हम जो लगातार चुनाव करते रहते हैं, वही हमारा बंधन है और चुनाव के इसी अधिकार में हमारी मुक्ति की कुंजी भी है। उपनिषद् हमें सही चुनाव करने का तरीका बताते हैं। ऋषियों का एक-एक शब्द बेचैन मन की शांति हेतु ही है। यही उपनिषदों का एकमात्र उद्देश्य है। जहाँ कहीं भी पाओ कि जो रास्ता तुम चुन रहे हो वह तुम्हें और अधिक आश्रित बना देगा — बचो। और अगर कोई ऐसा रास्ता है जिस पर चलकर तुम्हारे बंधन टूटेंगे, तुम स्वावलंबी होते जाओगे — उस रास्ते पर आगे बढ़ जाओ।
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प्रश्नकर्ता: वेदांत क्यों रचा गया?
आचार्य प्रशांत: ऋषियों का एक-एक शब्द सुनने वाले बेचैन मन की शांति हेतु ही है। यही एकमात्र उद्देश्य है उपनिषदों का। एक-एक बात जो कही जा रही है वह किसी अवस्था विशेष से कही जा रही है; सत्य, अनावलंबित सत्य, निरुद्देश्य सत्य, निष्प्रयोजन सत्य, कहा ही नहीं जा सकता। जो कुछ कहा जाता है वह सदा किसी सीमित इकाई के लाभ हेतु कहा जाता है। असीम सत्य को शब्दों में वर्णित करने का कोई उपाय नहीं है। उपनिषदों में भी जो कहा गया है वह मन के लाभार्थ कहा गया है। वैसे ही उसको देखना होगा। सत्यता मत ढूँढिएगा, उपयोगिता देखिएगा।
‘सत्य या ब्रह्म से श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं,’ यह वाक्य बहुत औचित्यपूर्ण नहीं होगा क्योंकि सत्य या ब्रह्म के अतिरिक्त दूसरा कोई है ही नहीं, जब दूसरा कोई है ही नहीं तो दूसरा कोई श्रेष्ठ या हीन कैसे हो सकता है? तो यह बात इसीलिए किसी पूर्ण या मुक्त संदर्भ में नहीं कही गई है, यह बात मन के सीमित संदर्भ में कही गई है। मन ही है जिसको बहुत सारे दिखाई देते हैं, जिसके लिए वैविध्यपूर्ण संसार है, जिसके सामने हज़ारों-करोड़ों भिन्न-भिन्न इकाइयाँ हैं, और उन इकाइयों में वह किसी को श्रेष्ठ समझता है और किसी को हीन।




