
भगत सिंह कहते थे "बहरे कानों तक अपनी आवाज़ पहुँचाने के लिए अक्सर धमाकों की ज़रूरत पड़ती है।"
लेकिन उनको कहाँ पता था कि लोगों की स्मृति इतनी कमज़ोर है कि उनके जाने के बाद वे सिर्फ़ उनका 'धमाका' ही याद रखेंगे। और उनको भूल जाएँगे, उनके संघर्ष…







प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, नमस्ते। इतिहास है कि ईस्ट इंडिया कंपनी के कारण हमने बहुत ग़ुलामी झेली। आज अनेकों विदेशी कंपनियाँ हैं बाज़ार में, क्या वो भी ग़ुलाम बना रही हैं हमें? आर्थिक पक्ष तो एक तरफ़ है, मैं आपसे समझना चाहता हूँ कि इन कंपनियों का हम पर मानसिक और…

प्रश्नकर्ता: हिंदी भाषा का जीवन में क्या महत्व है? युवाओं में हिंदी भाषा के प्रति पूर्ण सम्मान व स्वीकार क्यों कम देखने को मिलता है? भारत की संस्कृति में हिंदी भाषा का क्या महत्व व योगदान रहा है?
आचार्य प्रशांत: देखिए, आपका बच्चा भारतीय संस्कृति सीखे, ना सीखे, यह कोई

प्रश्नकर्ता: मैं बचपन से ही देशभक्ति के माहौल में पला-बढ़ा हूँ, और ख़ुद भी देशभक्त हूँ। पर साथ-ही-साथ मेरे मन में विदेश जाने की भी इच्छा रहती थी। मैंने स्वयं को बहुत समझाया और ये विचार अपने मन से निकाल दिया। मैं वेस्टर्न क्लासिकल म्यूज़िक (पाश्चात्य शास्त्रीय संगीत) का बहुत…

प्रश्नकर्ता: मैं एक जिला-स्तरीय क्रिकेट खिलाड़ी हूँ। मेरे जीवन में ढर्रे हैं और वो मुझे खेल में आगे बढ़ने से बहुत रोक रहे हैं। तो एक युवा होने के नाते किस तरीके से मैं आगे अनुशासन के साथ इस खेल में उतर सकता हूँ? मैं देश के लिए खेलना चाहता


