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क्या गीता तब भी उतनी ही प्रचलित होती यदि अर्जुन युद्ध हार जाता || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)

Author Acharya Prashant

Acharya Prashant

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प्रश्नकर्ता: गीता में अर्जुन किस वजह से युद्ध जीते? और अगर हारते तो भी क्या गीता का महत्त्व उतना ही रहता जितना आज है?

आचार्य प्रशांत: कृष्ण अर्जुन को कभी भी जीतने का भरोसा नहीं दिला रहे हैं, बल्कि कृष्ण तो अर्जुन को जीत और हार का विचार ही न करने को कह रहे हैं। ऐसा उन्होंने बिल्कुल नहीं कहा कि ज़रूर लड़ो क्योंकि मैं तुम्हारे साथ हूँ तो विजय निश्चित है। वो कह रहे हैं कि लड़ो क्योंकि इस वक़्त लड़ना ही धर्म है तुम्हारा। गीता का महत्व इसमें बिल्कुल भी नहीं है कि कृष्ण के समर्थन या मार्गदर्शन से अर्जुन विजयी हुए। बात जीत या हार की नहीं है, बात सही युद्ध करने की है, वो भी निष्काम भाव से।

और पूछा है कि "क्या गीता का महत्व इतना ही होता जितना आज है, यदि अर्जुन हार गए होते?" गीता का महत्व तो उतना ही होता। हाँ, आपकी दृष्टि में महत्व होता कि नहीं होता, वो आप जानें। जहाँ तक गीता की बात है, गीता के मूल्य पर क्या अंतर पड़ जाना है इधर-उधर की अन्य घटनाओं से? दुनिया में तमाम जो घटनाएँ घटती हैं, उनमें संयोग का भी एक बहुत बड़ा अंश निहित होता है। तो घटनाओं का क्या भरोसा? कभी कोई भी घटना घट सकती है, संयोग की बात है। योद्धा हैं, युद्ध कर रहे हैं, क्या पता क्या हो जाए?

आवश्यक थोड़े ही है कि किसी कर्ण के ही रथ का पहिया गड्ढे में धँसेगा और फँसेगा। किसी और के रथ का पहिया भी तो फँस सकता था। न जाने कितनी घटनाएँ थीं युद्ध में जो अनापेक्षित रूप से हुईं। ऊँट इस करवट भी बैठ सकता था, उस करवट भी बैठ सकता था। अधिकांशतः पांडवों के पक्ष में ही संयोग बैठा, ये बात मात्र संयोग की है, श्रीकृष्ण की कृपा की नहीं है। श्रीकृष्ण की कृपा के रहते हुए भी ऊँट उस करवट भी बैठ सकता था। पांडवों की हार भी हो सकती थी युद्धस्थल पर, धर्मस्थल पर हार नहीं होती उनकी।

एक बार कृष्ण की बात मानकर अर्जुन ने लड़ना स्वीकार कर लिया तो धर्मक्षेत्र में अर्जुन उसी पल तत्काल विजयी हो गए। अब कोई हार नहीं हो सकती। सही लड़ाई लड़ना अपने-आपमें जीत होती है। तो धर्मक्षेत्र में अर्जुन उसी पल विजेता हो गए जिस पल उन्होंने श्रीकृष्ण को समर्पण किया। लेकिन रणक्षेत्र में तो विजय का कुछ भरोसा नहीं न।

धर्मक्षेत्र की विजय आपके हाथ में है पूरी तरह से, और दुनिया के रणक्षेत्र में विजय मिलेगी कि नहीं मिलेगी, ये बात तो संयोग की है, और चूँकि संयोग की है इसीलिए बहुत महत्व नहीं रखती। मिली तो ठीक, नहीं मिली तो ठीक। हमारा काम था धर्म का पालन करना, हमने किया। अच्छी बात है जीत गए, न जीते होते तो भी कोई बात नहीं।

सदा ऐसा नहीं होने वाला है कि धर्म का पालन करते हुए आपको दुनिया में भी जीत मिल ही जाए। तब मन छोटा मत करिएगा और न ही शिकायत करिएगा। मत कह दीजिएगा कि हमनें तो कृष्ण की आज्ञा का पालन किया और देखो, हमें हार मिली। जो कृष्ण की आज्ञा का पालन कर रहा है, वो आज्ञा पालन करने के कारण ही जीत गया। आंतरिक जीत मिल गई उसको, और आंतरिक जीत ही मायने रखती है। बाहर की जीत, फिर दोहरा रहा हूँ, कोई निश्चित नहीं होती।

ये सिर्फ़ संयोग की बात है कि रावण के विरुद्ध राम जीत गए और कौरवों के विरुद्ध पांडव जीत गए। उल्टा भी हो सकता था। बहुत युद्ध ऐसे भी हुए हैं जिसमें ऊपरी तौर पर देखें तो जो पक्ष धर्म की तरफ से लड़ रहे थे, उनकी हार हुई है। गुरुओं की गर्दनें कटी हैं। कर्बला का मैदान याद कर लीजिए।

बल्कि अगर आप कुल लेखा-जोखा करेंगे तो आपको दिखाई देगा कि दुनिया के कुरुक्षेत्रों में तो मामला करीब-करीब बराबर का ही रहा है। धर्म का सूरमा कभी हारा है तो कभी जीता भी है। कोई ये उम्मीद लगाकर के ना बैठे कि धर्म की तरफ से लड़ेगा तो दुनिया में उसे जीत हासिल होगी ही होगी। नहीं, ऐसा नहीं है। और साथ-ही-साथ मैंने ये भी कहा कि धर्म की तरफ से जो लड़ेगा, उसे धर्म की तरफ से लड़ने के कारण ही जीत तत्काल मिल गई। कौन सी जीत तत्काल मिल गई? आतंरिक।

बाहर वाली जीत, उसकी बहुत परवाह मत करिए, क्योंकि बाहर वाली जीत की आप परवाह कर रहे हो तो इसका मतलब ये है कि आप कृष्ण की बात सुन ही नहीं रहे। कृष्ण तो कह ही यही रहे है न कि बाहर जीत मिलती है या हार, इसकी तुम फ़िक्र करना ही नहीं, यही कह रहे है न? और आप कृष्ण की बात सुन ही इसीलिए रहे हो अगर कि बाहर जीत मिलेगी तो फिर आपकी बहुत श्रद्धा नहीं है श्रीकृष्ण में। आप बस लालचवश उनके पास पहुँच गए हैं कि “अर्जुन को जिता दिया आपने, हमें भी जिता दीजिए न।”

कोई यूँ ही भूला-भटका राह चलता तीर आ करके अर्जुन का खेल ख़त्म भी कर सकता था। कोई भरोसा होता है? उससे गीता का महत्व कम नहीं हो जाता। हाँ, आपकी नज़रों में गीता का महत्व ज़रूर कम हो जाता, क्योंकि आप गीता के पास सीखने नहीं जाते, आप गीता के पास जीत का लालच ले करके जाते हैं।

