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आत्मा क्या है? (पूरी बात) || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)
Author Acharya Prashant
Acharya Prashant
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प्रश्नकर्ता: आत्मा क्या है?

आचार्य प्रशांत: हम कैसे कह पाते हैं कि हम हैं? भीतर कौन है जो कहता है कि वह है? मैं हूँ? कौन है जिसको कोई भावना उठती है फिर गिरती है, जिसको विचार आता है फिर कभी उस विचार को वो बहुत आगे बढ़ा देता है, कभी विचार को खारिज कर देता है? क्या नाम देते हैं उसको?

श्रोतागण: मन।

आचार्य: मन। भीतर एक दुनिया है न? एक तो वह दुनिया है जो आपको आँखों से दिखती है, और एक भीतर दुनिया होती है – मन का आकाश, चिदाकाश! है न? वहाँ बहुत कुछ चल रहा होता है, और वहाँ जो कुछ चल रहा होता है उसके केंद्र में 'मैं' बैठा होता है।

जो भीतरी दुनिया है – हम परिभाषाएँ दे रहे हैं शुरू में ताकि आगे आत्मा को समझ सकें – जो भीतरी दुनिया है उसको क्या बोलते हैं? मन। जैसे बाहर-बाहर तो हम सब एक ही जगह पर बैठे हुए हैं अभी यहाँ पर, है न? लेकिन फिर भी हम सब अलग-अलग जगहों पर बैठे हैं।

हमारे पास कोई ऐसी तकनीक नहीं है, कोई ऐसा यंत्र नहीं है जो दिखा सके कि आप अभी कहाँ बैठे हैं। पर अगर हम ऐसी कोई तकनीक विकसित कर पाएँ तो वह दिखाएगी कि जितनी देर में एक घंटे में मैंने पिछली बात करी उतनी देर में हम सब मिलाकर के सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर आए – कोई अपने घर हो आया, कोई बाज़ार हो आया, कोई मिठाई की दुकान पर बैठ गया, कोई कुछ सोच रहा है, कोई कुछ कर रहा है; कोई हो सकता है थोड़ी देर के लिए बृहस्पति ग्रह पर आया हो, कुछ भरोसा नहीं। भीतर एक अलग ब्रह्माण्ड ही चल रहा है, उसको क्या कहते हैं? मन।

और भीतर जो कुछ भी चल रहा होता है उसके केंद्र में 'मैं' बैठा होता है। देखिएगा ग़ौर से, आप किसी विषय को नहीं सोचते अगर उसका आपसे कुछ-न-कुछ सम्बन्ध न हो तो। हर विचार में 'मैं' छुपा होता है, और ‘मैं’ माने एक अधूरापन जो अपनेआप को पूरा करने के लिए लगातार व्याकुल है। एक अपूर्णता जिसका स्वार्थ बस एक है कि कोई मुझे आकर के पूर्ण कर दो। तो हमारे सब विचारों में हमारा स्वार्थ ही होता है, हमारी सब भावनाओं में भी हमारा स्वार्थ ही होता है। जो आपके काम आता है वह अच्छा लगने लग जाता है या नहीं? बस बात ख़त्म! और जो आज अच्छे लगते हैं वह काम आना बंद हो जाएँ तो कितने दिन अच्छे लगेंगे?

कभी देखा है – घर के वह सदस्य जो कभी कमाते थे घर में कितनी इज़्ज़त पाते थे? सब आश्रित थे उनपर। और वही जब बूढ़े हो जाते हैं और बीमार, और ऐसे हो जाते हैं कि अब उनकी सेवा करो, उनको दवाई दो, उनको नहलाओ, उनको साफ़ रखो, उनको शौच कराओ, तो घर के लोग उनको फिर किस दृष्टि से देखते हैं, देखा है? अच्छा भी वही लगता है जो काम आता है। मन में भी वही घूमता है जिससे कोई कामना होती है। तो मन के केंद्र में कौन बैठा?

श्रोतागण: मन।

आचार्य: मन, ठीक है। आत्मा क्या है? आत्मा है – 'मैं' को शून्य करना, मन को शुद्ध करना। हमारा मन अशुद्ध है क्योंकि उसके केंद्र में 'मैं' भाव है – मैं पूरी कोशिश कर रहा हूँ जितने सरल तरीके से कह सकता हूँ कहूँ; आपने जो सबसे ऊँचा सवाल हो सकता है सीधे वही पूछ दिया है, ‘आत्मा क्या है?’ – हमारा मन अशुद्ध रहता है, अशुद्ध माने? उसमें ऐसी ही बातें रहती हैं, ऐसे ही विषय, ऐसे ही विचार, भावना, वृत्ति रहती हैं जो हमारे लिए घातक होंगे; यही अशुद्ध की परिभाषा है। अशुद्धि माने यह सब नहीं कि दाल में कंकड़ आ गया, या फ़लानी चीज़ गंदी हो गई, वैसे नहीं।

अशुद्धि माने? जो कुछ भी आपके लिए हानिप्रद हो उसको हम अशुद्ध बोलेंगे। समझ में आ रही है बात?

