मीद नहीं है तो जो उलझ रहे हैं या उलझे-उलझे मरे जा रहे हैं, वो संतुष्ट हो जाएँगे? मिल गयी उनको सांत्वना या मुक्ति? कुछ नहीं न।

मैं कुछ भी कहता रहूँ, दुनिया का कोई परामर्शदाता कुछ भी कहता रहे, दुनिया के कोई ग्रंथ कुछ भी कहते रहें, तुम अगर बेचैन हो तो हो। तुम अगर भीतर से कुशल अनुभव नहीं कर रहे तो नहीं कर रहे। और जीवन के प्रति, एक स्वस्थ जीवन के प्रति, तुममें अगर उत्कंठा है तो है। कोई तुम्हें फिर लाख समझा दे कि तेरी ज़िंदगी तो अब बर्बाद हो गयी, अब सुधार की या मुक्ति की कोई गुंजाइश नहीं, तुम मान तो नहीं जाओगे न!

तो ये पूछना कि जो लोग गृहस्थी में उलझे हुए हैं, उनके लिए कोई उपाय है, रास्ता है, वैसा ही है कि तुम पूछो, ‘आचार्य जी, क्या अस्पताल में मरीज़ों के लिए भी कोई जगह है?’

तुम पूछते हो कि अध्यात्म में क्या उन लोगों के लिए भी कोई संभावना है जिनकी ज़िंदगी में गाँठ पड़ चुकी है, ताने-बाने उलझ चुके हैं, पचास तरह की समस्याएँ आ चुकी हैं, सौ बंधन हो गये हैं। मैं कह रहा हूँ कि ये ऐसा ही प्रश्न है कि जैसे तुम पूछो कि आचार्य जी, मेरा प्रियजन बड़ा बीमार है, उसे अस्पताल ले जाऊँ कि न ले जाऊँ।

अरे भाई! जो जितना ज़्यादा बीमार होगा, उसे अस्पताल की उतनी ज़्यादा आवश्यकता होगी न। या ये कहना चाह रहे हो कि जो अब ज़िंदगी से ऊपर उठ चुके हैं, जो अपनी सारी लड़ाइयाँ या तो जीत चुके हैं या पूरी तरह हार चुके हैं, उन्हीं को अध्यात्म में आना चाहिए?

ये तो वैसा ही हुआ कि तुम कह रहे हो कि अस्पताल में दो ही तरह के लोग मिलें : या तो वो जो पूरी तरह स्वस्थ हैं या वो जो पूरी तरह मुर्दा हैं। और अस्पताल में इन्हीं दोनों लोगों का कोई काम नहीं होता। अगर तुम पूरी तरह स्वस्थ हो, तो अस्पताल में क्या कर रहे हो? और अगर तुम मुर्दा हो, तो अस्पताल में क्या कर रहे हो? अस्पताल जाना ही किसको चाहिए? जो बीमार तो है मगर स्वास्थ्य की हसरत रखता है। ये हसरत, ये प्रेम ही बड़ी बात है न।

गृहस्थी में तुम उलझे हुए हो, गृहस्थी तुम्हारी उलझी हुई है, यही तो पर्याप्त कारण होना चाहिए अध्यात्म में आने का। बीमार हो तभी तो अस्पताल जाओगे या इंतज़ार करोगे मुर्दा हो जाने का?

लोगों का रुख थोड़ा विचित्र है, वो कहते हैं जब सब कुछ ठीक हो जाएगा तब सत्य की प्राप्ति पर निकलेंगे। पागल, जब सब ठीक हो ही गया तो सत्य को लेकर क्या सजाओगे? और दूसरी बात, बिना सत्य के सब ठीक हो कैसे जाएगा?