हम गीता के पास इसलिए नहीं जाते क्योंकि श्रीकृष्ण के दर्शन में और उपदेश में मूल्य है। हम गीता के पास भी इसलिए जाते हैं क्योंकि हमें सांसारिक तल पर अपने दुश्मनों को हराना है, उन्हें हराकर राज्य और सत्ता को हथियाना है।

तो उस दृष्टि से ठीक कह रहे हैं आप। अगर पांडवों की हार हुई होती तो आम आदमी की नज़र में तो गीता का महत्व कम हो ही जाता। लोग कहते, “अरे, फायदा क्या हुआ? अठारह अध्याय कह दिए। अर्जुन बेचारा जोश में आकर कूद पड़ा, और मारा गया न। इससे अच्छा तो वो चुपचाप इधर-उधर कहीं निकल जाता। शांति से रह लेता या संधि कर लेता। पाँच बेचारे लड़कों को मरवा दिया और साथ में न जाने कितने सैनिक।” तब ये अभियोग लग जाता। हम ऐसे ही लोग हैं।

इससे आपको ये भी समझ में आ गया होगा कि अधिकाँश लोगों को भगवद्गीता से कोई लाभ क्यों नहीं होता है, क्योंकि हम गीता के पास भी वैसे ही जाते हैं जैसे हम किसी बाजार में, दुकान में, किसी रिश्ते में जाते हैं — अपने स्वार्थों के चलते, अपने लालच के चलते। और फिर हम ताज्जुब करते हैं कि इतने दिनों से पढ़ रहे हैं, कुछ समझ में क्यों नहीं आया? इतने दिनों से तथाकथित अपनी साधना कर रहे हैं, कोई लाभ क्यों नहीं हुआ? कैसे होगा लाभ? आप जो हो, वही बने रहते अपने लिए लाभ के आकांक्षी हो। आध्यात्मिक ग्रंथ इसलिए थोड़े ही हैं कि आप जैसे हो, आपको वहीं पर और पुख़्ता कर दे।

कई बार तो स्थिति यहाँ तक आ जाती है कि लोगों का धर्मग्रंथों पर से विश्वास न उठ जाए, इसकी ख़ातिर इतिहास को झूठ से भर दिया जाता है। जहाँ हार हुई हो, उसको जीत कर दिया जाता है, जीत को हार कर दिया जाता है, काले को सफेद, सफेद को काला, क्योंकि हम अपने नेता को, अपने धर्मगुरु को सांसारिक दृष्टि से विजेता देखना चाहते हैं। क्यों? क्योंकि हमें भी संसार में विजेता होना है। हमें संसार के पार नहीं जाना है। हमारा क्या उद्देश्य है? हमें तो जी इसी दुनिया में रहना है, इसी दुनिया को जीतना है। क्यों जीतना है? जीतेंगे तभी तो भोगेंगे। तो हमारी पूरी नज़र ही दुनिया को जीतने और भोगने पर लगी हुई है।

अब ऐसे में हमें कोई मिल जाए धर्मगुरु जो अपनी निजी ज़िंदगी में दुनिया से हारता हुआ प्रतीत होता है, उसने लड़ाइयाँ लड़ीं, वो हार गया, उसकी संपत्ति छिन गई, उसको सम्मान नहीं मिला, इस तरह का उसका जीवन वृत्तांत हो, तो हमें बड़ी तकलीफ हो जाएगी उसको गुरु मानने में। हम कहेंगे, “ये लो, ये तो इनका हाल था। पाँच इन्होंने लड़ाइयाँ हारी, किसी ने दो पैसे की इज़्ज़त नहीं दी।” तो फिर कहानियाँ रची जाती हैं। कहानियाँ ये रची जाती हैं कि "नहीं, साहब, इन्होंने हारा नहीं था, ये जीते थे।” इतिहास ही पलट दिया जाता है। मिथ्स (मिथकों) का निर्माण किया जाता है। किसके लिए? हमारी ख़ातिर। हम बड़े ज़िद्दी लोग हैं, मानते ही नहीं।

हमें कोई सच्चा मार्गदर्शक नहीं चाहिए होता, हमें भाड़े का गाइड (मार्गदर्शक) चाहिए होता है, जो चले तो आपके आगे-आगे लेकिन चले आपके अनुसार ही। आप उससे बोलो, “रुको,” तो रुक जाए। आप कहें, “बढ़ो,” तो बढ़ जाए। आप कहें, "छोड़ो, आज का बहुत हो गया," तो कहे, “जी।” आप कहें, "फलानी जगह दिखा दो," तो फलानी जगह दिखा दे। आप कहें, "नहीं, वो वाली जगह नहीं देखनी," तो कहे, “जी।”

हम जिसको आगे-आगे भी अपने चलाना चाहते हैं, हम जिसके पीछे भी चलना चाहते हैं, हमारी इच्छा यही रहती है कि रहे वो भी हमारे नियंत्रण में ही। गड़बड़ है।

प्र२: अर्जुन को ये सवाल क्यों हुआ? उसमें माया ज़्यादा थी इसलिए या माया कम थी इसलिए?

आचार्य: जिस ओर से देखोगे, वैसा दिखाई देगा। अगर कृष्ण होकर देखोगे तो ऐसा लगेगा कि अर्जुन पर माया छा गई है इसलिए ऐसे सवाल कर रहा है। और अपने पैमानों से देखोगे तो दिखाई देगा, “अरे, अर्जुन पर माया बहुत कम है, तभी तो ऐसे सवाल कर पा रहा है।” वो तो निर्भर करता है न कि कम और ज़्यादा के तुम्हारे पैमाने क्या हैं, मापदंड क्या है।

कृष्ण की दृष्टि से देखोगे तो अर्जुन की बुद्धि पर माया छाई हुई है। पर अपने तल से देखोगे तो दिखाई देगा कि अर्जुन की बुद्धि पर तुम्हारी अपेक्षा बहुत कम माया है। जितनी माया आम आदमी के मन पर चढ़ी होती है, उससे बहुत कम माया है अर्जुन के मन पर, तभी तो कृष्ण से सवाल कर पा रहा है और चुपचाप खड़ा हो करके उत्तर सुन पा रहा है।

तो वो निर्भर करता है कि किस दृष्टि से देख रहे हो। अर्जुन पर जितनी भी माया है, वो शून्य से ज़्यादा है और अतिशय से कम है। नहीं कह सकते कि बिल्कुल नहीं है माया, है माया। और न ये कह सकते है कि बहुत ज़्यादा है क्योंकि बहुत ज़्यादा होती तो सुनता नहीं।

प्र२: अगर श्रीकृष्ण उनके सारथी न होते, कोई आम आदमी होता तो अर्जुन का वहाँ युद्ध में क्या होता?