गन्ने के रस में नमक मिला देते हो तो अशुद्ध हो जाता है क्या? कहते हो अशुद्ध हो गया? गन्ने के रस में नमक मिला दिया वह अशुद्धि कहलाती है क्या? क्यों नहीं बोलते? क्योंकि हानिप्रद नहीं है न भाई। अब गन्ने के रस में हल्दी मिला दूँ, हींग मिला दूँ, कंकड़ का चूरा मिला दूँ तो कहोगे 'यह अशुद्धि है।' तो शुद्ध और अशुद्ध की परिभाषा समझिएगा – मिलावट भर करने से अशुद्धि नहीं आ जाती। कितनी ही चीज़ों में मिलावट की जाती है, जानबूझकर की जाती है, उससे लाभ होता है; जहाँ लाभ होता है वहाँ कोई नहीं बोलेगा कि अशुद्धि होती है, बोलना भी नहीं चाहिए।

लेकिन अब यह चाय है मेरी (चाय के प्याले की ओर इंगित करते हुए), इसमें इतना-सा (उँगली की सहायता से मात्र बताते हुए) ज़हर कोई मिला दे, तो वह भारी अशुद्धि हो जाएगी क्योंकि उससे घात हो जाएगा – तो यह अशुद्धि है। मन अशुद्ध क्यों है फिर? क्योंकि उसमें जो कुछ चल रहा होता है वह नुक़सानदेह होता है; किसके लिए? स्वयं उसी के लिए।

मन में जो कुछ चल रहा होता है वह मन के बीचोबीच बैठे मन के मालिक के लिए ही घातक होता है; मन का मालिक कौन? अहम्। तो अशुद्ध विचार किसको बोलते हैं? क्यों है वह विचार अशुद्ध? सिर्फ़ नैतिकता की वजह से? बड़े-बूढ़ों ने, परंपरा ने बता दिया कि फ़लानी चीज़ गंदी है तो गंदी हो गई? नहीं। हाँ, जिसको वह विचार है वह विचार उसी को खा जाएगा – इसको कहते हैं अशुद्धि। तो मन हमारा है अशुद्ध।

देखिए, अगर आप समझते नहीं हैं तो आप किसी चीज़ को शुद्ध बोलेंगे आप उसके साथ नहीं रह पाएँगे, किसी चीज़ को आप अशुद्ध बोलेंगे आप उसको त्याग नहीं पाएँगे; बस ऊपर-ऊपर से कहते रह जाएँगे, वह एक उथली नैतिकता, मोरैलिटी होगी, उसमें कोई दम नहीं होगा। आप समझ जाएँ कि अशुद्धि ख़तरनाक है मेरे ही लिए तो फिर अशुद्धि आप से छूट जाएगी।

बोध है जो सार्थक परिवर्तन लाता है; नैतिक नामकरण से कुछ नहीं होता कि किसी चीज़ को गंदा बोल दिया। मन में कामवासना चलती रहती है, 'अरे! गंदी है, अशुद्ध है, अशुद्ध है'। जब तक यह दिखेगा नहीं कि इससे अपना ही बेड़ा गर्क हो रहा है, तब तक वह (छूटेगा नहीं)। मन में लालच चल रहा है, किसी से द्वेष चल रहा है, ऊपर से तो हम सब कहते हैं, 'यह अशुद्ध विचार हैं, यह गंदी भावनाएँ हैं', बोल देते हैं न कि 'इन सबसे ज़रा दूर रहो, यह क्यों कर रहे हो? क्रोध, भय, मोह, मद, मात्सर्य बेकार की बातें हैं, इनमें क्यों फँस रहे हो?'

फँसे कितने लोग रहते हैं?

श्रोतागण: सभी।

आचार्य: सभी। क्यों फँसे रहते हैं? नुक़सान दिख नहीं रहा। तो अशुद्धि माने नुक़सान! जिस क्षण आपको दिख गया कि नुक़सान हो रहा है, आप ऐसे (झटक कर फेंकने का अभिनय करते हुए) छोड़ोगे ऐसे, क्योंकि जीना तो हमें अपने साथ है न, भलाई भी सर्वप्रथम हम अपनी चाहते हैं; कोई नहीं है जो अपनी भलाई न चाहता हो, कोई है जो अपनी भलाई नहीं चाहता?

जो आत्महत्या भी करते हैं, अपनी भलाई के लिए करते हैं; वह कहते हैं, 'जीवन में इतना दुख मिल रहा है कि भलाई इसी में है कि...'

तो हम हर तरीके से अपनी भलाई चाहते हैं और यह बहुत अच्छी बात है, होना भी चाहिए ऐसा। आपको दिख जाए कि आपके ही मन में जो दुनिया आपने बनाई है, वह दुनिया आपके लिए बहुत घातक है; आप उस दुनिया से बाहर आ जाएँगे। वह दुनिया घातक क्यों हैं? क्योंकि उसके केंद्र में बैठा है? सब विचारों के केंद्र में कौन है? 'मैं'! और यह 'मैं' है पगला। इस 'मैं' का जो निर्माण है वह किया है शरीर की यंत्रबद्धता और समाज के प्रभावों ने।

दो जगह से आता है 'मैं' – बात बहुत भारी तो नहीं हो रही? मैं चाहता हूँ हम सब बहुत अच्छे से समझें इसको। मैं यह भी चाहता हूँ, यह जो रिकॉर्डिंग हो रही है यह जाएगी लाख, दो लाख, हो सकता है बीस लाख लोगों तक जाएगी, उनको भी पूरा लाभ हो।

'मैं' का जो निर्माण हुआ है वह दो जगह से हुआ है – एक तो जो बच्चा पैदा हुआ है वह पहले ही 'मैं' भाव लेकर पैदा होता है; 'मैं' भाव, ठीक है? लेकिन उस वक़्त वह इतना अविकसित होता है कि उसको भाव नहीं बोलते, उसको तब बोलते हैं वृत्ति! क्या बोलते हैं? बस टेंडेंसी (वृत्ति) है, अभी एक फ़ुल्ली डेवलप्ड आई फिलिंग (पूर्ण विकसित 'मैं' भाव) नहीं है उसमें; उसमें सिर्फ़ क्या है? अहम्-वृत्ति है, आई टेंडेंसी है। वह आई टेंडेंसी वास्तव में जन्म लेने से पहले ही आ जाती है, गर्भ में ही आ जाती है; पर मान लीजिए कि गर्भ के समय में मौजूद है, अभी पैदा हुआ है, पहला दिन है, उसमें – तो शरीर आपको देता है आई टेंडेंसी ! और वह सबमें होती है, मनुष्य भर में नहीं, सब जीवों में होती है, यहाँ तक कि पौधों में भी होती है, 'मैं' भाव! 'मैं'। अपने अस्तित्व का संज्ञान, और यह जानना कि मैं कहाँ तक हूँ कहाँ तक नहीं हूँ।

