बंधन चाहने से बंधन मिलता है और मुक्ति चाहने से भी बंधन ही मिलता है || आचार्य प्रशांत (2016)

वक्ता: प्रश्न है कि अपनी मज़बूरी को हम कभी स्वीकारना क्यों नहीं चाहते? अपना छोटा होना बर्दाश्त क्यों नहीं होता?
पहले तो कहते हो कि मज़बूरी है फिर कहते हो कि उसे स्वीकारना क्यों नहीं चाहते। पहले तो कहते हो कि छोटे हो फिर कहते हो कि छोटा होना बर्दाश्त क्यों नहीं होता। बर्दाश्त न कर रहे होते, तो छोटा होने का भाव कहाँ से आता? मज़बूरी को पाला नहीं होता, स्वीकारा नहीं होता तो ‘मज़बूरी है’ ऐसा कैसे कह पाते?
मज़बूरी न अनिवार्य है, न स्वभाव है। क्षुद्रता न अनिवार्य है, न स्वभाव है। ये तो तुम्हारे बुलाए आती हैं, तुम्हारी इच्छा के रहते रहती हैं। अब तुम कहो कि तुम मज़बूरीवश मजबूर हो, तो ये तुम्हारा भ्रम नहीं है; ये धोखाधड़ी है। तुम कहो कि तुम परिस्थितिवश, दुर्घटनावश असहाय हो, छोटे हो, तो इसमें न तुम्हारी ग्लानि है, न विवशता, इसमें सीधे-सीधे धूर्तता है बस। क्यों झूठ बोलते हो?
जो है नहीं, उसको लादे फिरते हो फिर कहते हो “बड़ा बोझ है, बड़ी यातना है।” जिसको लिए फिरने का न कोई औचित्य है, न कर्तव्य, न धर्म उसको अंगीकार करे हो, उसको लपेटे लपेटे-लपेटे, समेटे-समेटे फिरते हो। किसने विवशता दी है तुम्हें? किसी ने भी नहीं, तुम्हारी अपनी श्रद्धाहीनता है। कह सकते हो कि डरते हो, पर डर और कहाँ से आता है? बीच का बना रहना चाहते हो, न इस छोर को हाँ बोलते हो, न उस छोर को हाँ बोलते हो। ये छोर सत्य का है, वो छोर माया का। उस छोर को तुम कभी पूरी तरह हाँ बोल नहीं सकते क्योंकि हाँ बोल भी दोगे तो वो हाँ झूठी होगी, निभा नहीं पाओगे हाँ को। कौन है जो अपने स्वभाव के विपरीत हाँ बोल कर के उस हाँ पर कायम रह पाए?
कह भी दोगे कि मूर्ख हो, तो मूर्खता ओढ़ थोड़ी सकते हो। कह भी दोगे कि असंवेदनशील हो, तो भी ह्रदय के स्पंदन को शांत थोड़ी कर सकते हो। कह भी दोगे कि प्रेम से कोई वास्ता नहीं, तो भी प्रेम तरंगायित तो कर क्या लोगे? मृत्यु को हाँ बोलकर भी जीवन से पिंड कैसे छुड़ा लोगे? जीवित तो हो, सौ बार मृत्यु को हाँ बोलो जीवन की कोपलें तो फूट रही हैं। तो उस पार को हाँ बोलने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ऐसा नहीं कि हाँ तुमने बोला नहीं, तुमने तो सौ बार उधर हाँ बोला है, जितनी बार हाँ बोला है, उतनी बार पाया है कि तुम्हारी हाँ की कोई हैसियत नहीं। तुम्हारा बस चलता, तो तुमने कब का उधर से समझौता कर लिया, तुम्हारा बस चलता तो तुमने सत्य को कब की पीठ दिखा दी होती। तुम्हारा बस चलता तो तुम कब के अँधेरे में समा गए होते। तुमने अपनी तरफ़ से तो कोई कसर छोड़ी नहीं। रोज़ उधर ही जाकर हाँ बोलते हो, अपने आप को बेच आते हो, लेकिन फिर भी कुछ है तुम्हारे भीतर, जो तुम्हें उधर का होने नहीं देता।