We leave a talk moved, and by evening it has faded, so we ask how to stay aware every moment. Yet one glance at a report that says cancer is never forgotten; even in our dreams we remember it, and no one has to remind us. We remember what we truly want to save. The mirror is held up once, and a teacher can do no more than that. Sunlight pours through every window, and we can still crawl under a rock. What are we choosing, each time we forget?
🔥 “मैं तुम्हें प्यार से लूटने आया हूँ” 🔥
देश को आज़ाद हुए 4 साल ही हुए थे, और 75% आबादी कृषि संबंधित कार्यों से जीवनयापन कर रही थी।
लेकिन एक बहुत विचित्र बात थी: कृषि क्षेत्र में काम कर रहे अधिकतर लोगों के पास अपनी ज़मीन ही नहीं…
प्रसंग:
भारत या इंडिया? इंडिया से नाम बदलकर भारत रखना चाहिए क्या? क्या इंडिया नाम विदेशियों ने दिया है? क्या है इंडिया और भारत का इतिहास? क्या देश का नाम बदलना आवश्यक है? कॉलोनाइजेशन और डी-कॉलोनाइजेशन क्या हैं? क्यों कहा जाता है कि भारत का कॉलोनाइजेशन हुआ है? भारत को…
दुनिया में जहाँ भी दक्षिणपंथ है, राइट-विंग मूवमेंट्स जहाँ-जहाँ चल रहे हैं, वहाँ-वहाँ लोकतंत्र कमज़ोर पड़ रहा है। ईरान में भी अब यही चल रहा है। यह एक तरह से माया का चक्र है। यह सोचा जा रहा है कि लिबरल-सेकुलर होने से हटकर के हम जब कंज़र्वेटिव, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिक हुए, तब समाधान मिल जाएगा; और उससे वापस घूम करके फिर से लिबरल-सेकुलर हो जाएँगे, तब समाधान मिल जाएगा। मनुष्य यह मानने को ही तैयार नहीं है कि व्यवस्था आती रहेगी, जाती रहेगी। उसकी समस्या का मूल कारण उसके भीतर है।
राष्ट्रों की लड़ाई असल में अहंकार की लड़ाई है। देश माने वहाँ के लोग, और लोग जैसे हैं वैसे ही उनके नेता। दुनिया में जो गुंडागर्दी दिखती है वो बाहर से नहीं आई, हम ही उसका स्रोत हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंध हों या व्यक्तिगत, यहाँ वफ़ा नहीं ताक़त चलती है। अहंकार की भूख अनंत है इसलिए युद्ध रुकता नहीं। समाधान केवल एक है कि जनसंख्या को स्वयं की शिक्षा मिले। जब तक इंसान अपने अहंकार को नहीं पहचानेगा तब तक विनाश जारी रहेगा।
भारत आध्यात्मिक मूल्यों की राजनैतिक अभिव्यक्ति है। भारत देश के पीछे बहुत ऊँचे सिद्धांत हैं। अगर यह देश नहीं रहेगा, तो उन सिद्धांतों को भी ताक़त और अभिव्यक्ति देने वाला कौन रहेगा? इसीलिए इस देश की रक्षा बहुत आवश्यक है। बहुत से मौके ऐसे आते हैं, जब सैनिक शरीर को ही दाँव पर लगा देता है — यह सबसे मुश्किल और ज़्यादा वीरता का काम है। इस देश की जो रक्षा करने वाला है, वह निश्चित रूप से विशेष है और सम्मान का अधिकारी है।
Death is already happening moment by moment. Why think that it is there somewhere in the future? We are all going in the same direction: a journey towards death. You cry not at the fact that somebody died, but at the fact that life was not lived fully. We have had a mystic who said that death should be celebrated. When everything about this man was joyful, how can his death be painful? There would be no reason to cry; death can be celebrated.
It is not really the action that counts. One has to look at the constitution of the actor. If you want to become India’s soldier because you understand the great principles that India stands for and realize that those principles are worth laying down your life for — then you should definitely become a soldier. However, if becoming a soldier is about defending just a piece of land, or your own self-worth or ego, then there is not much in this choice.
Questioner (Q): Sir, how to differentiate between these two things – being patriotic, and to not to identify with an identity?
If we say that we are patriotic to our country, this means that we are involved with an identity that is – being an Indian. So how to differentiate…
आचार्य प्रशांत: आप पूछ रहे हैं भारतवासी अपनी संस्कृति को और अपनी विरासत को…
प्रश्न: नमस्कार, राष्ट्रवाद के बारे में आपका क्या कहना है?
आचार्य प्रशांत: शब्द एक है, राष्ट्रवाद, पर मोटे तौर पर इसके अर्थ दो हैं। दोनों को अलग-अलग समझना पड़ेगा।
इंसान के पास हमेशा दो रास्ते होते हैं न, वैसे ही समझ लो बहुत सारे शब्द हैं जिनके उन्हीं दो रास्तों…
प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, केसरी फ़िल्म के बारे में कुछ कहें। क्या ये फ़िल्म और बेहतर हो सकती थी? कैसे?
आचार्य प्रशांत: वीरता भी यकायक नहीं आती। वीरता भी अभ्यास माँगती है।
आपने अभी केसरी फ़िल्म की बात की।
इक्कीस नौजवान सिपाही यूँही नहीं भीड़ गए होंगे दस हज़ार अफ़गानों से।…
आचार्य प्रशांत: जब तुम अपने छोटे भाई से लड़ते हो तो वो बुरा माना जाता है, जब तुम अपने पड़ोसी…

The Bhagavad Gita is often accused of supporting caste and misogyny through selective quotations that ignore context, grammar, and the text's central teachings. A closer reading shows that its emphasis is on inner qualities, conscious action, and spiritual equality rather than birth-based hierarchy or gender discrimination. Misinterpretations arise when isolated verses are detached from their broader meaning, while the Gita consistently points toward self-knowledge, freedom from ego, and the universal possibility of liberation for every human being.

We have all put down a book that could have helped us, or dozed off halfway through something that mattered. A man who could not keep food down was given medicine, and he threw that away too, since it went in by the same route. Most of us strike a similar deal: we move into a place that stinks and, within a week, call the smell normal. Show our fifteen-year-old self the life we lead now and they would scoff. What would change if we admitted we do not like our condition?