तो फिर वो आश्रम धर्म का हवाला देते हैं। कहते हैं, 'आएँगे, आएँगे। पचहत्तर के बाद आएँगे।' पचहत्तर के बाद तुम कहाँ जाओगे, हम जानते हैं। किसको बता रहे हो? पचहत्तर के बाद गंगा किनारे वाले शिविर में नहीं, गंगा किनारे वाले घाट में जाते हैं। जहाँ हमारा शिविर लगा है, उसी के बगल में घाट भी है। पचहत्तर के बाद वहाँ जाया जाता है।

गृहस्थी में इसलिए तो प्रवेश नहीं किया था न कि तमाम तरह के दु:ख पाओ? तो कम-से-कम अपने उद्देश्य का ही सम्मान करो। नौकरी क्यों करी थी? शादी क्यों करी थी? बाल-बच्चे क्यों करे थे? मकान क्यों खड़ा करा था? व्यापार क्यों बढ़ाया था? इसलिए कि काँटे ही काँटे चुभें? इसलिए कि दिन-रात माथा ठोको? ये सब क्यों करा था?

प्र: सुख के लिए। आनंद के लिए।

आचार्य: तो जिस उद्देश्य के लिए किया था, वो भूलो नहीं न। निकले तो तुम भी सुख, चैन, आनंद, शांति की तलाश में ही थे, बस चाल ज़रा अटपटी हो गयी, दाँव ज़रा उल्टा पड़ गया। वर्ना जीत तो तुमने भी चाही थी ज़िंदगी में। चाहा तो तुमने भी वही था जो किसी मुक्त पुरुष, किसी तत्वज्ञानी ने चाहा होता है और पाया होता है। चाहत तो बेटा तुम्हारी भी वही है जो किसी कबीर की, किसी अष्टावक्र की, किसी बुद्ध की, किसी नानक की होती है। चाह तुम कुछ अलग नहीं रहे हो। हाँ, बस तुम्हारा निशाना चूक गया।

अब ये मत कह देना कि हम तो चाहते ही नहीं हैं। झूठ तो बोलो मत। घर में पत्नी लेकर के तो इसीलिए आये थे कि स्वर्ग तुल्य सुख मिलेगा। तमाम तरह के उपक्रम इसलिए करे थे कि ये बस कर लें, फिर सब झंझटों से मुक्ति हो जाएगी। करा तो इसीलिए था। और अब क्या धता बताते हो? अब कहते हो, ‘नहीं साहब, मुक्ति हमें चाहिए नहीं! हमें तो झंझट ही प्यारे हैं। हम तो गृहस्थी के काँटों को ही गुलाब मानते हैं।’ ये तो बेईमानी कर रहे हो। मेरे साथ बाद में, अपने साथ पहले।

भूलो मत कि तुम्हें भी क्या चाहिए। जो तुम्हें चाहिए, उसका सम्मान करो और ये श्रद्धा रखो कि जो तुम्हें चाहिए, वो तुम्हें अभी भी हासिल हो सकता है। तुम्हारी कोई भी करतूत इतनी बुरी, इतनी पतित नहीं है कि वो तुमको आनंद के लिए, मुक्ति के लिए अपात्र बना दे। तुम कर लो अपनी घटिया-से-घटिया हरकत, तुम चढ़ा लो बड़े से बड़ा नशा, लेकिन मुक्ति के प्रति तुम्हारी पात्रता फिर भी बनी रहती है।

समझ में आ रही है बात?

ठीक वैसे ही जैसे बेटा कितनी भी घटिया हरकत कर ले, उसके बाप का नाम नहीं बदल जाता। तुम्हारी हरकतों का बाप के नाम से कोई सम्बन्ध होता है क्या? बाप तो बाप ही रहता है। पूत सपूत निकले चाहे कपूत निकले, बाप तो बाप है। वैसे ही ऊपर जो बाप बैठा है, वो अपनी जगह कायम है, नीचे चाहे तुम कपूत निकलो चाहे सपूत निकलो।

तुम इतनी भी लज्जा या ग्लानि मत पाल लेना कि कहो, ‘स्वामीजी, हमने तो कर्म अब ऐसे कर लिए हैं कि हमारे लिए तो मुक्ति संभव नहीं है। हाँ, ये चिंकी की मुक्ति हो सकती है तो इसको ले जाइए।’ और बेचारी चिंकी कुल डेढ़ साल की है अभी!

