यह जगते हुए आदमी का लक्षण है कि उसे बार-बार शक होता है, कहीं वह बेहोश तो नहीं है। जब आप कहते हैं, कुछ फ़ैसले नादानी, नासमझी में हो गए, तो छुपा दावा यही है कि बाक़ी समझदारी में किए हैं। गड़बड़ यही है — सब कुछ ही बेहोशी में हुआ है, क्योंकि करने वाला ही बेहोश था। अगर दिखने लगे कि निर्णय गड़बड़ थे, तो यह दुख नहीं, सौभाग्य है। नई शुरुआत करिए — पुराना जो था, सो था; 'अब मैं नया, मेरी कहानी नई, लिखते हैं फिर से, मज़ा आएगा।'
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प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी, मैंने जो पहले के सेशन्स देखे आपके, तो उसमें आपने बताया है कि लाइफ़ में हम जो भी करते हैं, डिसीज़न बेहोशी में नहीं लेने चाहिए। जो भी हम करते हैं तो हमेशा पूछते रहना चाहिए कि क्यों कर रहे हैं और हम क्या कर रहे हैं? आपको सुनने के बाद एक-एक चीज़ रियलाइज़ होती है कि हमने लाइफ़ में बड़े-बड़े डिसीज़न्स गलत लिए या बेहोशी में लिए।
तो मेरा क्वेश्चन ये है कि अभी हमें क्या करना चाहिए जो हमने डिसीज़न्स ले लिए या जो भी हमने बंधन बनाए, जो भी पास्ट में हो गया हमसे बेहोशी में, तो अभी हमें क्या करना चाहिए उनके लिए?
आचार्य प्रशांत: देखो, पहली बात तो इसको कुछ विशेष नहीं मानना चाहिए कि अतीत में कुछ बेहोशी में हो गया। क्योंकि हमारा तो जन्म ही बेहोशी में होता है न। बेहोशी माने एक ऐसी घटना जिसमें आपकी बोधपूर्ण सचेत सम्मति नहीं थी। उसे ही बेहोशी कहते हैं न? कोई आदमी नशे में है और वो नशे में सड़क पर गिर पड़े, कहीं नाली में गिर पड़े, तो हम कहते हैं बेहोशी में हो गया। हम कहते हैं, इसको पता तो था नहीं और ये सड़क को ही पलंग समझकर सो गया।