![क्या आप आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी [इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग] के भाग हैं?](https://cimg.acharyaprashant.org/images/img-3dc72262-a991-4f45-a9d4-a0397e21022c/30/image.jpg)
आचार्य प्रशांत की गीता कम्यूनिटी इस सदी का एक अद्भुत आध्यात्मिक प्रयोग है।
आचार्य प्रशांत के यूं तो सोशल मीडिया इत्यादि पर तीन करोड़ से अधिक फॉलोवर और तीस करोड़ से अधिक श्रोता हैं, परंतु गीता कम्यूनिटी कुछ अलग ही बात है। इसमें मात्र वे गंभीर साधक सम्मिलित हैं जो…

"मुझे आश्चर्य होता है ये देखकर कि कैसे भगवान ने चार करोड़ बंगालियों को बनाते हुए, एक आदमी को भी जन्म दिया।"
जिस 'आदमी' की बात यहाँ गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर कर रहे हैं, उनके लिए एक बार गांधी जी ने कहा था,
"विद्यासागर की उपाधि उन्हें उनके ज्ञान के लिए…

राष्ट्रों का निर्माण किसी समाज की परिष्कृत बुद्धिमत्ता से होना चाहिए था, लेकिन वे सामूहिक अहंकार का दर्पण बन जाते हैं। व्यक्ति जो अपनी संपत्ति के साथ करता है, राष्ट्र वही GDP के साथ करता है—जो गिना और तुलना किया जा सके, उसे योग्यता का प्रमाण मान लेता है। हम इसे समझदारी कहते हैं, फिर आश्चर्य करते हैं कि व्यक्ति और देश दोनों सदा घिरे हुए क्यों महसूस करते हैं, मानो विश्राम करना निषिद्ध हो।

Dr. Ambedkar, one of the greatest minds of modern India, had problems with Hindu culture, but not with Vedanta. Our culture is based on the very periphery of religion and does not resonate with Vedanta. That’s the reason it is in conflict with the Constitution. The Constitution and true religiosity—which you can call self-knowledge or Vedanta—go together.

नवरात्रि आते ही हम सोचने लगते हैं कि क्या खाना है, क्या नहीं खाना, कौन-सा हवन करना है। पर व्रत का अर्थ है संकल्प, और शुभ संकल्प एक ही है: हम जैसे हैं, वैसे न रहें। इसीलिए ये नौ दिन दुर्गा सप्तशती को समझने के लिए हैं, केवल रस्मों के लिए नहीं। जिसे हम माँ कहते हैं, वह यह पूरी प्रकृति है, और उसके ही बच्चों को चोट पहुँचाकर उसका पर्व नहीं मनाया जा सकता। क्या इस बार हम नौ दिन अपने ही जीवन को ईमानदारी से देख पाएँगे?

व्यक्ति और उसके माता-पिता दोनों अक्सर प्रेम के नाम पर एक-दूसरे पर अधिकार जताते हैं, जबकि संबंधों में निर्णय सम्मान, समझ और स्वतंत्रता पर आधारित होने चाहिए। वयस्क होने के बाद जीवन के महत्वपूर्ण फैसले स्वयं लेने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है। सच्ची परवरिश निर्भरता नहीं, आत्मनिर्भरता पैदा करती है। पारिवारिक दबाव का बड़ा हिस्सा प्रेम से नहीं, बल्कि भय, सुविधा, अपेक्षाओं और स्वार्थ से संचालित होता है। स्वस्थ संबंध वहीं संभव हैं जहाँ दोनों पक्ष एक-दूसरे की चेतना, स्वतंत्रता और गरिमा का सम्मान करें।

Spirituality is neither a tradition nor a culture. Spirituality is not at all about following something or somebody. When it is said that you must follow the Guru, the Guru is the Truth, not a person not a man. Spirituality would never say, “Follow the words of a man.” Spirituality says, “Let the mind follow the Center, the Truth or you may call it the Heart or God.”