ऐसे भी बहुत होते हैं। कहते हैं, ‘बेटा, हमारा तो इस जन्म में छुटकारा होने से रहा। हम तो बड़े पापी हैं। तुम एक काम करो, ये मोनू को ले जाओ।’ ये आपकी विशाल हृदयता का सबूत नहीं है। ये आपके अज्ञान का सबूत है कि आप सोच रहे हैं कि जीवन की किसी भी स्थिति में आप उसके दरबार से बेदख़ल किये जा सकते हैं। वो नहीं करेगा बेदख़ल, तुम स्वयं ही वहाँ उपस्थित न रहो तो तुम्हारी मंशा।

जिसका सब ठीक-ठाक चल रहा हो उनके पास तो फिर भी शायद कारण होंगे संतों के पास न जाने के; आम गृहस्थ के पास तो संतों के पास जाने के कारण ही कारण हैं। सुबह से लेकर शाम तक प्रतिपल एक नया कारण है संतों के पास जाने का। ज़िंदगी बीतती कैसी है — सुबह चीखों से शुरुआत होती है और रात को थप्पड़ों पर अंत। अभी तुम्हें और कारण चाहिए कबीरों के पास जाने के? ये जो लगातार हाय-तौबा, जूतम-पैजार मची हुई है, इससे अभी आजिज़ (तंग) नहीं आये?

अभी कह रहे हो, ‘कुछ समझ नहीं आ रहा कि जाएँ कि नहीं।’ इतनी देर में भीतर से उड़ता हुआ बिलकुल नया वाला जूता चिपक गया। और क्या कारण चाहिए?

देखो, अपनी क्या शक्ल कर रखी है। देखो, तुमने अपने आसपास के लोगों की शक्ल क्या कर दी है। अपने बच्चों को देखो, उनकी मासूमियत छिनती जा रही है। तुम्हें ख़तरा नहीं दिखाई दे रहा? तुम अभी भी दुविधा में हो कि अध्यात्म की ओर जाएँ कि न जाएँ। तुम कब चेतोगे? जब बिलकुल अंतिम साँस होगी तब होश आएगा तुमको? “का वर्षा जब कृषि सुखानी।” सब कुछ लुटा कर होश में आये भी तो क्या किया!

प्र: आचार्य जी, आपने कहा कि अध्यात्म की ओर बढ़ने के लिए परिवार में माहौल होना चाहिए। यदि परिवार में विचलन का माहौल रहता हो तो?

आचार्य: तो और ज़्यादा। और ज़्यादा। जब मैंने कहा कि अध्यात्म की ओर जाने के लिए माहौल बड़ा आवश्यक है तो तुम्हें क्या लगा कि मैं कह रहा हूँ कि दैवीय माहौल चाहिए? मैं कह रहा हूँ घटिया से घटिया माहौल चाहिए। माहौल की बड़ी ज़रूरत है। जितना घटिया माहौल होगा उतना जल्दी भागोगे अध्यात्म की ओर। चिकित्सक के पास तुम्हें स्वास्थ्य ले जाता है या बीमारी?

प्र: बीमारी।

आचार्य: तो कौनसा माहौल चाहिए? बात तो ज़ाहिर है। देखो, बात माहौल की नहीं है। बात दूसरी है। बहुत साल पहले की बात है, एक कॉलेज का लड़का आया था। वो नशा करा करता था। मैंने उससे कुछ बातें कहीं और मैंने कहा — तू नशामुक्ति केंद्र का भी चक्कर लगा के आ।

तो हफ़्तेभर बाद मिला। मैंने कहा — तू गया वहाँ? वो बोलता है, ‘नहीं गया।’ मैंने कहा, ‘क्यों नहीं गया?’ बोला, ‘झूठ बोलूँ कि सच?’ मैंने डाँट लगाई। बोलता है, ‘वो बाज़ार में आजकल माल की सप्लाई (आपूर्ति) ज़रा मंदी है, तो हफ़्तेभर बहुत व्यस्त था। इसलिए नहीं जा पाया डॉक्टर के पास।’ वो हफ़्तेभर क्या कर रहा था? वो हफ़्तेभर कोकीन ढूँढ रहा था। इसलिए इतना व्यस्त था कि नशामुक्ति के लिए नहीं जा पाया।