(हथेली की सहायता से मेज़ पर मारते हुए) बच्चा कुछ नहीं कहेगा। (अपने हाथों की सहायता से एक हाथ से दूसरे हाथ पर मारते हुए) यह बच्चे का हाथ है, यह ऐसे रखा हुआ है मेज़ पर, आप यहाँ पर (बच्चे के बगल में) मारिए बच्चा कुछ नहीं करेगा। अभी-अभी, शब्दजात बच्चा है, एक दिन का। (हथेली की सहायता से दूसरी हथेली पर मारते हुए) कहाँ मारा अब?

श्रोतागण: बच्चे के शरीर पर।

आचार्य: वह तत्काल प्रतिक्रिया करेगा। इससे क्या साबित होता है? सीमा खींच चुका है वह; किसी ने सिखाया नहीं! पर कहीं-न-कहीं उसने सीमा खींच ली है; वह जान गया है कि मैं कहाँ तक हूँ और कहाँ नहीं हूँ। आप उसके पालने को मार दीजिए बच्चा रोएगा क्या? आप उसके गाल पर थप (अपने गाल पर हल्के से मारते हुए) दे दीजिए वह रो पड़ेगा, उसको चोट नहीं लग गई है बहुत, ऐसा नहीं है आपने (उसकी बहुत पिटाई की है); लेकिन वह भेद माँ के पेट से लेकर पैदा हुआ है कि मैं कहाँ हूँ और कहाँ नहीं हूँ। यह शरीर है यह मैं हूँ – इतनी बात वह लेकर पैदा हुआ है।

मैं कौन हूँ? मैं शरीर हूँ। माँ को भी वह शरीर के रूप में ही देखता है। उसको आपको सिखाना तो नहीं पड़ता न कि माँ से आहार कैसे लेना है। अभी पैदा हुआ है, दो घंटे नहीं हुए पैदा हुए और इतना ज्ञान उसको है कि माँ से आहार कैसे ले लेना है। कोई उसको आपने ट्रेनिंग नहीं दी है, बिना प्रशिक्षण के ही वह दुग्धपान कर लेगा। ठीक?

कैसे जान गया?

तो 'मैं' का आधार है हमारी शारीरिकता। हम गर्भ से ही 'मैं' को लेकर पैदा होते हैं, और जो गर्भ से 'मैं' पैदा होता है वह कहता है, ‘मैं देह हूँ! मैं भी देह हूँ, माँ भी देह है।‘ मैं भी देह हूँ और माँ भी देह है, यह पशुता का सबसे निम्नतम स्तर है।

तो जानने वालों ने बार-बार कहा कि गर्भ से जानवर पैदा होता है, पशु पैदा होता है; हमें प्यारा लगता है अलग बात है, पर वह है पशु ही। फिर वह बड़ा होता है, अब उस 'मैं' के साथ और चीज़ें जुड़ती हैं। पैदा होते वक़्त 'मैं' के पास कुल एक वक्तव्य था – ‘मैं देह हूँ!’ फिर उसमें कुछ भाव जुड़े, उदाहरण के लिए – मैं कष्ट में हूँ! कष्ट में हूँ तो मैं क्या करूँगा? मैं रोऊँगा। मैं भूखा हूँ तो मैं क्या करूँगा? मैं और तो कुछ कर ही नहीं सकता, तो मैं रोऊँगा; या थोड़ा-सा जब बड़ा हो जाता है तो मुस्कुराना सीख जाता है – मैं प्रसन्न हूँ तो मैं (हसूँगा)।

तो अब 'मैं' के साथ और वक्तव्य भी जुड़ने लगे। अब थोड़ा और बड़ा होता है, अब जाता है वह स्कूल, वहाँ उसको दस चीज़ और बताते हैं, मैं के साथ और पाँच चीज़ें जुड़ती हैं। साथ-ही-साथ घरवाले बताते हैं – मैं हिंदू हूँ, मैं ईसाई हूँ, मैं मुसलमान हूँ; मोहल्ला उसको सिखा देता है – मैं लड़का हूँ, मैं लड़की हूँ। माँ उसको दुकान में लेकर गई – लड़कियों के कपड़े अलग दिखा दो, लड़कों के कपड़े अलग। खिलौनों की दुकान में लेकर गई – लड़कियों के खिलौने अलग लड़कों के खिलौने अलग। नामकरण हुआ, पंडित जी आए – लड़कियों के नाम अलग लड़कों के नाम अलग।

अब यह सब बातें 'मैं' के साथ जुड़ने लग जाती हैं। मैं का जन्म ही हुआ था बेहोशी में, कहाँ जन्म हुआ था 'मैं' का? माँ के गर्भ में! और वह 'मैं' कुछ नहीं था, वह 'मैं' बिलकुल शारीरिक था; कि देह है तो 'मैं' है! जैसे जानवर के पास देह भी नहीं होती है तो 'मैं' होता है। एकदम एक एनिमलिस्टिक (पाशविक) चीज़ पैदा हुई थी जिसका नाम है, 'मैं'। अब वह 'मैं' इतना बड़ा हो जाता है (हाथों से बड़े का आकार बताते हुए)।