प्रश्नकर्ता: नमस्ते, आचार्य जी। सर आज काफ़ी अच्छे सीख थे सत्र में। और मेरा प्रश्न भी इस सत्र से ही सम्बन्धित है। सर, आपने बताया था कि मान्यताओं का सम्बन्ध अनुभव से है। प्रारम्भ में हमने चर्चा की था। यानी कि जो विकार हैं, वो भी एक तरह से मान्यताओं…

Questioner: Namskar Acharya ji. Pardon me for not remembering exactly but in one of the shivirs where we had read ‘Gospel of Sri Ramakrishna’ to come to terms with this expression called ‘Adhikar Bhed.’
So therein Ramakrishna was saying that, “now in modern times there cannot be any Adhikar Bhed,…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी! डू वी नीड टू क्रिएट गॉड्स ऑर वी हैव ऑलरेडी (क्या हमें भगवान बनाने होंगे या वो पहले से हमारे पास हैं)? जैसे हम कुछ अच्छी क्वालिटीज़ हम जो पढ़ते हैं शास्त्रों में, कई बार हमारे पास नहीं होती है, या वो हमारे पास है, हम अनदेखा…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। जब मैंने शिविर में आने की बात अपने जानने वालों को बतायी तो सबकी ओर से एक सी ही प्रतिक्रिया आयी कि ये तो जोगी बनने जा रहा है या संन्यास लेने की सोच रहा है। तो मेरा प्रश्न ये है कि समाज में अध्यात्म की…

जीवन में जो भी तुम्हें ऊँचे-से-ऊँचे अनुभव हों, उनको एक सीमा से ज़्यादा गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए। और जो लोग सच्चाई के रास्ते पर आगे बढ़ते हैं उनको थोड़े अलग तरह के अनुभव होने शुरू हो जाते हैं, इससे मैं सहमत हूँ। और वो अनुभव आपको तभी नहीं होते…

प्रश्नकर्ता: सत श्री अकाल आचार्य जी। आज सुबह से टीवी (दूरदर्शन) पर देख रहा हूंँ कि हमारे सिख भाई अफ़गानिस्तान से जान बचाकर भागने पर मजबूर किये जा रहे हैं। गुरु ग्रन्थ साहिब जी को सिर पर धारण करके बुरी हालत में उन्हें देखकर मुझे दुख भी है और गुस्सा…

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, स्वधर्म क्या है? क्या स्वधर्म का पालन करते हुए आजीविका चलायी जा सकती है?
आचार्य प्रशांत: स्वधर्म का कोई सम्बन्ध आपके रोटी-पानी के जुगाड़ से नहीं है, कि ये ऑक्युपेशन (व्यवसाय) कि वो ऑक्युपेशन। आप जिसको वर्क (काम) बोलते हैं, वो और क्या होता है? आजीविका का…

प्रश्नकर्ता: नमस्कार सर, हाल ही में मैंने अपने आदर्श स्टीव जॉब्स और विराट कोहली द्वारा सुझाई गयी लोकप्रिय किताब ‘ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पढ़ी, तो जीवन का अलग ही आयाम खुल गया।
उस किताब के लेखक और उनके गुरु ने, न केवल अपने पूर्व जन्मों के बारे में विस्तार से…

आचार्य प्रशांत: ध्यान की एक विधि। उत्सुकता आयी थी कि ध्यान की एक विधि दी जाए। तो आपमें से जो लोग उसके बारे में जानना चाहें, वो समझें।
शून्य-स्मरण। शून्य-स्मरण – जो कुछ भी बहुत आवश्यक और ज़रूरी लगता हो, जो कुछ भी नितांत क़रीबी, आवश्यक प्रतीत होता हो, उसको…

भारत का विभाजन हुआ था राजनीतिक तौर पर। मोहम्मद अली जिन्ना का यही तर्क था। वो कहते थे कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमें नहीं हैं, ये दो अलग-अलग राष्ट्र हैं। कहते थे कि ये लोग बिल्कुल अलग-अलग हैं। और चूँकि ये अलग-अलग राष्ट्र हैं, इसलिए इन्हें अलग-अलग राज्य भी बना देना चाहिए।" तो राष्ट्र किस आधार पर? चुन लिया कि धर्म के आधार पर हम चुनेंगे। और जो आप कह रहे हैं कि जड़ उसकी — यही लड़ाई है — आज तक।

आचार्य प्रशांत: इस तरह की व्यर्थ बातें प्रचलन में इसीलिए रह जाती हैं क्योंकि हिन्दू धर्म और भारतीय गौरव के नाम पर हम इनको कभी ख़ारिज नहीं करते।
हम कहते हैं कि देखो, हमारा धर्म इतना ऊँचा है और हमारा देश इतना ऊँचा है कि बड़े ज़बरदस्त योगी होते हैं…

