गलत को हटा रहे हो तो सही को लाओ भी || आचार्य प्रशांत, भगवद् गीता पर (2020)

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः। रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।।२.५९।।
इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुष के भी केवल विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, परन्तु उनमें रहने वाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है। ~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ५९
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित:। इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः।।२.६०।।
हे अर्जुन! इंद्रिय इतनी प्रबल तथा भगवान है कि जो मनुष्य इंद्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है उसे विवेक मनुष्य के मन को भी बलपूर्वक कर लेती हैं। ~ श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय २, श्लोक ६०
प्रश्नकर्ता: प्रणाम आचार्य जी। श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि स्थिरबुद्धि वाले मनुष्य की आसक्ति भी परमात्मा के साक्षात्कार से मिट जाती है। और अगले ही श्लोक में कह रहे हैं कि इन्द्रियाँ बलपूर्वक विवेकी मनुष्य को भी हर लेतीं हैं। तो आचार्य जी, इसमें हमारी साधना कैसी होनी चाहिए कि हम इन्द्रियों के वश में न रहें और सत्य के रास्ते पर आगे बढ़ सकें? कृपया मार्गदर्शन दें।
आचार्य प्रशांत: दो बातें हैं — पहली, इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करना और दूसरी परमात्मा का साक्षात्कार। कह रहे हैं श्रीकृष्ण कि बड़ी ज़बरदस्त क्षमता है इन्द्रियों। में सबको उठा ले जाती हैं, हरण कर लेती हैं। इन्द्रियाँ इतनी प्रबल तथा वेगवान हैं कि जो मनुष्य इन्द्रियों को वश में करने का प्रयत्न करता है उस विवेकी मनुष्य के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं। बड़ी ताक़त है।