आचार्य: तो अर्जुन, अर्जुन क्यों होते? एक आदमी को सारथी वैसा ही मिलता है जैसा वो होता है। अगर अर्जुन, अर्जुन हैं तो उन्हें कृष्ण जैसा सारथी मिलेगा-ही-मिलेगा। ये कोई संयोग की बात थोड़े ही है, ये कोई अनायास थोड़े ही हुआ था कि अर्जुन को कृष्ण मिल रहे हैं सारथी और कर्ण को शल्य। सारथी मतलब जो आपके साथ है, जो आपका रथ संभाल रहा है, आप ही तो चुनते हैं न। अर्जुन अगर अर्जुन हैं तो वो कृष्ण को चुनेंगे। कोई और आ कैसे जाएगा उनके रथ पर?

आदमी का पता कैसे लगता है? उसकी ज़िन्दगी के चुनावों से। आप जो हो, वैसा ही आप चुनाव करते हो। कोई और कैसे आ जाएगा? आप ये थोड़े ही कह सकते हो, "आदमी मैं बहुत अच्छा हूँ, बस काम बहुत गलत करता हूँ," या कि "आदमी मैं बहुत होशियार हूँ, बस चुनाव सारे बेवकूफी भरे करता हूँ।" ऐसा कह सकते हो? या "आदमी तो मैं बहुत आध्यात्मिक हूँ, लेकिन ज़िन्दगी के मेरे सारे निर्णय अज्ञान से ओत-प्रोत हैं।" पर हमें अच्छा लगता है ये कहना कि "आदमी तो मैं बहुत आध्यात्मिक हूँ, पर काम सारे मूर्खता के करता हूँ।"

आपके कर्म बताते हैं कि आप क्या हो। अगर आपके कर्मों में अज्ञान है और मूर्खता है तो काहे अपने-आपको आध्यात्मिक बोलकर अध्यात्म का अपमान कर रहे हो? और अगर आपके कामों में बोध है, प्रकाश है तो आप अपने-आपको आध्यात्मिक बोलें कि न बोलें, आप आध्यात्मिक हैं।

प्र३: अध्यात्म के बारे में बिना बात किए रहा भी नहीं जाता और आस-पास के लोग सुनना भी नहीं चाहते। तो क्या आध्यात्मिक चर्चा करना जारी रखूँ या अभी उचित समय नहीं आया है? कृपया समझाने की अनुकम्पा करें।

आचार्य: कह रहे हैं कि अध्यात्म की बातचीत करनी बहुत ज़रूरी लगती है पर जिनसे वो बातचीत करते हैं, वो लोग सुनने को तैयार भी नहीं होते, तो क्या करें? किनसे करते हैं अध्यात्म की बातचीत? किनसे करते हैं? देखिए, पूरी प्रक्रिया को समझिए कि हम कर क्या रहे हैं। जब आप कहते हैं कि "मैं आध्यात्मिक हो गया और अब मैं अध्यात्म के बारे में बातचीत करना चाहता हूँ," तो वो बातचीत आप करने किससे जाते हैं? किससे करने जाते हैं? बोलिए। अरे, सभी करते होंगे। किससे जाते हैं करने?

श्रोतागण: आस-पास के लोगों से।

आचार्य: तो आसपास के लोगों से। किसके आसपास के लोगों से? जहाँ आप हैं वहीं आसपास के लोगों से। माने जहाँ आप पहले से हैं वहीं आसपास के जो लोग हैं, उन्हीं से बातचीत करने पहुँच गए। उन्हीं से बातचीत करने क्यों पहुँच गए? क्योंकि हमें वहीं रहना है जहाँ हम हैं, अध्यात्म आए कि जाए। अरे, बहुत अध्यात्म आएँ, वो हमें हमारी जगह से थोड़े ही उखाड़ देंगे। हम वहीं रहेंगे, जहाँ हमें रहना है। तो फिर हमारे आसपास के लोग भी वही हैं, जैसे हैं। उन्हीं से हम बात करेंगे।

आप जहाँ हैं वो जगह ही आध्यात्मिक नहीं है तो आपके आस-पास के लोग कहाँ से आध्यात्मिक हो गए, भाई? वो क्यों सुनें आपकी बात? लेकिन आप जाओगे उन्हीं के पास क्योंकि आपने भी ठान रखी है कि मुझे बदलना तो है नहीं।

आप जहाँ हो, अगर आप वहीं पर स्वस्थ थे, सहज थे तो आपको अध्यात्म की ज़रूरत क्या है? अध्यात्म न कोई अनिवार्यता है, न कोई शौक है। अध्यात्म दवाई की तरह है; दवाई न अनिवार्य होती है, न शौकिया होती है। दवाई तो एक विवशता होती है, बीमार हो गए तो चाहिए। आप जहाँ थे, अगर वहाँ सब कुछ ठीक चल रहा था, आपके आस-पास के लोग भी सब ठीक थे तो आप अध्यात्म में आए क्यों? आप अध्यात्म में आएँ क्योंकि आप जहाँ हो वो जगह ठीक नहीं है। चूँकि वो जगह ठीक नहीं है इसीलिए आपके आस-पास जो लोग हैं, वो भी निश्चित रूप से ठीक नहीं हैं। ठीक? तो इसलिए तो आप अध्यात्म में आए।

लेकिन अध्यात्म में आने के बाद भी वापस आप वहीं चले जाते हो जहाँ आप हो, उन्हीं लोगों से फिर आप मिलना-जुलना शुरू कर देते हो जिनसे परेशान हो करके आप अध्यात्म में आए थे। ये बात कुछ समझ में आई नहीं। और फिर बड़ी मासूमियत से आ करके सवाल करते हो. "आचार्य जी, वो लोग कुछ समझ नहीं रहें।" भाई, अगर वो लोग कुछ समझते ही होते तो तुम्हें मेरे पास आने की ज़रूरत ही क्यों पड़ती, पहली बात। वे ही लोग तुम्हें समझा दिए होते, उन्हीं की संगति तुम्हें फल गई होती।

ये निश्चित समझिए कि आप जब अपने पुराने माहौल में लौटकर के जाएँगे, आपकी बात कोई नहीं समझने वाला। आपका पुराना माहौल, फिर कह रहा हूँ, अगर होता ही बड़ा प्रकाशित और बड़ा स्वस्थ तो आप विवश होकर यहाँ क्यों बैठे होते दवाई लेने के लिए? आप यहाँ बैठे हुए हो इसी से ये प्रमाणित हो जाता है कि जहाँ से आप आ रहे हो, वो जगह कुछ गड़बड़ है। और अगर वो जगह गड़बड़ है तो वहाँ के लोग भी गड़बड़ हैं।

आप आ गए वहाँ से उठकर, वो आए क्या? आप जहाँ से यहाँ आएँ हो, आपके साथ के लोग आए क्या यहाँ पर? अगर उन्हें अध्यात्म से इतनी ही रूचि होती, इतना ही प्रेम होता तो आप यहाँ अकेले बैठे होते? वो साथ नहीं आ जाते?

