भारत आध्यात्मिक मूल्यों की राजनैतिक अभिव्यक्ति है। भारत देश के पीछे बहुत ऊँचे सिद्धांत हैं। अगर यह देश नहीं रहेगा, तो उन सिद्धांतों को भी ताक़त और अभिव्यक्ति देने वाला कौन रहेगा? इसीलिए इस देश की रक्षा बहुत आवश्यक है। बहुत से मौके ऐसे आते हैं, जब सैनिक शरीर को ही दाँव पर लगा देता है — यह सबसे मुश्किल और ज़्यादा वीरता का काम है। इस देश की जो रक्षा करने वाला है, वह निश्चित रूप से विशेष है और सम्मान का अधिकारी है।
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प्रश्नकर्ता: मैं मूलतः बिहार से हूँ, पर पिछले पंद्रह वर्ष से दिल्ली में हूँ। मेरे छोटे बेटे ने अपनी अधिकांश शिक्षा दिल्ली से ली है, और अब वो दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ रहा है। हमारे पिताजी सेना में थे, युद्ध भी लड़े थे, और हमारे घर में फ़ौज और सेना की बड़ी इज़्ज़त रही है। पर अब पिछले कुछ साल से बेटा कहता है कि, "सरकारी या प्राइवेट नौकरी करने वाला एक आम कर्मचारी भी तो तनख़्वाह लेकर अपना काम करता है, और सैनिक भी तनख़्वाह लेकर अपना काम करता है, फिर सैनिक को अधिक सम्मान देने की क्या ज़रूरत है?"
बेटा कहता है कि, "सेना और राष्ट्र को लेकर लोग बेकार ही भावुक होते रहते हैं।" और वो मुझसे बहस करता है कि काम और काम में कोई अंतर नहीं होता, तो किसी एक काम को करने वाले को ख़ास महत्त्व या इज़्ज़त देना आवश्यक नहीं है। मुझे उसकी बातें बुरी तो लगती हैं, पर उसे समझाने के लिए मेरे पास कोई सटीक तर्क नहीं होता। कृपया मदद करें।
आचार्य प्रशांत: पहली बात तो ये जो प्रचलित मुहावरा है कि "काम और काम में कोई अंतर नहीं होता," ये बहुत उथला है, बिल्कुल भी ठीक नहीं है। इसको समझने की बहुत ज़रूरत है।
करने वाले के सामने हमेशा दो रास्ते होते हैं: सही काम करना और गलत काम करना। ऐसा काम करना जो बहुतों की मदद करेगा, और ऐसा काम करना जो सिर्फ़ अपने स्वार्थ के लिए हो। ऐसा काम करना जो ख़ुद को और दूसरों को मुक्ति की ओर, होश की तरफ़ ले जाता हो, और ऐसा काम करना जो ख़ुद को और दूसरों को बंधनों की ओर और बेहोशी की ओर ले जाता हो। तो काम और काम में अंतर तो होता ही है क्योंकि कर्ता की एक अवस्था और दूसरी अवस्था में अंतर तो होता ही है। आप प्रेम के भाव से एक काम कर रहे हैं, आप घृणा के भाव से एक काम कर रहे हैं, आपके मन की इन दोनों अवस्थाओं में अंतर है ना या एक ही हैं?