ऐसे तुम व्यस्त रहते हो अपनी गृहस्थी में। जिस चीज़ से तुम्हें मुक्ति चाहिए, तुम उसी में व्यस्त रहते हो। फिर अपनी व्यस्तता को कारण बताकर के उपचार की ओर नहीं जाते हो।

बात समझ में आ रही है?

भाई को नशे की आदत, मैं हफ़्ते भर बाद पूछ रहा हूँ, ‘अभी तक गया क्यों नहीं जहाँ जाने बोला था?’ तो बोल रहा है, ‘बाज़ार टाइट (मंद) चल रहा है, माल आसानी से मिलता नहीं। हफ़्तेभर खोज रहे थे।’

ये तो तुम्हारी व्यस्तताएँ हैं! इन चीज़ों में तो व्यस्त रहते हो! और उसने जब मुझे बताया था तब उसकी नज़रों में उसकी व्यस्तता बिलकुल जायज़ थी, वैध थी। उसको बिलकुल नहीं लग रहा था कि वो जो बता रहा है, वो बात कभी एक मज़ाक की तरह उद्धृत की जाएगी। ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी नज़रों में तुम्हारी सारी व्यस्तताएँ बिलकुल जायज़ हैं। जायज़ हैं न?

जब भी तुम कोई कारण बताते हो, तो तुम्हारी नज़रों में तो वो बिलकुल ख़ालिस कारण होता है। दारूकार को ऐसे ही होता है कि नशे से मुक्ति के लिए इसलिए समय नहीं दे पाये क्योंकि नशे की तलाश कर रहे थे।

बात समझना, नशे से मुक्ति के लिए इसलिए समय नहीं दे पाये क्योंकि नशे की तलाश कर रहे थे। कि जैसे अध्यापक महोदय छात्रों को पाठ लिखवा रहें हों — ‘शराब पीने के क्या-क्या नुक़सान हैं?’ और गोपू लिख ही नहीं पा रहा। बाक़ी सब लिख रहे हैं — शराब पीने के नुक़सान, नंबर एक, नंबर दो, क्रमांक तीन . . . और गोपू लिख ही नहीं पा रहा। गोपू काहे नहीं लिख रहा? गोपू को चढ़ी हुई है। ये तो तुम्हारे कारण हैं मुक्ति की ओर न जा पाने के।

नशा हमारा इसलिए नहीं उतर रहा क्योंकि नशा उतारने के समय भी हम चढ़ा कर आये हैं। और इन कारणों के प्रति तुम्हारी बड़ी प्रतिबद्धता है। इसी को तो तुम कहते हो — मैं बहुत कमिटेड (प्रतिबद्ध) आदमी हूँ। बता रही थीं न, 'फ़ोन आये तो उठाना ही पड़ेगा। अब क्या करें, हम तो बहुत कमिटेड हैं।'

प्र२: आचार्य जी, युवाओं के लिए आपका क्या सुझाव है जिससे वे भविष्य में झंझटों से बच सकें?

आचार्य: तुम आगे के झंझटों में तब फँसोगे जब तुम्हें अभी का होश न हो। आगे के झंझटों की बात नहीं करो न, अभी की ज़िंदगी देखो। जितना ज़्यादा सोद्देश्य, शांतिपूर्ण, शांति के प्रति प्रेम से परिपूर्ण जीवन जिओगे, उतना आगे झंझट में फँसने की संभावना कम होती जाएगी।