फिर दसवीं में उसके बहुत नंबर आ गए – 'मैं बोर्ड टॉपर हूँ'। ग्यारहवीं में उसकी गर्लफ्रेंड बन गई – 'मैं हैंडसम हूँ'। अच्छे कॉलेज में एडमिशन मिल गया – 'मैं यह धुरंधर हूँ'। फिर कुछ हो गया पैसे कमाने लग गया – 'मैं अमीर हूँ'। फिर समाज में उसका कुछ रुतबा, प्रतिभा – 'मैं यह हूँ'। अब 'मैं' फूल कर इतना बड़ा (हाथों से आकार बताते हुए) हो जाता है। और यह कुल मिलाकर 'मैं' है क्या? पीछे जा रहे, पीछे जा रहे... हाँ, जानवर। वही जानवर फूल कर इतना बड़ा हो जाता है और फिर वह विचारक बन जाता है।

जानवर के सारे विचार कैसे होंगे? मूर्खता के। वह सारे विचार उसी के लिए घातक होते हैं, इसीलिए हम कह रहे थे, 'वह सारे विचार अशुद्ध होते हैं।'

जानवर की भावनाएँ कैसी होंगी? (इशारे में कहते हैं, जानवर जैसी ही) लेकिन जो असली जानवर होता है: हिरण, शेर, गाय, भैंस, कुत्ते, बिल्लियाँ इनके विचार इनके लिए घातक नहीं होते, जानते हैं क्यों? क्योंकि उनकी शारीरिक संरचना ऐसी है कि उनको मुक्ति जैसी कोई चीज़ चाहिए नहीं। तो उनको प्राकृतिक विचार और भाव आते रहते हैं जिससे उनका प्राकृतिक क्रियाकलाप चलता रहता है।

कुत्ता पैदा होता है, एक निश्चित तरीके से अपनी ज़िंदगी जीता है, मर जाता है। बिल्ली पैदा होती है, एक निश्चित तरीके से ज़िंदगी जीती है, मर जाती है; उन्हें मुक्ति वगैरह कुछ नहीं चाहिए। उसे क्या चाहिए? चूहा! उसे क्या चाहिए? दूध दे दो, खाना दे दो, और अगर सही समय आ गया है तो मुझे सही साथी दे दो; आराम दे दो, सोने की बढ़िया जगह होनी चाहिए। खाना-सोना यह दो काम पशुओं के होते हैं। और यही जो 'मैं' भीतर बैठा हुआ है हमारा यह भी वही पशुओं वाले काम करता रहता है; लेकिन बड़ी जादुई बात है, कारण मत पूछिएगा, इसी 'मैं' में एक प्रसुप्त, गहरी आकांक्षा होती है ‘मुक्ति’ की।

और ऊपर-ऊपर से क्रियाकलाप यह करता है सारे?

श्रोतागण: जानवरों वाले।

आचार्य: जानवरों वाले। भीतरी आकांक्षा है?

श्रोतागण: मुक्ति की।

आचार्य: यह मनुष्यता की कुल स्थिति है। यह स्थिति आप नहीं समझेंगे तो आत्मा वगैरह बस शब्द रह जाएँगे आपके लिए। जो ह्यूमन कंडीशन है (मानवीय स्थिति) पहले उसको ठीक-ठीक डेसिफर (व्याख्या) करना बहुत ज़रूरी है – हम हैं कौन? हमारी हालत क्या है? हमारी हालत यह है कि हम जानवर हैं और जानवरों की तरह ही बर्ताव करते हैं।

दो चीज़ें हैं जो हममें जानवरों से भिन्न हैं; पहला, मुक्ति की आकांक्षा, दूसरा बुद्धि! जानवरों के पास यह दोनों ही चीज़ें नहीं होती हैं। उनको बुद्धि चाहिए ही नहीं होती है; उनके पास जो प्राकृतिक व्यवस्था है वह पर्याप्त होती है।

साइबेरिया से पक्षी उड़कर आते हैं – हज़ारों किलोमीटर की यात्रा करके भारत पहुँच जाते हैं, उसके लिए उनको वास्तव में देखिए, बुद्धि नहीं लगानी पड़ती; उनके भीतर जो एल्गोरिदम है, जो सॉफ्टवेयर है वह पर्याप्त है, वो उनको वहाँ से यहाँ तक ले आता है।

बिल्ली आपने देखा है कभी दीवार पर कैसे चल रही होती है? वो उसको सीखना थोड़े ही पड़ता है। चूहा कितनी कलाकारी से बिल बना लेता है, बया पक्षी का घोंसला देखा है, वह कैसे बुन लेता है; वह बुद्धि का खेल नहीं है, वह उसकी प्राकृतिक व्यवस्था है; उसको गर्भ से ही पता है ऐसा कर लेना है, उसे सीखना नहीं पड़ता। तो बुद्धि की व्यवस्था उनको प्रकृति ने दी ही नहीं है, उनके लिए ज़रूरी नहीं है; है भी बुद्धि पर बहुत न्यून है, अंडरडेवलप्ड , अविकसित बुद्धि।

और दूसरी चीज़ उनके पास क्या नहीं है? मुक्ति की आकांक्षा नहीं है, मनुष्य के पास यह दोनों चीज़ हैं। अब मनुष्य 'मैं' वृत्ति तो जानवर-सी लेकर पैदा हुआ है, साथ-ही-साथ उसको मिल गई है बुद्धि! तो वह क्या करता है? काम जानवरों वाले, लेकिन बड़े बुद्धिमत्तापूर्ण तरीके से, बड़ी चालाकी से करता है सारे काम जानवरों वाले। काम जानवरों का ही है, लेकिन (चुटकी बजाते हुए) चालाकी पूरी है।

भई, जानवर भी दूसरे जानवरों से लड़ता है रोटी झपटने के लिए, इंसान भी दूसरे इंसान से लड़ेगा कुछ झपटने के लिए ही, मिसाइल चला देगा। वह मिसाइल कहाँ से आयी?