वो लोग ही वही हैं जिन्हें अध्यात्म से अधिकांशतः कुछ लेना ही देना नहीं। एकाध-दो अपवाद हो तो मैं नहीं कहता। एकाध-दो अपवाद हो सकते हैं, पर निन्यानवे प्रतिशत वो वही लोग होंगे जिन्होंने आपको इतना परेशान किया कि आपको यहाँ आकर बैठना पड़ा। निन्यानवे प्रतिशत वो वही लोग होंगे जिनको आप बताएँगे कि आप यहाँ आ रहे हो तो वो आपके रास्ते का काँटा ही बनेंगे।

और आप मासूमियत से चले जाते हो उन्हें बताने के लिए, “देखो, मैं गया था और मैंने ये सब सीखा,” और आप फिर सोचते हो कि वो तालियाँ बजाएँगे और बधाई देंगे, मिठाई बाटेंगे। उनका शिकार छिन रहा है, उनके मुँह का निवाला छिन रहा है। शहनाई बजाएँगे इस बात पर?

और ये सवाल भी बहुत आता है, "आचार्य जी, आचार्य जी, आपकी इतनी अच्छी-अच्छी बातें मैंने नुन्नू भैया को बताई, वो तो खुश ही नहीं हुए। आचार्य जी, आचार्य जी, मेरे घर वाले बिल्कुल पसंद नहीं करते।"

शेर से शिकार छीनों, शेर बहुत बड़ा होता है, बुरा अनुभव करेगा। अगर मैं कह दूँगा, "शेर से शिकार छीनों।” गीदड़ से हड्डी छीनों, कुत्ते से रोटी छीनों, वो क्या करता है? दाँत दिखाता है न? फिर। या खुश हो जाता है? "गीदड़ खुश हुआ," ऐसे बोलता है? तो तुम गीदड़ों के बीच वापस जाओगे और उनको बताओगे कि उनकी बोटी अब छिनने वाली है, वो गले लगा लेंगे तुमको?

कोई एकाध होगा पूरे मोहल्ले में जिसको ये जानकर ख़ुशी होगी कि तुम अब झूठ से आज़ाद होने वाले हो। एकाध कोई, सौ में से कोई एक होगा। निन्यानवे लोगों का तो चेहरा उतर जाना है, जैसे ही तुमने उन्हें बताया कि अब सच्चाई की तरफ बढ़ रहे हो, बेवकूफियों से दामन छुड़ा रहे हो। उन्हें दुःख भी होगा और ईर्ष्या भी होगी। ईर्ष्या समझते हो न? उन्हें पता है कि वो फँसे हुए हैं, उन्हें पता है कि उनमें इतनी हिम्मत नहीं कि आज़ादी की तरफ बढ़ सकें। उनके दिल जल उठते हैं कि हम यहीं रह गए, ये पट्ठा निकल भागा। और तुम अपनी मासूम शक्ल लेकर वहाँ खड़े हो जाते हो, ‘नुन्नू भैया’, ‘पम्मी दीदी’। कहते हो, “लोग तो बहुत अच्छे हैं।”

अच्छे-बुरे का पहले निर्धारण करना सीख लो, उसके बाद बन जाना तुम मिशनरी (प्रचारक), कि हमने जो-जो बातें सीखी हैं शिविर में, हम भी औरों को सिखाने आएँ हैं। जो दूसरों को बताने चले, सर्वप्रथम उसमें इतना दम होना चाहिए कि वो दूसरों से प्रभावित न हो जाए। तुम गए थे दूसरों को समझाने, वो चार ने मिल करके तुम्हें समझा दिया। हो गया, जय कन्हैया लाल की, हाथी घोडा पाल की।

यहाँ रहते हो तो एक आदमी हो, ये चौखट पार करोगे, बिल्कुल दूसरे आदमी हो जाओगे। हो जाते हो, इस बात का ध्यान रखना। यहाँ तुमको लग रही होगी बड़ी शान्ति, यहाँ तुम्हें लग रहा होगा कि बड़ा बोध जगा है। यहाँ आने पर तो ऐसा लगता है कि जैसे सब चीज़ साफ़ हो गई, ज़िन्दगी कितनी सहज है, सरल है, एक-एक गुत्थी सुलझ गई, एक-एक राज़ खुल गया। कुछ नहीं खुल गया है। वो इस माहौल का असर है कि मन के सब विकार जब तक यहाँ रहते हो, तब तक दब जाते हैं। इस जगह की ताक़त है वो, तुम्हारी अपनी ताक़त नहीं है। तुमने नहीं यहाँ आ करके यकायक माया को जीत लिया, इस जगह ने जीता हुआ है। तुम इस जगह के प्रभावक्षेत्र में हो, फ़ील्ड में हो, अभी इसलिए तुमको बहुत सारी बातें अभी बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रही हैं, समझ में आ रही हैं।

कह तो रहा हूँ, ये दहलीज़ लाँघो और फिर देखो कि कितनी समझ कायम रहती है। एकदम दूसरे आदमी हो जाओगे। पुराना कुछ शेष नहीं रहेगा क्योंकि वो जो पुराना है, अभी आपका अपना नहीं है। पुराने से मेरा आशय है वो जो आपको इस जगह पर अभी मिल रहा है, अनुभव हो रहा है, वो इस जगह का है, आपका अपना नहीं है। धीरे-धीरे वो आपका भी हो जाएगा। जब तक न हो, तब तक सर्वप्रथम अपनी सुरक्षा की फ़िक्र कर लीजिए। दूसरों को राह दिखाने मत निकल पड़िए। अभी आप इस लायक नहीं हैं कि जाएँगे और दूसरों को रोशन कर देंगे। अभी तो आपकी लौ इतनी मद्धम है और इतनी कमज़ोर है कि बाहर की ज़रा-सी हवा लगी नहीं कि बुझ जाएगी। अभी अपनी रक्षा पर ध्यान दीजिए।

जो स्वर्ग यकायक मिल जाए, वो असली नहीं हो सकता, भाई। कमाना पड़ता है। इसीलिए अंग्रेजी में बोलते हैं, ’टू गुड टू बी ट्रू’ , ज़्यादा अच्छा है तो झूठा होगा। यहाँ आकर आपको जो सुंदर-सुंदर, मीठे-मीठे अनुभव होने लग जाते हैं वो ’टू गुड़ टू बी ट्रू’ हैं, वो असली नहीं हैं।

कल रात को दस-ग्यारह बजे आपकी विदाई हो जाएगी, जय राम जी की। उसके बाद बताना कि भीतर कितना मलय पवन बह रहा है और कितनी स्वर्गतुल्य शांति अभी बची हुई है। असली परीक्षा तब शुरू होगी। ये तो प्रशिक्षण स्थली है, ट्रेनिंग अकेडमी है। यहाँ आओ, कुछ दिन सीखो। क्या सीखा, उसकी आज़माइश तो बाहर होनी है। बाहर पता चलेगा कि बच्चू में कितना दम है।

और अभी से बताए देता हूँ, बहुत जल्दी बहुत सारा दम नहीं आ जाने वाला है। तो ये न हो कि किसी मुग़ालते में आकर किसी बहुत बड़े मायावी पहलवान को चुनौती दे दो। वो पटक-पटककर हड्डी-पसली सब एक कर देगा। अभी तुम फ़ेदर वेट हो, तो बाहर अगर जाकर पंगे लेना भी तुम तो अपने ही वज़न के किसी खिलाड़ी से। बाहर एक-से-एक मायावी पहलवान घूम रहे हैं। तुम्हें लगा कि हम तो अब आश्रम से होकर आएँ हैं, हमें अब कोई क्या हानि पहुँचा सकता है?

