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कृष्ण ने किन्हें बताया गीता सुनने का अधिकारी? ऐसा भेद क्यों? || श्रीमद्भगवद्गीता पर (2020)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः।।

वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी ही होते हैं।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय ५, श्लोक १८

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति।।

तुझे यह गीतारूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्तिरहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से कहना चाहिए; तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए।

—श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय १८, श्लोक ६७

प्रश्नकर्ता: पहला श्लोक कहता है, “ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते, चांडाल में भी समदर्शी ही होते हैं।” तो जो पहला श्लोक है, उसमें प्रतीत हो रहा है कि भेद को मिटा रहा है; वह कह रहा है कि चाहे विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण हो और चाहे गाय, हाथी, कुत्ता, चांडाल कुछ हो, इन सबके प्रति समदर्शी ही रहते हैं ज्ञानीजन, जैसे भेद मिटाए जा रहे हों।

दूसरा जो श्लोक है, वह भेद करता हुआ प्रतीत होता है। पहले श्लोक में भेद को मिथ्या बताया गया और दूसरे श्लोक में जैसे कृष्ण ही अर्जुन से कह रहे हों कि अर्जुन, भेद करना, ज़रूर भेद करना। जो लोग तपरहित हों, भक्तिरहित हों, सत्य के प्रति अनिच्छुक हों और कृष्ण में दोषदृष्टि रखते हों, उनसे गीता का उपदेश कभी मत कहना। अर्जुन, भेद करना।

आचार्य जी, यह क्या बात है? एक तरफ़ श्रीकृष्ण कहते हैं कि सबमें समदर्शी रहो और दूसरी तरफ़ कहते हैं कि जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उसको यह उपदेश नहीं कहना चाहिए। ये दोनों अलग-अलग बातें मुझे विचलित कर रही हैं। कृपया मार्गदर्शन करें।

आचार्य प्रशांत: कहॉं कहा गया है कि समदर्शी रहो? और समदर्शिता का अर्थ क्या है? अर्थ इतना ही है कि जो कुछ भी तुमको दिखाई देता है, जो कुछ भी चल रहा है, फिर रहा है, जिस भी चीज़ का अनुभव हो सकता है, जो कुछ भी आ रहा है, जा रहा है, वो सब प्रकृति मात्र है। भले ही कितनी विविधता दिखाई देती हो उसमें, कितने भेद दिखाई देते हो उसमें, पर है वो सबकुछ प्रकृति के भीतर ही।

यहॉं पाँचवें अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को अनेकता में एकता की सीख देना चाह रहे हैं। वो कह रहे हैं, देखो, यह सब अलग-अलग दिखता है। दुनिया का अर्थ ही है वैविध्य; पहाड़ अलग हैं, नदी अलग है, आदमी अलग है, औरत अलग है, दिन अलग है, रात अलग है। सब कुछ यहॉं अलग-अलग ही है न? दुनिया माने अलग-अलग वस्तुएँ, अलग-अलग पदार्थ, सब रंग अलग-अलग हैं, सब तल अलग-अलग हैं। समय का मतलब ही है भेद, जो अभी है, वो थोड़ी देर में नहीं रहेगा, अगले पल अलग हो जाता है, बदल जाता है, दूसरा हो जाता है।

और यही जो विविधता है, यही आदमी को बरगलाए रहती है। हमें लगता है कि सब अलग-अलग वास्तव में हैं। हमें लगता है कि कुर्सी और मेज़ अलग-अलग हैं, हमें लगता है कि दिन और रात अलग-अलग हैं, हमें लगता है कि सुख और दुःख अलग-अलग हैं, हमें लगता है कि मिट्टी और आसमान अलग-अलग हैं, हमें लगता है कि पर्वत और पर्वत से उतरती हुई नदी अलग-अलग हैं।

यहॉं पर जो समझने की बात कह रहे हैं श्रीकृष्ण, वो यह है कि ये सब जो अलग-अलग दिखता है, इसमें एक मूलभूत एकता है। वो एकता आत्मा की एकता नहीं है, वो प्रकृति की एकता है। ये सबकुछ अलग-अलग दिखते हुए भी प्रकृति के क्षेत्र में आता है। एक क्षेत्र है, एक तल है प्रकृति का जिसमें ये सब कुछ समाए हुए हैं तो भले ही (अपनी मेज़ पर रखी अलग-अलग वस्तुओं की ओर इशारा करते हुए) ये अलग है, ये अलग है, ये अलग है और ये अलग है, लेकिन तल एक ही है प्रकृति का।

उसी तल पर तुमको एक ब्राह्मण का शरीर भी दिखाई देता है, उसी तल पर तुमको ब्राह्मण के सब गुण दिखाई देते हैं, उसी तल पर तुमको सब दिखाई देता है जो जड़-चेतन है, जंगम-स्थावर है, सब विभिन्नताएँ तुमको दिखाई देती हैं, लेकिन तल एक ही है प्रकृति का। तो जब श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि इनको एक जानना, इनके प्रति एक दृष्टि रखना, समदर्शिता रखना, तो समदर्शिता यही है कि ये जो हो रहा है, ये सब है तो प्रकृति के भीतर ही न।