श्रोतागण: बुद्धि से आयी।

आचार्य: बुद्धि से आयी। दो जानवर लड़ रहे हैं – कोई वजह है, ज़मीन-जायदाद का झगड़ा हो सकता है, आदमी-औरत का झगड़ा हो सकता है, लेकिन देखो कोर्ट में वक़ील लोग कितने पैने तर्क दे रहे होते हैं। अधिकांशतः उनको भी पता होता है सब बात झूठी है, उनको भी पता है कि कुल मामला बिलकुल पशुवत है, लेकिन बुद्धि का पैनापन देखो! तर्कों की सूक्ष्मता देखो; चल रहा होता है कि नहीं? तो इसलिए आदमी की हालत बहुत ख़राब है, बहुत ज़्यादा ख़राब है।

जिस बुद्धि का उपयोग होना चाहिए था मुक्ति को पाने के लिए, हम उस बुद्धि का उपयोग करते हैं अपनी पशुता को अभिव्यक्ति देने के लिए। बुद्धि किसलिए है? ताकि आप मुक्ति की दिशा जा सकें! बुद्धि को साधन बनना चाहिए था कि आप मुक्त हो सकें, लेकिन बुद्धि साधन बन जाती है किसके हाथ में? अहंकार के हाथ में, पशुता के हाथ में। और फिर बुद्धि का उपयोग करके, दुरुपयोग करके हम पूरी दुनिया को ही तबाह कर देते हैं।

इस पूरी प्रक्रिया में उपेक्षित कौन रह जाता है? मुक्ति! मुक्ति उपेक्षित रह जाती है। मुक्ति जब उपेक्षित रह जाती है तो क्या होता है, यह होता है कि जो यह 'मैं' है यह बहुत तड़पता है, जितना तड़पता है यह उतनी बुद्धि लगाता है, और अपने लिए नयी-नयी चीज़ें तैयार करता है; जैसा कि हम आज के युग में देखते हैं – टेक्नोलॉजी , टेक्नोलॉजी, और नयी चीज़ें, और कंज़म्पशन , ‘और भोगो-भोगो-भोगो-भोगो’।

क्यों?

क्योंकि वह रो रहा है, बहुत परेशान है। वह जितना परेशान होता है, जितना वह व्याकुल है, जितना रो रहा है, वह उतना ज़्यादा भोगता है; उसको और, और चाहिए। उसकी असली भूख है मुक्ति की, उसकी जगह वह दुनिया को भोगने लग जाता है, क्योंकि केंद्र में तो पशु बैठा हुआ है, 'मैं'। वह जो पशु है वह मन को अशुद्ध करता है, वह पूरे जीवन को अशुद्ध कर देता है, उसी पशु ने यह पूरी पृथ्वी तबाह कर दी है।

तो आत्मा क्या है?

यही जो 'मैं' है, इसके पास एक तीसरी अद्भुत क्षमता है, वह क्षमता है ‘आत्म-अवलोकन’ की। 'मैं' की हमने दो विशिष्टताएँ क्या बतायीं थीं – मुक्ति की इच्छा और बुद्धि जो उसको साधन के रूप में उपलब्ध हैं। और अब हम तीसरी बात कह रहे हैं, इस 'मैं' के पास एक ऐसी विशिष्टता है जो जानवरों के पास नहीं है – आत्म-अवलोकन। यह रिफ़्लैक्ट कर सकता है, यह देख सकता है अपनी हालत को।

जानवर दुखी हो जाएगा, पर कभी समझ नहीं पाएगा वह दुखी क्यों है; मनुष्य के पास यह क्षमता है कि वह दुखी है तो यह भी जान पाए कि वह दुखी क्यों है। दुख का अनुभव जानवर और मनुष्य एक समान करते हैं; मनुष्य एक मात्र है जो दुख का कारण जान सकता है और फिर कारण जानकर दुख से मुक्ति का प्रयोजन कर सकता है। समझ में आ रही है बात?

तो आत्मा क्या है फिर? आत्मा तब है, जब 'मैं' अपनेआप को देखे और कहे कि ‘मैं ग़लत दिशा जा रहा हूँ, और ग़लत ही जीवन जी रहा हूँ, और सही होने का एक ही तरीका है, स्वयं को ही त्याग दूँ।' मन जब, 'मैं' जब स्वयं को ही पूरी तरह बदलने को तैयार हो जाए तो उस बदले हुए 'मैं' को ‘आत्मा’ कहते हैं। बदलाव लेकिन इतना पूरा होना चाहिए कि आप यह ही न कहो कि 'मैं' बदल गया, आप कहो, ‘'मैं' शून्य हो गया।‘

शून्य 'मैं' को आत्मा कहते हैं।

शून्य होने की प्रेरणा जिससे मिलती है वह है मुक्ति की आकांक्षा! वही कहती है, 'तुमको कुछ और चाहिए था, तुम कुछ और पाकर ग़लत फँसे हुए हो।' और शून्य होने की विधि, युक्ति, उपाय जो बताता है उसे कहते हैं बुद्धि।

मुक्ति से प्रेम होता है, बुद्धि से रास्ता मिलता है। 'मैं' को मुक्ति से प्रेम होता है और मुक्ति को पाने के लिए बुद्धि रास्ता बताती है; यही बुद्धि का सही इस्तेमाल है।

बुद्धि इसलिए नहीं है कि आप और-और-और चीज़ बना लें अपने मज़े के लिए; बुद्धि इसलिए है ताकि यह बुद्धि लगाएँ कि कैसे आज़ाद हो जाऊँ।

जैसे जेल में बंद एक क़ैदी हो, उसे बुद्धि किस दिशा में लगानी चाहिए?