ख़ुदा मेहरबान, गधा पहलवान। बहुत पीटे जाओगे। और उसके बाद दोष देते हो तुम आचार्य जी को, कि आपने तो हमें इतना सिखा-पढ़ा दिया, हम बड़े आत्मविश्वास से भर गए और बाहर आ करके हमने फन्ने खां को चुनौती दे दी, और एक सौ आठ में से एक सौ छः हड्डियाँ अब टूट गई हैं। धीरे-धीरे होता है, बहुत धीरे-धीरे होता है, बहुत समय लगता है। बहुत पुरानी बीमारी है, तत्काल नहीं कट जाती।

प्र४: मैं बचपन से ही बहुत डरा हुआ और दु:खी था। फिर मैंने उसका उपाय के लिए जब समझा तो उपाय के लिए मैंने गीता पढ़ी, रामायण पढ़ा, अष्टावक्र गीता पढ़ी, कबीर के वचन सुने, ओशो को भी बहुत सुना, आपके भी वीडिओ बहुत सुने। उसके बाद विपश्यना भी की, ध्यान विद्या भी की, लेकिन आज भी मैं वही डर और वही दुःख पाता हूँ। और मुझे तब जब सुनता भी हूँ, तब लगता भी है कि मैं समझ रहा हूँ, लेकिन आज भी वही-की-वही स्थिति है।

आचार्य: जो पढ़ा उस पर अमल कितना करा?

प्र४: उसको ध्यान और विपश्यना की विधियाँ की।

आचार्य: पहले आपने नाम लिया था अष्टावक्र गीता का, श्रीमद्भगवद्गीता का, ठीक है? तो वहाँ जो कुछ भी पढ़ा, उस पर अमल कितना करा? उसको संकल्प करके जीवन में कितना लाए?

प्र४: अंदर से।

आचार्य: अरे!

प्र४: ऐसा भी है अष्टावक्र गीता में कि बाहर तो कुछ बदलना नहीं है। जो भी है अंदर से होगा।

आचार्य: वैसा भी है। बिल्कुल चुन-चुनकर भी वही मत बताइए कि जिस पर अमल थोड़ा टेढ़ा लगता हो। जो बहुत सीधा-सीधा है, उस पर बताइए, उस पर कितना अमल करा?

प्र४: साक्षी बनने का कोशिश किया।

आचार्य: ये बहुत दूर की बात है। ये जो हम दूर के लक्ष्य उठाते हैं न, हमारा इरादा ही यही रहता है कि इतनी दूर के हैं कि कभी मिलने तो हैं नहीं। तो सब धावक एक बराबर हो जाएँगे। छह सौ किलोमीटर की मैराथन हो जाए तो स्वर्ण पदक किसे मिलेगा? किसी को भी नहीं। तो अब अच्छा रहता है। इतनी दूर का लक्ष्य बना दो कि वहाँ तक कोई नहीं पहुँच सकता, तो अब कोई शर्म की बात ही नहीं है हम भी नहीं पहुँचे तो।

छोटी-छोटी बातें बताइए जो कि जीवन में, व्यवहार में उतारी जा सकती हैं। ठीक है? गीता का नाम है कर्मयोग के लिए, तो श्रीकृष्ण कह रहे हैं 'निष्काम कर्म'। वो कह रहे हैं, “तुमने अपने जितने भी ये काम-धंधे और कर्तव्य पकड़ रखे हैं, अर्जुन, इनको छोड़ दो, और बस वो काम करो जो सही है और परिणाम की परवाह बिल्कुल करो मत।” तो पहला काम, अपने सारे ये जो तुमने कर्तव्य इत्यादि बना रखे हैं, वो छोडो। तो छोड़े फिर गीता को पढ़ने के बाद?

प्र४: मतलब कर्म तो हो ही जाएँगे।

आचार्य: अरे, जो पूछ रहा हूँ सीधे बताइए। अर्जुन से कह रहे हैं कि “अर्जुन, तुमने व्यक्तिगत स्तर पर अपने लिए जितने भी कर्म इत्यादि निर्धारित कर रखे हैं, उनको छोड़ दो।” तो छोड़े कि नहीं छोड़े?

प्र४: कोशिश की।

आचार्य: नहीं, कोशिश थोड़े ही होता है। पकड़ने में कोशिश की जा सकती है। छोड़ने की कोशिश करनी पड़ती है? बताइए, क्या छोड़ने की कोशिश करनी पड़ेगी? पकड़ना बड़ी कोशिश का काम है। छोड़ने में तो कोशिश नहीं, नीयत चाहिए। तो छोड़ा कि नहीं छोड़ा?

प्र४: काम या कर्ता, मतलब कोशिश की कर्ता की ओर।

आचार्य: फिर कोशिश। छोड़ा कि नहीं छोड़ा?

प्र४: काम कैसे छोड़ूँ?

आचार्य: फिर यही बोलिए न कृष्ण को कि “आप जो भी कुछ कह रहे होंगे, वो सब ठीक है अपनी जगह, किताबी बात है, किताबों में शोभा देती है। छोड़ कैसे दूँ?” बोलिए। और अगर ये बोलना है तो कम-से-कम उनका नाम तो मत ख़राब करिए ये कहकर कि "मैंने ये ग्रन्थ पढ़ लिया, वो ग्रन्थ पढ़ लिया फिर भी कोई लाभ नहीं हो रहा।”

सीधे बोलिए, “ग्रंथों में जो लिखा है, मैं उसके विरोध में हूँ। मुझे उसका पालन नहीं करना। मुझे अपनी बात ग्रन्थ की बात से ज़्यादा बेहतर लगती है।” तो फिर आप अपनी बात पर चलिए, आप ग्रन्थ का नाम क्यों ले रहे हैं?