झंझट बरबस ही तुम पर नहीं बरस पड़ते कि तुम सो रहे थे और सुबह उठे तो देखा, 'अरे! रात में झंझट पड़े थे क्या? ओले की तरह गिरे थे आसमान से?’ तुम बहुत समय लगाकर झंझट उगाते हो, झंझटों की खेती करते हो, बड़ी तल्लीनता के साथ। जैसे बच्चे बड़े किये जाते हैं न बड़ी देखभाल के साथ, वैसे ही तुम झंझटों को धीरे-धीरे सालों तक बड़ा प्रेमपूर्वक बड़ा करते हो। यूँही नहीं झंझट तुम्हारे जीवन में प्रवेश कर जाते।

एक दिन अचानक ही नहीं होता कि तुमने आँख खोली और पाया कि तुम्हारा ब्याह हो चुका है। तुमने पिछले दस साल से अपनी माँ को सिग्नल (संकेत) भेजने शुरू कर दिए थे कि स्त्री चाहिए। तुम्हारी हरकतें देखकर के तुम्हारे घरवाले एक दशक से समझ रहे थे कि सांड हुआ जाता है। तो वो झंझट अचानक से नहीं टपक पड़ा तुम्हारे घर में। तुमने दस साल तक अनथक प्रयत्न किये हैं कि ये झंझट मिलें। फिर बाद में किसी और को दोष मत दे देना कि अरे! हम तो चाहते भी नहीं थे पर दादी की अंतिम इच्छा थी।

दादी की अंतिम इच्छा का कोई लेना-देना नहीं है। चौदह की उम्र से तुम्हारे मोहल्ले से शिकायतें आने लगी थीं। बारह की उम्र में तुम आधी रात के बाद टीवी पर व्यस्क चैनल देखते पकड़े गये थे। तुमने तो करीब-करीब डंका पीट दिया था कि सोलह की उम्र में ही हमको दिलवा दो। वो तो घरवालों का आभार कि उन्होंने पच्चीस तक खींच दिया। तुम्हारा बस चलता तो तुम सोलह में ही नारा लगा देते कि संविधान संशोधन करो। ये बाल-विवाह चीज़ बुरी है ही नहीं।

और फिर कहते हो कि अरे! वो तो ज़माने ने बेड़ियाँ पहना दीं। दुनिया बड़ी फ़रेबी है।

दुनिया फ़रेबी है? तुम्हारे हाव-भाव, चाल-चलन देख करके अगर दुनिया को ये संदेश गया होता कि इस लड़के की रुचि सत्य और मुक्ति की तरफ़ है तो कौन डंडा लेकर तुम्हारे पीछे भागता कि ब्याह करो? बताओ। पर तुम तो ख़ुद उतावले हो जाते थे जहाँ किसी की शादी देखते थे।

छः-छः जिले दूर जब किसी के भी यहाँ शहनाई बजती थी तो ढोल तुम्हारे भीतर बजता था। 'माँ, मेरी कुड़माई कब होगी?' ये सब अपनी करतूतें होती हैं। किसी और पर दोष क्यों डालते हो? शैतान भी साधुओं से ज़रा दूर-दूर रहता है। एक आम विषाणु, वायरस भी उसी पर आक्रमण करता है जिसका प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर होता है।

तुम्हारे साथ क्या हो रहा है, ये तुम्हारी ज़िम्मेदारी है। कोई न कहे कि ज़ालिम ज़माने ने ज़ंजीरें पहना दीं। कोई नहीं तुम्हें ज़ंजीरें पहना रहा। एक ही घर में दो भाई होते हैं। एक के लक्षण कुछ और होते हैं, दूसरे के कुछ और होते हैं। घर में घुसते हैं शराबी-जुआरी, एक भाई को ले जाते हैं, दूसरे को छूते भी नहीं। दूसरे को क्यों नहीं छूते? उन्हें पता है कि ये साथ नहीं आएगा। तुम ऐसे क्यों नहीं हो कि शैतान तुम्हें छूए भी नहीं?