श्रोतागण: मुक्ति के लिए।

आचार्य: कि कैसे जितने यहाँ सिपाही लोग हैं, इनको घूस देकर अपने लिए ज़्यादा लज़ीज़ खाना मँगवा लूँ? एक बुद्धि ऐसे भी लगा सकते हैं न कि ‘इधर आ, इधर आ, मैं तेरे लिए कुछ इंतज़ाम कर दूँगा, मेरे लिए खाना बढ़िया आना चाहिए'। और यह सब चलता है जेलों में। या 'मुझे बीच-बीच में फ़ोन दे दिया कर, मैं बाहर बात करूँगा', बुध्दि इसमें लगाएँ या बुद्धि इसमें लगाएँ कि कैसे यहाँ से जल्दी-से-जल्दी भाग निकलूँ या रिहा हो जाऊँ? बुद्धि इसमें लगानी चाहिए न?

तो बुद्धि का सही उपयोग एक ही है – सोचो-सोचो-सोचो, ख़ूब सोचो, ‘कैसे रिहा हो जाएँ? कैसे छूट निकलें?’ वह लेकिन बुद्धि तभी सोचेगी जब ‘मैं' पहले मानेगा कि वह बंधन में है, वह ग़लत फँसा हुआ है।

आत्मा 'मैं' की ही शुद्धता का नाम है। 'मैं' जब अशुद्ध होता है तो कह देते हैं अहंकार, और मैं जब शुद्ध होता है तो कह देते हैं आत्मा। कहने को आप ऐसे भी कह सकते हैं कि विशुद्ध अहंकार को आत्मा कहते हैं। अहंकार वह जो अपनेआप को अपूर्ण मानता है और दुनिया से जुड़ गया है, अपनी पहचान के लिए दुनिया पर आश्रित हो गया है। जैसे छोटा बच्चा पैदा हुआ है, उसने अपनी पहली पहचान किससे जोड़ ली? देह से – यह अहंकार है जो अपनी पहचान इधर-उधर पचास जगह जोड़कर बैठता है।

आत्मा – जब 'मैं' कहता है, ‘मुझे अपनी पहचान किसी से जोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं। जितना कुछ बाहर है जिससे मैं पहले जुड़ा हुआ था, अब मैं उसका साक्षी मात्र हूँ, मैं उससे लिप्त नहीं; मैं देख सबकुछ सकता हूँ और देखकर मैं मुस्कुरा भी सकता हूँ, देखकर आनंदित रहता हूँ, जो चल रहा है देख रहे हैं बिलकुल, लेकिन उससे जुड़कर उससे कुछ पाने की हसरत बची नहीं।‘ यह 'मैं' की शुद्धता है, इसको 'आत्मा' कहते हैं।

देखिए, अहम् माने भी क्या होता है? मैं! और आत्म माने भी क्या होता है?

श्रोतागण: मैं।

आचार्य: तो दोनों 'मैं' ही हैं! अहम् भी 'मैं' है और आत्मा भी 'मैं' है; बस अहम् वो जानवर वाला, और आत्मा जो मुक्त है। तो आत्मा आप ही जो ज़िंदगी जी रहे हैं उसकी शुद्धता का नाम है, इससे अधिक कुछ नहीं, बाकी सब कहानियाँ हैं। आप जो जीवन जी रहे हैं, आप जो पहचान पकड़े हुए हैं, भीतर का जो पूरा जगत चल रहा है, वही शुद्ध हो जाए तो आत्मा है; और इधर-उधर किसी किस्से-कहानी पर विचार की कोई ज़रूरत नहीं है।

अच्छा अब थोड़ा और आगे।

अहम् सीमित होता है क्योंकि वह सीमाओं से ही जुड़ा रहता है; सीमाओं से जुड़ने को जब त्याग देता है अहम् तो उसको कहते हैं असीम हो जाना। असीम! अब कोई सीमा नहीं है। बच्चा कह रहा है, 'मैं देह हूँ' तो सीमा है न! देह की तो सीमा होती है। यह बोरा है (अपने शरीर की ओर इंगित करते हुए), इसके बाहर जो कुछ है वो मैं नहीं हूँ, इसके भीतर जो कुछ है वह मैं हूँ। इससे (शरीर) जब तादात्म्य – तादात्म्य माने आईडेंटिफ़िकेशन – इससे जब तादात्म्य हटाया तो अब कोई सीमा वाली चीज़ तो है नहीं जिससे हम जुड़ते हैं, तो फिर कह देते हैं कि असीम; आत्मा को फिर कह दिया असीम है। इसीलिए फिर आत्मा को कह देते हैं 'अनंत' है।

अच्छा अहम् जिन चीज़ों से जुड़ता है वह सब भौतिक ही होती हैं दुनिया की, है न? और दुनिया की जितनी चीज़ें हैं उनको तो आप आँख से, बुद्धि से जान ही लेते हो, लेकिन एक बार दुनिया की चीज़ों से जुड़ना छोड़ दिया तो अहम् में ऐसा कुछ नहीं बचता जिसे जाना जा सके, तो फिर हम कहते हैं, 'आत्मा अज्ञेय है।'

क्योंकि जो कुछ ज्ञात हो सकता है वह सीमित ही होता है, और सीमित से हमारा पेट भरता ही नहीं। इतनी तो सीमित चीज़ें पकड़कर देख लीं पूरी ज़िंदगी – रुपया पकड़ा, प्रतिष्ठा पकड़ी, रिश्ते पकड़े, घर, गाड़ी यह सब पकड़ा; यह सब सीमित चीज़ें होती हैं, और सीमित चीज़ों से पेट हमारा भरता ही नहीं। हमारी बनावट कुछ ऐसी है कि हमारी भूख को तो अनंत ही शांत कर पाता है।

तो जो कुछ भी छोटा था, जिसको पकड़े थे, वह काम का नहीं निकला; पाप नहीं है छोटे को पकड़ना, बस अनुपयोगी है। शायद यही पाप की परिभाषा भी है फिर, 'जो अनुपयोगी है उसमें पड़े रहना ही पाप है' (आचार्य जी की हल्की हँसी); द अन्नेसेसरी इज़ सिन।