हम अपने-आपको कृष्ण से कतई छोटा थोड़े ही मानते हैं। वो कह रहे होंगे ‘निष्काम कर्म’, वो कह रहे होंगे कि “तुम सब अपने धर्मों-कर्तव्यों को छोड़ो, सीधे मेरी शरण में आओ।” हम कहते हैं, “अजी साहब, कैसे छोड़ दें अपने धर्मों-कर्तव्यों को? उनसे बड़ा लाभ मिलता है, बड़ा मज़ा आता है।”

जैसे कोई जाए किसी डॉक्टर (चिकित्सक) के पास और डॉक्टर उसको नुस्खा, प्रिस्क्रिप्शन लिखकर दे दे। दवाई भी दे दे हाथ में, कि ये लो, ये लिख दिया है। वहाँ जाओ कंपाउंडर से दवाईयाँ ले लो, दवाईयाँ भी दे दी। और फिर वो आए महीने भर बाद, "कोई फायदा नहीं हो रहा, आप कैसे डॉक्टर हैं? आपका प्रिस्क्रिप्शन है, आपकी दवाइयाँ हैं, कोई फायदा नहीं हो रहा।"

डॉक्टर पूछे कि "दवाइयाँ ले रहे हो नियमित रूप से?" बोले, "नहीं, दवाइयाँ क्यों लूँगा? आप अपना काम करिए न। मुझे फायदा होना चाहिए। दवाइयाँ मैं क्यों लूँ? अपना मैं देखूँगा न। आप अपना काम ठीक से करिए। आप बताइए, आपने पर्चा लिखा, मुझे फायदा क्यों नहीं हुआ? और मैं पूरी दुनिया को जाकर बताऊँगा कि ये डॉक्टर जो है, किसी काम का नहीं है। इसका पूरा पर्चा मैंने पढ़ डाला, मुझे कोई लाभ नहीं हुआ। तीस दिन में तीस बार मैंने इसका पर्चा पढ़ा है, प्रिस्क्रिप्शन , कोई फायदा नहीं हो रहा।"

“दवाई?” "नहीं, दवाई छोड़िए न। हमारी अपनी घरेलू औषधि चलती है हींग के लड्डू। हमारे यहाँ पुश्तैनी इलाज चलता है। ये क्या आप दवाइयाँ लिखकर दे रहे हो? इलाज तो मैं अपना वही करूँगा जो मुझे करना है। लेकिन आप डॉक्टर कैसे हैं? ये आपका पर्चा कैसा है कि मुझे कोई फायदा नहीं हो रहा? करूँगा तो मैं वही जो मुझे करना है। ये सब गोलियाँ हटाइए लाल, नीली, पीली। सौंठ की बर्फी, दादी की दादी की दादी ने ये नुस्खा निकाला था, और उसका हमारा पूरा खानदान कर्तव्य मानकर पालन करता है, खानदानी नुस्खा।"

जी तो हम सब अपने खानदानी नुस्खों पर ही रहे हैं न? पूरा खानदान आज तक जो करता आया, वो ही हम भी कर रहे हैं, और दोष दे रहे हैं कृष्ण को कि इनकी गीता से फायदा नहीं हो रहा। डॉक्टर की दवाई तुम खा नहीं रहे। खा रहे हो खानदानी तुम हींग के लड्डू, और इलज़ाम जा रहा है कृष्ण और अष्टावक्र पर कि इनके प्रिस्क्रिप्शन से कोई फायदा तो हो नहीं रहा।

अगर तुम दु:खी हो और परेशान हो तो दोष उन लोगों को दो जिनके नुस्खों पर तुम वाकई चल रहे हो। और जानते हो किसके नुस्खों पर तुम चल रहे हो? तुम भीड़ के नुस्खों पर चल रहे हो, तुम अपने पूर्वजों-पुरखों के नुस्खों पर चल रहे हो। उन्हीं की बताई सीख पर अमल कर रहे हो। और यही सोचते हो कि "ये तो बहुत ऊँची बात है, हमारे ददा ने बताई थी। हमारे ददा कृष्ण से कुछ कम थे क्या?"

आपसे पूछा जाए कि कुछ कम मानते हैं आप अपने पुरखों-पितरों को कृष्ण से? तो आपको बड़ी उलझन हो जाएगी। कोई आपके पिता के बारे में कुछ कह दे तो तत्काल कह देंगे, "ऐ, बाप पर मत जाना।” वहीं इसी जगह पर आप ही कृष्ण की अवमानना कर रहे हो तो आपके ये बिल्कुल बुरा नहीं लगता। यहाँ कोई नहीं कहेगा, "ऐ, राम और कृष्ण पर मत जाना," कोई नहीं कहेगा। लेकिन बाप के लिए तत्काल बोल देते हो न, "ऐ, बाप पर मत जाना।” देख लो फिर कि तुम किस धर्म पर चल रहे हो, बाप के धर्म पर या कृष्ण के धर्म पर?

जिसके नुस्खे का तुम सेवन कर रहे हो, भाई, अगर शिकायत करनी है तो उसकी करो न। अष्टावक्र की, कृष्ण की और कबीर की क्यों शिकायत कर रहे हो? उनकी बात तुमने मानी है कभी? जिनकी बात तुम मान ही नहीं रहे, उन पर लांछन लगाने वाले कौन होते हो तुम? और बात जिनकी तुम मान रहे हो वाकई, तुम्हारी हिम्मत नहीं है कि जा करके उनके मुँह पर बोल दो कि "तुम्हारी सलाह पर चला, तुम्हारी शिक्षा पर चला, तुम्हारी ज़िंदगी देख करके अपनी ज़िन्दगी बनाई मैंने, और बर्बाद हो गया मैं।"

है हिम्मत तो जाकर बोलो न इधर के वर्मा जी, इधर के शर्मा जी से कि "तुम्हीं को देख-देखकर तो चल रहा था।” क्योंकि ऐसे ही जीते हैं हम जैसे शर्मा जी जी रहे हो, जैसे वर्मा जी जी रहे हो, हम भी उन्हीं की नक़ल कर लेते हैं। जा करके बोलो नानियों से, दादियों से, दादा से, परदादा से कि "आपकी ये जो परम्पराएँ चल रही थीं, उन्हीं परम्पराओं का मैंने पालन किया और बर्बाद खड़ा हुआ हूँ। जवाब दो मुझे।" उनसे जवाब माँगने की हिम्मत नहीं है। तत्काल इलज़ाम लगा दोगे तुम धर्मपुरुषों पर, गुरुओं पर, ग्रंथों पर।

जैसे किसी की साइकिल पंक्चर हो जाए और वो जाकर मर्सिडीज़ की दूकान में शिकायत डाले। चल रहे हो साइकिल पर, और साइकिल पंक्चर हो गई है तो धरना प्रदर्शन कहाँ कर रहे हो? मर्सिडीज़ की फैक्ट्री के आगे, कि "यहाँ से घटिया माल निकलता है। देखो, साइकिल मेरी पंक्चर हो गई।"

अरे, वो मर्सिडीज़ है, उसका तुम्हारी साइकिल से लेना-देना क्या? ये तुम्हारी पुश्तैनी खानदानी साइकिल है, सामाजिक साइकिल है। ये तुम्हें जहाँ से मिली है, जा करके उनसे जवाब माँगो न, कि "ये तुमने क्या साइकिल दी जो बर्बाद है हमारी ज़िन्दगी बिल्कुल?" उनसे नहीं पूछोगे, क्योंकि उनसे पूछोगे तो टाँग तोड़ दी जाएगी। समाज से, जाति से और घर से बहिष्कृत कर दिए जाओगे। और जो सब स्वार्थ मिलते हैं, उनकी पूर्ति बंद हो जाएगी।