शैतान को पहले से ही पता हो कि ये साथ तो आने से रहा, इस पर आज़माइश बेकार है। तुम तो शैतान को चलता-फिरता न्योता हो। वो न भी आ रहा हो तो तुम उसकी पूँछ पकड़कर खींच कर लाओगे। पता है न शैतान की पूँछ होती है! उसके चित्र देखे हैं? उसकी पूँछ होती ही इसलिए है ताकि जवान लोग उसको खींच सकें, वो छुप भी रहा हो तो। और फिर कहते हैं कि ये कच्ची उम्र में तमाम तरह के बंधन पड़ गये; अब क्या करें? जीवनभर ढोने पड़ेंगे।

कौनसी कच्ची उम्र? तुम पच्चीस को कच्ची उम्र बोलते हो? दस-बारह के बाद से सब पकी उम्र के हो जाते हैं, कोई बच्चा नहीं रह जाता। शक़ हो तो बच्चों के पास जाकर देख लेना, वो तुमसे ज़्यादा पके हुए हैं। बीस-बाइस का होते-होते तुम बहुत हद तक अपनी किस्मत बना चुके होते हो। कुछ भी तुम्हारे साथ अनजाने में नहीं हो जाता।

प्र३: आचार्य जी, क्या स्त्रियों में कामुकता पुरुषों की अपेक्षा लम्बे समय के लिए हावी रहती है?

आचार्य: नहीं, ऐसा बिलकुल नहीं है कि पुरुषों की कामुकता क्षणिक है और स्त्रियों की दीर्घकालीन है। अगर तुम ऐसा कह रहे हो तो फिर अभी तुमने कामुकता को समझा ही नहीं है। तुम पुरुष हो न। एक बाइक का मॉडल भी आता है तो उसमें उभार दिये जाते हैं; वो तुम्हारी कामुकता को ही अपील की जा रही है। तुम्हें क्या लगता है कामुकता सिर्फ़ तब है जब तुम सक्रिय रूप से उत्तेजित होते हो? पुरुष की कामुकता भी सदा है और स्त्री की कामुकता भी सदा है।

तो हमारी एक-एक कोशिका कामुक है। हम कामुकता के ही केंद्र से संचालित होते हैं। तुम यहाँ तक कह सकते हो कि अहंता और कामुकता एक ही बातें हैं। दोनों मे कोई अंतर नहीं है। ये कहना कि कामुकता तो दिन में चार-पाँच मिनट के लिए धावा बोलती है, ऐसा ही होगा जैसे तुम कहो कि बाक़ी तेईस घंटे पचपन मिनट तो हम सत्यनिष्ठ रहते हैं।

दो ही केंद्र होते हैं: या तो राम या तो काम। राम के साथ तुम रहते हो पाँच ही मिनट, तो जो बाक़ी तेईस घंटे पचपन मिनट हैं, उसमें तुम कहाँ हो? काम के ही तो हो। ये तुम्हें किसने बता दिया कि पुरुष की कामुकता तो लघुकालीन होती है; बिजली की तरह चमकती है और फिर मिट जाती है?

ये बात जो तुम कह रहे हो, ये बड़े स्थूल तल की है। शायद तुम शारीरिक उत्तेजना की बात कर रहे हो कि दिन में पाँच मिनट के लिए पुरुष शारीरिक रूप से उत्तेजित हो जाता है। अरे! शारीरिक रूप से उत्तेजित हो चाहे न हो, मन तो कामुक ही है न। तो कामुकता कितनी देर रही? लगातार ही तो रही।

एक उम्र तुम्हारी आएगी जिसके बाद शरीर उत्तेजित होगा ही नहीं। लेकिन मन तो फिर भी कामुक है; मन तो नब्बे की उम्र में भी कामुक है। और कामुकता इसमें ही नहीं होती कि तुम स्त्रियों का विचार कर रहे हो। तुम पदार्थ के पीछे भाग ही रहे हो, भाग ही रहे हो, यही कामुकता है। और ये कामुकता लगातार है, स्त्री में भी और पुरुष में भी। इस कामुकता को हटाने का एक ही तरीक़ा है — राम; और कोई विकल्प नहीं है।

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