हिंसा चाकू, बूचड़खाने या थाली में नहीं, बल्कि उस अहंकार में जन्म लेती है जो स्वयं को केंद्र मानकर दूसरों को उपयोग की वस्तु बना देता है। कानून, नैतिकता और करुणा की सीमाएँ अक्सर स्वार्थ के अनुसार तय होती हैं, इसलिए बाहरी सुधार पर्याप्त नहीं होते। जब मनुष्य अपने भीतर की बेहोशी और आत्म-केंद्रितता को पहचानता है, तभी संबंध, करुणा और जीवन के प्रति उसका व्यवहार स्वाभाविक रूप से बदलता है।
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Originally published in Navbharat Times on 2 August '26
हिंसा वास्तव में कहाँ है? इस साल जून - जुलाई में लंदन में मैंने हिंसा के मूल कारण को लेकर प्रोफेसर जोनाथन बर्च के साथ लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में, PETA की मिमी बेखेची और पूर्वा जोशीपुरा के साथ, और मनोवैज्ञानिक डॉ. मेलनी जॉय के साथ चर्चा की। 26 जून को मैं लंदन स्कूल ऑफ इकनॉमिक्स में प्रोफेसर जोनाथन बर्च के साथ संवाद में था, लंदन क्लाइमेट एक्शन वीक के अंतर्गत। शहर बाहर भीषण गर्मी की चपेट में था, जिसके लिए लंदनवासी मुझसे बार-बार क्षमा मांग रहे थे, मानो मौसम ने मेजबानी में कोई कमी छोड़ दी हो।
प्रोफेसर बर्च वहां जेरेमी कोलर सेंटर फॉर एनिमल सेंशिएंस के निदेशक हैं। 2021 में उन्होंने उस समीक्षा का नेतृत्व किया जिसने अकशेरुकी जीवों (इंवर्टीब्रेट्स) में चेतना के प्रमाणों की जांच की और एनिमल वेलफेयर (सेंशंस) अधिनियम को आकार दिया, और आज ऑक्टोपस, स्क्विड, कटलफिश, केकड़े, लॉब्स्टर और झींगे ब्रिटिश कानून में चैतन्य प्राणी के रूप में मान्य हैं। यह सब उन्हीं के योगदान से हुआ है। ऑक्टोपस पालन पर उनकी रिपोर्ट कैलिफोर्निया में प्रतिबंध का आधार बनी।