जाकर पिताजी से बोल दिया कि "पिताजी, आप ही की सीख और आप ही के आदर्शों पर चले हैं, और ज़िन्दगी में आग लगी हुई है," तो फिर पुश्तैनी सम्पत्ति कहाँ से पाओगे? अब कृष्ण तो आएँगे नहीं कोई सम्पत्ति देने, सम्पत्ति तो बापूजी से ही मिलनी है। तो हिम्मत नहीं है कि उनसे जा करके बोल दो खुलेआम कि "तुमने हमारे ऊपर जो प्रभाव डाला बचपन से, तुमने हमें जो नसीहत दी, वो खा गई हमको।"

सम्पत्ति क्या, पत्नी भी पिताजी की ही बरकत से मिली है, भाई। हममें से अधिकांश लोग तो अगर पिताजी और माताजी का समर्थन न हो, वरदहस्त न हो, तो अपने लिए एक पति या पत्नी न जुगाड़ पाएँ। हिन्दुस्तान के अस्सी-नब्बे प्रतिशत लोग नाक़ाबिल हैं अपने लिए पति और पत्नी ढूँढ पाने में भी। मम्मी और पप्पा उनको चिज्जू न ला करके दें तो वो जीवनभर कुँवर और कुँवारी ही रह जाएँगे। तो वहाँ कैसे बोल दोगे तुम कि "आपने बर्बाद किया है मुझे”?

धर्मग्रन्थ सस्ते हैं, उन पर कोई भी कीचड़ उछाल देता है, उन पर कोई भी उंगली उठा देता है, है न? कि “अजी, छोड़ो, इसमें कुछ रखा नहीं। मैंने बहुत पढ़ा।” ऐसे लोग मिलते हैं कि नहीं मिलते हैं? कि “अरे, अभी तो तुम जवान हो, लड़के हो, तुम ये सब पढ़ रहे हो। अपने समय में हम ये सब पढ़कर छोड़ चुके हैं। इसमें ऐसा कुछ रहा नहीं है। हमें पता है सब। हमने खूब पढ़ा है।”

अपनी शक्ल देखिए, अपनी ज़िन्दगी देखिए, मुँह धोकर आइए। आपने पढ़ा है? आपका जीवन गवाही दे रहा है कि आपने कुछ भी पढ़ा है। उल्ट आप दुष्प्रचार कर रहे हो, उल्टे आप और लोगों को बरगला रहे हो कि हमने तो पढ़ा था, कुछ रखा नहीं है। और पढ़ा उन्होंने कुल कितना है? गीता का एक श्लोक। और कोई बड़ी बात नहीं कि वो श्लोक भी उन्होंने बी. आर. चोपड़ा की महाभारत में रट लिया हो। उसमें बार-बार आता था, तो बैठे हैं अपना सुन रहे हैं, और कुछ करने को तो है ही नहीं। रविवार की सुबह, और हो सकता है रिटायर्ड (सेवानिवृत्त) आदमी हों, तो एकाध-दो श्लोक रट गए। वो बताते हैं हमें, “साहब, ये गीता-वीता पढ़ा हुआ है। देखो, ये व्यवहारिक बातें नहीं होती।”

हमारे लिए धर्मग्रन्थ इत्यादि अधिकांशतः बस साज-सज्जा की चीज़ें हैं। वो घर में रखने के लिए ठीक हैं, वो पूजाघर को सुशोभित करने के लिए ठीक हैं। हम उन पर चलते थोड़े ही हैं, हम उन्हें अपना प्राण थोड़े ही बनाते हैं। चलते तो हम किन्हीं और ही लोगों की सीख पर हैं, हमारे असली गुरु दूसरे हैं। असली गुरुओं के नाम क्या हैं? यही नुन्नूलाल, रिंकी मौसी, अम्बाला वाले ताऊजी, ये सब गुरु हैं।

और बताऊँ कौन गुरु हैं? ये सब जितने सिने एक्टर्स (अभिनेता-अभिनेत्रियाँ) हैं, आज-कल ये लाइफ एडवाइज़ (जीवन सम्बन्धी सलाह) देते हैं, ज़बरदस्त लाइफ एडवाइज़ देते हैं। ये आ करके बता रहे होते हैं, "देखो, जीवन ऐसे जीना चाहिए, वैसे जीना चाहिए।” ये बताते हैं, “वी विल गिव यू रिलेशनशिप गोल्स” (हम आपको संबंधों के लक्ष्य देंगे)। ये तो तुम्हारे गुरु हैं। शिकायत करनी है तुम्हें अपनी बर्बादी की, तो जाकर इनके दरवाज़ें पर करो न शिकायत, कि "तुम्हारे सिखाए पर चल रहा हूँ और देखो जनाज़ा मेरा।”

इन्हीं से सीख रहे हो न? और इनकी भाषा भी अब वैसे ही हो गई है। ये बिल्कुल उपदेशात्मक भाषा में बात करते हैं। कोई आएगा विज्ञापन टीवी पर और तुमसे बोलेगा, “जियो खुलके।” ये तुमसे प्रार्थना नहीं कर रहा है कि आइए और हमारा मोजा खरीद लीजिए। ये मोजे का विज्ञापन है या कच्छे का, और इसकी पंच लाइन क्या है? 'जियो खुलके।'

अबे दुकानदार, औकात में रह, तमीज़ में रह। कच्छा बेच रहा है या ज्ञान बाँट रहा है? लेकिन वहाँ पर तुम ज्ञान बिल्कुल हाथ जोड़कर ग्रहण कर लेते हो कि "हाँ, अभी-अभी तो इन्होंने बताया न, श्रीगुरु ने ‘जियो खुलके'।" तो तुम खुलके जीने लग जाते हो। अब घूमो फटा कच्छा लेकर। कृष्ण की क्यों शिकायत कर रहे हो?