क्यों आवश्यक है ये समदर्शिता? ताकि ये जो कुछ भी हो रहा है, उसको तुम परमात्मा का दर्जा न दे दो। न उसे तुम इतना ऊँचा समझ लो कि उसे ही परमात्मा मानना शुरू कर दिया, न उसे तुम इतना नीचा समझ लो कि उसे तुम परमात्मा का विपरीत कुछ जान लो। न वो बहुत ऊँचा है, न वो बहुत नीचा है, हालाँकि वो अनुभव कुछ ऐसा ही देता है, प्रतीत कुछ ऐसा ही होता है।

दुनिया को तुम देखो तो उसमें तुम्हें बहुत कुछ ऐसा नज़र आता है जो तुमको लगेगा कि बहुत शीर्ष चीज़ है, ऊँची-से-ऊँची, सुंदर-से-सुंदर। और दुनिया को देखो तो उसमें तुम्हें दिखाई देगा बहुत कुछ ऐसा है जो बिल्कुल कुत्सित है, ग्रहित है, विकृत है, नारकीय है। तो भीतर से बड़ी इच्छा उठती है कि कह दें कि स्वर्ग भी यहीं है, नर्क भी यहीं है।

न, यहॉं भेद निश्चितरूप से है और यहॉं अनुभवों में ज़मीन-आसमान के अंतर भी हैं, पर वो सब अंतर मामूली हैं। यहॉं तुम्हें मिल जाए कुछ बहुत सुंदर, बहुत ऊँचा तो भी उसको परमात्मा का स्थान मत दे देना, उसको सत्य मत मान लेना। और यहॉं तुमको मिल जाए कुछ बहुत ही कुत्सित, एकदम ही निकृष्ट, तो भी उसको इतना महत्व मत दे देना कि वही तुम्हारे लिए केंद्रीय वस्तु बन जाए।

न यहॉं कुछ इतना ऊँचा है, इतना सुंदर है कि उसको तुम अपने मन के केंद्र पर बैठा लो, न यहॉं पर कुछ इतना गिरा हुआ है कि तुम उसको अपने मन के केंद्र पर बैठा लो। यहॉं तो जो कुछ है वो प्रकृति के दायरे में है। तो जो पाँचवें अध्याय में तुम उपदेश पढ़ रहे हो, उसका कुल अभिप्राय ये है – प्रकृति की एकता का उपदेश है वो।

अब आते हैं अट्ठारवें अध्याय के सड़सठवें श्लोक पर। भूलना नहीं कि ये पूरी गीता के आख़िरी कुछ श्लोकों में से है। ये बिल्कुल आख़िरी कुछ बातें हैं जो अब श्रीकृष्ण अर्जुन से कह रहे हैं। अभी भी वो जो कह रहे हैं अर्जुन से, वो यही है कि कौन है प्रकृति के अंतर्गत जो इस उपदेश को सुनने का अधिकारी है। भेद वो कर रहे हैं, पर वो सारे भेद अभी भी प्रकृति के ही भीतर के भेद हैं।

वो कह रहे हैं कि देखो, जिन लोगों में तुम ये सब गुण पाओ, उनसे ये गीता का उपदेश कह देना, जिनमें ये गुण न पाओ, उनसे गीता का उपदेश कहना ही मत। और गुण उन्होंने बता दिए – तप होना चाहिए, जिज्ञासा होनी चाहिए, भक्ति होनी चाहिए, श्रद्धा होनी चाहिए। ये सब अगर पाओ तो उनसे गीता का उपदेश कहना, नहीं तो मत कहना।

जिन गुणों को अनिवार्य बता रहे हैं श्रीकृष्ण, वो गुण भी प्रकृति के भीतर के ही हैं। एक तरह की सात्विकता को अनिवार्य बता रहे हैं श्रीकृष्ण। कह रहे हैं कि जिसमें ये सात्विकता पाओ, वही अधिकारी है गीता ज्ञान सुनने का, बाकियों को अगर तुमने कहा तो वो बेचारे तो पहले से ही उलझे हुए थे, ये गीता का उपदेश उन्हें और भारी पड़ेगा।

पक्षपात नहीं कर रहे हैं श्रीकृष्ण, ये उनकी करुणा है कि वो कह रहे हैं कि जो अभी तैयार नहीं है गीता को सुनने को, उस पर गीता थोप मत देना, क्योंकि तुम उसको अगर गीता थमा दोगे तो वो गीता का बड़ा दुरुपयोग करेगा। वो गीता को तलवार बनाकर अपनी ही गर्दन काट लेगा। तो ये करुणा है कृष्ण की कि वो कह रहे हैं कि अर्जुन, ये सब बातें उसको ही बताना जो इन बातों के लिए तैयार हो, योग्य हो, अधिकारी हो गया हो। जिसने अभी वो योग्यता नहीं तैयार की, उसको यदि तुम ये सब बातें बताओगे तो उसको भारी पड़ेंगी।