छोटी चीज़ को पकड़े थे, वह काम तो आ नहीं रही थी। जैसे हाथी को किसी छोटे बच्चे की टोपी पहनाई हो और भेज दिया हो कि जाओ धूप में जाओ, अब इससे तुम्हें कुछ होगा नहीं, या बारिश बढ़िया है ये लो टोपी पहन लो, हाथी को टोपी; वो पाप है क्योंकि अनुपयोगी है, ये ही पाप की परिभाषा है। और पुण्य की परिभाषा भी फिर जान गए आप? उपयोगी। किस दृष्टि से उपयोगी? 'मुक्ति की दृष्टि से जो कुछ उपयोगी है उसका नाम पुण्य है, मुक्ति की दृष्टि से जो कुछ अनुपयोगी है वही पाप है।'

आप अगर जीवन में कुछ भी ऐसा कर रहे हैं जो आपको मुक्ति की ओर नहीं ले जा रहा तो आप पापी हो गए; उस क्षण पापी हो गए फिर अगले क्षण पुण्यात्मा भी हो सकते हैं।

समझ में आ रही है बात?

तो आत्मा को फिर हम कहते हैं अचल है, क्योंकि अहंकार जिन चीज़ों से जुड़ता था वह सब चलायमान थीं, आती थीं, जाती थीं, छोटी थीं, जो छोटी चीज़ होगी वही तो चलेगी। आत्मा अचल है, आत्मा अगम है, आत्मा अगोचर है, आत्मा निर्गुण है, आत्मा निराकार, आत्मा अनिकेत है – यह सब देख रहे हैं नकार में हैं।

किसको नकारा जा रहा है? उन सबको नकारा जा रहा है जिनसे जुड़ने की हमारी आदत है। ऋषि हमसे कह रहे हैं, 'जिनसे तुमने आदत जोड़ रखी है वही बर्बाद कर रहे हैं तुमको। तुम्हारा दुर्भाग्य वही सबकुछ है जो तुम्हारी आदत है।'

तो हमारी आदतों को पूरे लंबे-चौड़े तरीके से एक-एक करके सूचीबद्ध कर दिया उन्होंने। कहते हैं, 'तुम्हारा घर तुम्हारी आदत है', तो आत्मा अनिकेत है; अनिकेत माने जिसका कोई निकेतन नहीं, माने जिसका कोई घर नहीं। अब आपकी अपनी जो भी आदत बताइए उसका उल्टा शब्द 'आत्मा' के लिए इस्तेमाल होता है।

आप अपने हर धंधे को, अपनी हर आदत को, अपनी हर लिप्तता को देखिएगा, और आप पाएँगे कि वेदान्त में उससे उल्टा शब्द प्रयुक्त हुआ है आत्मा के वर्णन के लिए; यह कोई संयोग भर तो नहीं है न, यह संयोग है?

आप बिना दूसरे के रह नहीं पाते, कोई होना चाहिए, कोई नहीं मिलता तो फ़ोन उठाकर बात कर ली। कहीं जाते भी हैं तो देखते हैं भीड़ कितनी है – 'हाँ बढ़िया! यहाँ लोग हैं।' आप यहाँ पर आएँ और पाएँ कि यहाँ पर मैं हूँ और आप हैं, तो आप भी नहीं बचेंगे; जो भागेंगे ज़ोर से! जब अंदर आते हैं, देखते हैं – 'अच्छा ठीक है, भरा है, पर्याप्त है, चलो अब ठीक है। हम अकेले नहीं बुद्धू बन रहे।'

(श्रोतागण हँसते हैं)

तो आत्मा को कहते हैं, ‘असंग है!’ आप संग के बिना जी नहीं सकते और आत्मा असंग है।

हम विकार के ही पुतले हैं ऊपर से नीचे तक। विकार माने दोष, दोष माने जो गुण का दूसरा नाम है, माने प्रकृति। हम पूरे प्रकृति से ही आबद्ध रहते हैं, तो आत्मा को कह देते हैं, 'निर्विकार है'। क्योंकि हम प्रकृति में ही जीते हैं, गर्भ से ही जो एक प्रकृति का छोटा-सा गुटका है वह पैदा होता है, हम प्रकृति में जीते हैं।

और शांति तब तक नहीं मिलेगी जब तक प्रकृति में जो कुछ है उसके आगे नहीं निकल जाते; तो आत्मा को कह देते हैं – 'निर्विकार है, निर्गुण है, निर्दोष है।' यह तीनों एक ही शब्द हैं – निर्विकार, निर्गुण, निर्दोष। हम कल्पनाओं में जीते हैं तो आत्मा को कह देते हैं, 'वह कल्पनातीत है।' हम विचारों में जीते हैं, तो आत्मा को कह देते हैं, 'वो निर्विचार है।'

आप जो कुछ करते हैं उसको काटा ही जाता है जब आत्मा की बात होती है; उसी आत्मा के लिए एक शब्द है 'शिव' भी। इसीलिए जब ‘निर्वाण षट्कम’ पढ़ेंगे आचार्य शंकर का, तो वो पूरा नकार में है – 'मैं यह भी नहीं हूँ, मैं यह भी नहीं हूँ'। जो कुछ आप हैं वो सब कह देते हैं, 'मैं यह नहीं हूँ; न मैं पुरुष हूँ, न मैं स्त्री हूँ', तो मैं कौन हूँ? 'शिवोहम्।'

आप जो कुछ हैं वही आपका बंधन, वही बोझ है, वही नर्क है। तो वह सब हटाना ज़रूरी है, फिर आप जो रह जाते हैं उसको कहते हैं, ‘शिवोहम्!’ वही आत्मा है, आत्मा ही शिव है। शिव माने वह सब नहीं जो आप सड़कों पर देखते हैं, अभद्रता, वह जो सब नाच-गाना, और यह चल रहा होता है आमतौर पर भाँग-धतूरे के साथ और वह सब; उसका शिव से कोई सम्बन्ध नहीं। जो कुछ भी आपका है उसको हटा दीजिए, फिर जो बचा वो शिव; वही आत्मा।

समझ में आ रही है बात?

