प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, कैसे जानें कि सत्संग समझ में आ गया है?
आचार्य प्रशांत: आप कह रहे हैं, बात आपके अन्दर उतर गयी तब आप कहते हैं कि आप समझे। सत्य यह है कि समझे तब जब आप बात से उतर गये। हम बात के ऊपर चढ़कर बैठे रहते हैं। तो बात हम में नहीं उतरनी होती, हमें बात पर से उतरना होता है। बात कभी हम तक बात की तरह पहुँचती नहीं, बात हम तक पहुँचती है ‘बात, धन, हम’ होकर।
हम बात में हमेशा जुड़े होते हैं। हम आसमान को भी अपने छोटे-छोटे झरोखों से देखते हैं। तो कोई आसमान भी दे रहा होता है आपको तो आप कहते हैं वैसे ही लूँगा और उतना ही लूँगा जितना मेरे व्यक्तिगत झरोखे से प्रविष्ट हो जाए। आप बात से उतर गये, इसका अर्थ होता है कि अब आपके और आसमान के बीच में वह झरोखा नहीं रहा जिसे आप व्यक्ति कहते थे। अब आप हैं और खुला आसमान है, अब पूर्ण उपलब्धता है दोनों ओर से। झरोखे के इस पार भी आसमान है , झरोके के उस पार भी आसमान है। झरोखा नाहक ही उनके मिलन को सीमित कर देता है।
मैं जो कहता हूँ वो कभी आप तक पूरा का पूरा और जस का तस नहीं पहुँचता, बीच में व्यक्ति खड़ा हो जाता है, व्यक्तित्व खड़ा हो जाता है, अहंता खड़ी हो जाती है। वह बात जो वास्तव में कुछ नहीं है, मौन है, खाली है, विशुद्ध है, निर्मल है, जब आपके व्यक्तिगत मार्गों से गुज़रकर के आप तक पहुँचती है, तो वो बात कुछ का कुछ बन चुकी होती है।
हमारे शिविर होते हैं, उनमें हम एक खेल खेलते हैं। लोगों को कतारबद्ध खड़ा कर देते हैं और जो सबसे आगे खड़ा होता है कतार में, उसके कान में कोई छोटी सी बात, साधारण सी, फूँक दी जाती है और फिर कहा जाता है कि अपने पड़ोसी के कान में यही बात कह दो। और पड़ोसी वही बात अगले के कान में कहता है, इस तरह से श्रृंखला आगे बढ़ती है। और फिर बड़ा मज़ेदार रहता है जब कतार के आख़िरी आदमी से पूछा जाता है कि बताओ तुम तक क्या पहुँचा। वो कुछ और ही होता है जिसका अक्सर कुछ लेना ही देना नहीं होता उससे, जो कि शुरू हुआ था।