जिनसे वास्तव में सीख ली है, जो असली गुरु हैं, उनको पहचाना है कभी ठीक से? कोई यहाँ निगुरा नहीं बैठा है; सबके गुरु हैं। यही हैं गुरु, हसीन तारिकाएँ। वो आ करके बताएँगी कि "ऐसे करो, वैसे करो, यू नो * ।” तुम कोई अखबार उठा लो, कोई * न्यूज़ वेबसाइट खोल लो, वहाँ इन्होंने ज्ञान बाँट रखा होता है।

हम इतने बुद्धू लोग हैं कि हमें समझ में ही नहीं आता कि जिन्हें हम गुरु समझ रहे हैं, वो एक्टर हैं और जिनको हम एक्टर समझ रहे हैं, वो गुरु हैं।

समझना गौर से, देखना। जिन लोगों को तुम कह रहे हो कि ये तो गुरु हैं, वो वास्तव में कुछ नहीं हैं, वो नौटंकीबाज हैं, वो ऐक्टर (अभिनेता) हैं, और वो गुरु बनकर बैठे हुए हैं। ऐक्टर हैं इसी से पता चलता है कि दो घंटा लगता है उन्हें अपनी कॉस्ट्यूम (पोशाक) पहनने में और दो घंटा लगता है उन्हें अपना पूरा मेकअप (श्रृंगार) करने में। ये गुरु हैं जो अभिनेता हैं। और दूसरी और अभिनेता और अभिनेत्री हैं जिनको हमने स्वीकार कर लिया है गुरु की तरह। उनसे बोलो न जाकर।

आम आदमी का मन जानते हो क्या होता है? फ़िल्मी, और कुछ नहीं, बस फ़िल्मी। वहीं से वो सब सीख रहा है, वैसे ही वो जी रहा है। और घटिया फ़िल्में। और जब में फिल्म कह रहा हूँ तो वही फिल्म नहीं जो सिनेमा में पर्दे पर चलती है या कि आप टीवी में जो देखते हो धारावाहिक इत्यादि, ये सब जो हमने आस-पास चला रखा है, ये फ़िल्मी नहीं है क्या?

फ़िल्मी माने समझ रहे हो क्या? काल्पनिक। जिसकी पटकथा पहले से ही लिख दी गई हो, उसको कहते हैं फ़िल्मी। हमारे आसपास जो कुछ है, उसकी पटकथा, स्क्रिप्ट सब पहले से ही तो लिखी हुई है। सब फ़िल्मी हैं। रिश्ते-नाते, जीवन, शादी-ब्याह, परिवार, समाज, लक्ष्य हमारे, ये सब क्या पहले से ही स्क्रिप्टेड नहीं हैं, पहले से ही निर्धारित नहीं हैं? तो क्या ये फ़िल्मी नहीं हुए? तुम्हारी इन सब पटकथाओं में बताओ, “कृष्ण आते कहाँ हैं? अष्टावक्र आते कहाँ हैं?”

जब तुम्हें ज़िन्दगी के निर्णय करने होते हैं, तुम जाते हो अष्टावक्र से पूछने? ईमानदारी से बताना। तुम जाते हो अम्बाला वाले ताऊजी से पूछने। जब शादी करने गए थे तो उपनिषदों के ऋषियों से पूछा था? तो अब अगर तुम्हारी शादी खा रही है तुम्हें तो उपनिषदों के ऋषियों को दोष मत देना। जिन्होंने करवाई है शादी, उनका गला पकड़ो जाकर।

और जीवन में जो रोज़मर्रा के पचास निर्णय लेते हो, किसकी रोशनी में लेते हो? राम और कृष्ण की रोशनी में लेते हो क्या? जिनकी रोशनी में लेते हो, जा करके उनसे पूछो न कि तुमने हमें ऐसा बना दिया, तुमने हमारे तन में, मन में कचरा भर दिया और अब देखो, पल-पल रो रहे हैं हम। जवाब दो। उनसे पूछो। धर्म को क्यों गुनहगार बना रहे हो? धर्म पर तो तुम चल ही नहीं रहे। तो धर्म तुम्हारा गुनहगार कैसे हो गया?

और ये बहुत आम सवाल है। लोग यहाँ आ जाएँगे, बैठेंगे, कहेंगे, "दस साल से मैं फलानी चीज़ का पाठ कर रहा हूँ, कुछ मिल नहीं रहा।" दस साल से तो तुम रोज़ शौच भी करते हो, तो? कोई दिली चीज़ हो तो कुछ लाभ भी होगा न। बाहर-बाहर की क्रिया-प्रक्रिया से क्या मिल जाना है? रोज़ सुबह खड़े होकर के ‘ॐ जय जगदीश हरे’ गा दिया, उससे तुम्हारा जीवन परिवर्तित हो जाएगा? हो जाएगा? और तुम कहो, "नहीं, मैं तो बड़ा भक्त हूँ, रोज़ हनुमान-चालीसा पढता हूँ।” न कोई भक्ति है, न कोई श्रद्धा है, जीवन हमारा बस एक फ़िल्मी अड्डा है।

और फिर आप जब कहते हैं कि आपने ग्रंथों को पढ़ा है। अभी आपकी परीक्षा ली जाए कि आपने कितना पढ़ा है? बोलिए। बिल्कुल किताबी परीक्षा ही। लिखें आपके सामने दस श्लोक और कहें कि इनका मतलब बता देना। बोलिए। या आपसे कोई सैद्धांतिक सवाल ही पूछ लें? कि लीजिए ये आपसे पूछ दिया, इसका अंतर बताइए, ये क्या है और ये क्या है? क्या पढ़ा है आपने? आपने उस स्तर की पढाई भी नहीं करी है जिस स्तर की पढाई आप बोर्ड की परीक्षाओं के लिए करते हैं। वहाँ भी कुछ तो समझते थे न ताकि प्रश्न-पत्र में सवाल का समाधान लिख सको?

मैं अभी कल-परसों भी कह रहा था कि अध्यात्म में कोई प्रश्न-पत्र होता नहीं है न। अभी आपके सामने कोई प्रश्न-पत्र रख दिया जाए तो छक्के छूट जाने हैं। लोग यहाँ आकर मुझसे ही कहते हैं, "हम आपको पॉंच साल से सुन रहे हैं," और फिर वो जो सवाल पूछेंगे तो मुझे ताज्जुब होगा। मैं कहूँगा, “आपने मुझे पॉंच मिनट भी सुना है क्या?” और कह रहे हैं कि पॉंच साल से सुन रहे हैं।

तुम वैसे ही सुन रहे हो जैसे घर में एफएम रेडियो सुना जाता है। एफएम रेडियो लगा दिया जाता है और वहाँ किचन (रसोईघर) में छौंक और कड़ाही चल रही है। ऐसा ही होता है न? वो अपना बजता रहता है। वहाँ वो जो आरजे है, कुछ बक रहा है। वो अपना बक रहा है, हम अपना काम कर रहे हैं। वैसे ही आचार्य जी को लगा दो, 'ठप', अपना बकते रहेंगे, हम अपना काम करते रहेंगे।

बहुत लोग आकर बताते हैं, बोलते हैं, "दिनभर हम सुनते हैं।" मैं पूछता हूँ, "बेरोजगार हो? तुम दिन भर सुन कैसे लेते हो मुझको?" बोले, "नहीं, वो चलता रहता है।” ठीक है। अच्छा है, चलो व्यूज बढ़ रहे हैं। ऐसे तो सुनते हो।

जिनका नाम ले रहे हो न, उन पर ज़रा-सा अमल करके देखो भीतर कितनी हिम्मत जगती है। इतनी हिम्मत जागेगी कि एक कदम लोगे तो अगले दो कदम का साहस ख़ुद आ जाएगा। पर थोड़ी हिम्मत तो करो।

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