तो कुल जो मामला है, ऐसा है। प्रकृति है जो त्रिगुणात्मक है। प्रकृति का एक तल है, वो पूरा तल बना हुआ है तीन गुणों से। वहाँ भीतर भेद हैं, निश्चित रूप से भेद हैं। तीनों गुण ही एक-दूसरे से अलग हैं, भेद तो यही हो गया।

प्रकृति के उस तल पर तुम क्या-क्या पाते हो? परा प्रकृति और अपरा प्रकृति। एक वो प्रकृति जिसको तुम देखते हो, उसको कह देते हैं ‘अपरा प्रकृति’। एक वो प्रकृति जो देखती है, जो द्रष्टा है, उसको तुम कह देते हो ‘परा प्रकृति’। पर ये दोनों किसमें आ गए? प्रकृति के ही विशाल क्षेत्र में। और फिर इस क्षेत्र से हटकर है क्षेत्रज्ञ।

तो भेद हैं, पर कहॉं भेद करना है, कहॉं नहीं करना है, ये बात अच्छे से समझ में आनी चाहिए। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ से अलग है, वो विभाग करना सीखो। प्रकृति का क्षेत्र क्षेत्रज्ञ से अलग है। क्षेत्रज्ञ माने जो न दृश्य है, न द्रष्टा है, जो दृश्य-द्रष्टा दोनों का साक्षी है, क्योंकि दृश्य और द्रष्टा दोनों कहॉं आ गए? प्रकृति के ही भीतर आ गए।

दृश्य भी प्रकृति में, द्रष्टा भी प्रकृति में। ज्ञेय पदार्थ भी प्रकृति में और ज्ञाता अर्थात बुद्धि और अहंकार भी प्रकृति में। तो ये सब प्रकृति के भीतर का खेल है। और इस तल से अलग है क्षेत्रज्ञ। उस क्षेत्रज्ञ के भीतर कोई भेद नहीं है, वहॉं कोई भेद नहीं है। प्रकृति में भेद ही भेद हैं। पर ये सब जो भेद गुण रखने वाली वस्तुएँ हैं, इन सब में एकता क्या है? कि ये सब प्राकृतिक हैं, ये एकता है।

ज्ञानी वो है जो जानता है कि कहॉं भेद देखना है और कहॉं भेद नहीं देखना है। विवेक इसी का नाम है – सही जगह भेद देखना।

विवेकी वह है जो भेद बस वहॉं देखता है जहॉं भेद है। अविवेकी वह है जो वहॉं भेद देख लेता है जहॉं कोई भेद है ही नहीं। अविवेकी को सुख और दुःख में बड़ा भेद दिखाई देगा, वह कहेगा कि सुख और दुःख तो अलग-अलग चीजें हैं ही न। जो सुख और दुःख में भेद करे, वह अविवेकी। जो सुख-दुःख और आनंद में भेद करे, वह विवेकी। भेद दोनों ही कर रहे हैं, पर जो विवेकी है, उसको सही जगह पर भेद करना आता है। अविवेकी भी भेद करता है, लेकिन ग़लत जगह भेद कर देता है।

बहुत संभावना होती है कि तुम्हें प्रकृति के भीतर का कुछ सताने लगे, परेशान करने लगे, तुम्हें मिथ्या दिखने लगे प्रकृति में। तो तुम जो चीज़ मिथ्या लग रही है, उसके विपरीत पर जा करके बैठ जाओ। उदाहरण के लिए, कहीं तुमने मन लगाया और वहॉं तुमने धोखा खाया, चोट खाई तो तुम राग से उठ करके कहॉं बैठ जाते हो? द्वेष पर। ये विवेकी का काम नहीं हो सकता। विवेक क्या बोलेगा? राग और द्वेष तो एक हैं, क्योंकि दोनों प्रकृति के तल पर हैं।

ज्ञान मार्ग यही बताता है कि क्या एक है, क्या एक नहीं है। ज्ञानी समझ जाएगा, कहेगा, “अरे, अंतर क्या है? पहले मैं रागी था, अब द्वेषी हो गया हूँ। रहा तो पहले ही जैसा न?”

ज्ञान मार्ग का अर्थ होता है कि वह सब कुछ जो अनित्य है, उसको एक तरफ़ कर दो। प्रकृति के पूरे क्षेत्र को एक तरफ़ कर दो और तुम वहॉं जा करके बैठ जाओ जहॉं नित्यता है, जहाँ सार है, जहॉं सत्य है। इसीलिए ज्ञान मार्ग नेति-नेति का मार्ग है। यही विवेक है। यही भेद है – जो कुछ झूठा है, उसको हटाते चलो, उसकी नेति-नेति करते चलो।

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