आनंद हो संबंधों का आधार || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2013)

वक्ता: बात सुनने में थोड़ी अजीब लगेगी पर ध्यान दोगे तभी समझ आएगी। ध्यान नहीं दोगे तो कहोगे कि सर आप बड़ी विपरित बात कर रहे हैं। जिसने अपने अकेलेपन में खुश रहना सीख लिया सिर्फ वही पार्टी में मज़े मार सकता है। जो अकेले भी खुश है, सिर्फ वही पार्टी में भी खुश रह पायेगा और जो अपने अकेलेपन में दुखी है और पार्टी में इसीलिए जा रहा है ताकि पार्टी में अकेलापन मिटा सके, वो पार्टी में भी तन्हा ही रहेगा। दूसरे इसलिए नहीं होते हैं कि दूसरे तुम्हारे अकेलेपन को दूर करें। आदमी दूसरे के पास जाता है, इसके दो कारण हो सकते हैं।
पहले ये कि मैं बड़ा अकेला हूँ, मेरे दिल में गड्ढा है और तू उस गड्ढे को भर दे। ज्यादातर लोगों की यही वजह रहती है। दूसरी वजह होती है कि मैं इतना खुश हूँ कि तेरे पास आया हूँ। मैं खुश पहले से ही हूँ और इतना हूँ कि तेरे पास आ गया हूँ।
पहली वजह कहती है की मैं इतना दुखी हूँ कि तेरे पास आ गया हूँ, और दूसरी वजह कहती है कि मैं इतना खुश हूँ कि मैं तेरे पास आ गया हूँ। बात समझ में आई? तुम किस वजह से जाना चाहते हो किसी के पास?
सभी श्रोतागण: खुश होकर।
वक्ता: पर हम ऐसे नहीं जाते न। हम जाते हैं कि अगर तू न मिला तो मैं दुखी हो जाऊँगी। हम ये नहीं कहते कि तू हो, न हो, खुश तो मैं हूँ ही और अपनी ख़ुशी में तेरे पास आई हूँ। हम ये कहते हैं कि तू मिलेगा तो मैं खुश होऊँगी। ये बड़ी गड़बड़ है क्योंकि अब दूसरा तुम्हारी ज़रूरत बन गया है, अब तुम उसको पकड़ कर रखना चाहोगे और हज़ार तरह की बीमारियाँ निकलेगी। तुम मालिकाना हक़ जताओगे उसपर, तुम अधिकारात्मक हो जाओगे। वो किसी और की तरफ जाएगा, तो तुम्हारे अंदर से ईर्ष्या उठेगी, गहरी ईर्ष्या कि किसी और के पास जा रहा है।