Acharya Prashant: Hell is a place where you get a lot of sympathy, consolation, condolence, and commiseration. You're told that we agree that you are in a miserable state. Your neighbor comes to you, puts his hand on your shoulder, and with a grave face tells you that you are…

Acharya Prashant: Desire means that you are not alright with yourself and you want something else to happen, correct? So, we are anyway not living for ourselves. We are rather living to change ourselves. And are these not two very different things? If you are living for yourself as you…

Acharya Prashant: Whatever you are doing, there has to be honesty in that. What is important is that you do not say one thing and do another thing. If you look at the great scientific discoveries or inventions, the scientist or the explorer would be busy in his chosen area…

प्रश्नकर्ता: सबको प्रणाम। आज की इस धर्म चर्चा में आपका स्वागत है। आज हमारे बीच में एक ऐसी विभूति या कहें शख्सियत आचार्य प्रशांत जी हैं। आपके बारे में मैं थोड़ा सा बताना चाहूँगा। आप बहुत ही ज्ञानी और पढ़े-लिखे एक आचार्य हैं। इन्होंने आइआइटी से इंजीनियरिंग की, आइआइएम से…

प्रश्नकर्ता: साक्षी भाव के लिए ध्यान की आवश्यकता है?
आचार्य प्रशांत: साक्षी भाव और ध्यान एक ही बात है। ध्यान साक्षित्व का माध्यम नहीं है। थोड़ा समझेंगे, ध्याता हम सब सदा हैं, ऐसा नहीं कि जब आप कुछ विशिष्ट पलों में ध्यान लगाने बैठते हो तभी आप ध्यानी होते हो।…

एक बार को ज़िंदगी में चोर आ रहा हो, लुटेरा आ रहा हो, भ्रष्टाचारी आ रहा हो तो मजबूरी में उसको स्वीकार कर लेना, हालत ऐसी बने तो। पर ज़िंदगी में अगर अंधविश्वासी आ रहा हो, पलटकर भागना। आपने कभी सोचा ये डर क्या है? ये अहंकार है, ये अज्ञान है जो मानता ही नहीं कि तुम पूरे तरीके से कंडीशन्ड (संस्कारित) हो।

प्रश्नकर्ता: आचार्य जी, प्रणाम। मेरा प्रश्न मेरे वैवाहिक जीवन से है। किसी भी अन्य रिश्ते में मुझे अभिव्यक्ति करना सरल लगता है पर अपनी बातें अपनी पत्नी तक पहुँचाना बहुत ही कठिन लगता है। यह रिश्ता इतना गहरा है फिर इतनी मुश्किल क्यों?
आचार्य प्रशांत: अब तुम्हें यहाँ पर एक…

जो आम आदमी की फिलॉसफी है, वह यही है कि दुनिया की सबसे बड़ी जो ताकत है, जिस पर पूरा भरोसा किया जा सकता है, जो सब कुछ ठीक कर सकती है, जो सब कुछ चलाती है, वह ऊपर कहीं आसमानों में बैठी है। माने, वह इस दुनिया की नहीं है। माने, जो कुछ इस दुनिया का है, उसका भरोसा मत करो, वह ना कुछ जानता, ना समझता, वह तो गड़बड़ी है। माने, अगर आपकी कोई शारीरिक समस्या भी है, तो उसका समाधान वही करेगा, जो आसमानों में बैठा है। यही तो द्वैतवाद दर्शन है ना? हम गीता का दर्शन थोड़ी समझ पाए हैं।

प्रश्नकर्ता: मेरा सवाल फिर से मृत्यु के ऊपर ही है। आम ज़िन्दगी में जीवन के बारे में बोला जाता है कि जीवन आनन्द है या जीवन यह है, पर इसमें मृत्यु की कोई बात नहीं आती। जैसे आध्यात्मिकता में भी आप देखें तो लोगों ने मृत्यु पर ज़्यादा चर्चा नहीं…

प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैं राजस्थान से हूँ। राजस्थान भारत के उन राज्यों में से है जो लिंगानुपात की दृष्टि से पिछड़े हुए राज्य हैं। मेरा प्रश्न ये है कि आज के समाज में भी जब परिवार में बिटिया का जन्म होता है तो एक असंतोष का माहौल बनता है,…