और बताइए और क्या है आपका, हमने क्या-क्या (समझा)? भाव, विचार, लिंग, सीमाएँ, बंधन; 'निर्बंध'! आप बंधन में हैं, आत्मा के लिए शब्द है, ‘निर्बंध’।

श्रोतागण: मोह।

आचार्य: हाँ, मोह! वो (आत्मा) 'निर्मोह'। कृष्ण अर्जुन को बार-बार बोलते हैं, ‘निर्मोह, निर्मोह।‘ आप ममता, उधर 'निर्ममता'! यह विचित्र बात लग रही होगी, आत्मा के लिए शब्द 'निर्मम'। जिसको मम् से कोई लेना-देना नहीं सो निर्मम, सो आत्मा। और निर्मम होना हमारी भाषा में एक ग्लानि सूचक शब्द है; जब आपको किसी को उलाहना देनी होती है तो कहते हैं, 'निर्मम कहीं का।' आत्मा निर्मम है।

और, और हमारी दुनिया में क्या होता है?

श्रोतागण: जन्म।

आचार्य: जन्म, बहुत बढ़िया! तो आत्मा को कहते हैं, 'अजात'। आत्मा का कोई जन्म नहीं है। जन्म के साथ हमारी क्या होती है? मृत्यु! तो आत्मा को कहते हैं, ‘अमर!’ वो 'अजात' भी है, वो 'अमर' भी है; न उसका जन्म होता है न उसकी मृत्यु होती है, न सोच सकते हो उसको, न उसको अनुभव कर सकते हो, वह सब अनुभवों के अतीत है, अनुभव का कोई लेना-देना नहीं उससे। हमारी दुनिया में क्या है लगातार? अनुभव! चूँकि हम अनुभवों में जीते हैं, आत्मा ऐसी है जिसका कोई अनुभव नहीं होता। कोई आपको मिले और कहे, 'मैंने आत्मा का अनुभव करा', झूठा आदमी! या तो उसको भगा दीजिए या आप भाग जाइए।

आपकी दुनिया में जो कुछ है, आप उसको देखते रहते हो, तो फिर आत्मा को कह देते हैं, 'अगोचर' या 'अदृशय'। समझ में आ रही बात? आपकी दुनिया में लगातार लिप्तता है, कुछ ऐसा है ही नहीं जिससे आपका वास्ता हो लेकिन स्वार्थ नहीं हो; तो आत्मा को कह देते हैं साक्षी। आत्मा किसी भी चीज़ में लिप्त नहीं है, इंगेज्ड नहीं है, पार्टिसिपेंट नहीं है; वह क्या है? साक्षी है, विटनेस है। उसे कुछ लेना-देना नहीं, और हम लेन-देन के बिना कुछ करते नहीं। ऐसे ही हमारी दुनिया में डर है, तो आत्मा को क्या बोलते हैं? 'अभीत'। अभीत माने? डर का कोई काम ही नहीं उधर; आत्मा अभीत है।

और क्या है हमारी दुनिया में? बोलते चलिए; बहुत संभावना है कि ऋषियों ने पहले ही उसके लिए एक शब्द तैयार रखा है क्योंकि आपकी दुनिया में जो कुछ है वह आज से थोड़े ही है, वह तभी से है। आप आज जो कुछ भी अनुभव कर रहे हैं, ऋषियों ने पहले ही देखा हुआ है, तो उन्होंने वह पहले बता रखा है कि आत्मा क्या है। वो आत्मा को नहीं बता रहे, वो आपको काट रहे हैं; क्योंकि आत्मा तो वास्तव में है ही नहीं।

जिसको हम कहते हैं, जिस भाव में हम कहते हैं कि कुछ है, यह है (प्याला दर्शाते हुए), यह मग है ऐसे ही, तो कहेंगे, ‘यह मग है’, इस भाव में आत्मा है ही नहीं। आत्मा कोई भौतिक वस्तु थोड़े ही है कि इधर-उधर उड़ रही है, एक गर्भ से दूसरे गर्भ में जा रही है; कि किसी के भीतर घुस जा रही है वह भी विशेष दिनों में, आत्मा का इन सब मूर्खताओं से कुछ लेना-देना नहीं। आपकी ही परम-शुद्धता को आत्मा कहते हैं, आपकी ही परम-मुक्ति को आत्मा कहते हैं। और आत्मा वह जिस पर किसी का कोई असर नहीं होता। तो इस तरह की बातें भी कि आत्मा पर कर्मों की कालिख लग गई है, आत्मा पर कर्मों का प्रभाव पड़ता है – बिलकुल बेकार की बात है; कर्मों का प्रभाव किस पर पड़ता है?

श्रोतागण: मन पर।

आचार्य: मन पर पड़ता है, आत्मा पर नहीं पड़ता है। कोई आपसे बोले, 'आत्मा गंदी हो गई', तो आदमी गंदा है।

आत्मा वो है जो सब गंदगी के बीच भी सदैव निर्मल रहती है। यह शब्द है आत्मा के लिए – 'अक्षुण्य-निर्मलता।' सब कुछ मलिन हो सकता है, आत्मा फिर भी निर्मल रहती है; मन मलिन, आत्मा – ‘निर्मल’।

और यही हमारे लिए कितनी उम्मीद की बात है न, हमारा सबकुछ छिन गया हो, आत्मा तब भी निर्मल होती है। हम कितने बड़े पापी हों, कितने ढोंगी हों, कितने हमने जीवन में अपराध करे हों, कितना हमने अपना समय व्यर्थ करा हो, लेकिन फिर भी आत्मा की निर्मलता कम-से-कम एक संभावना के रूप में हममें मौजूद है।

वेदान्त आपको एक बड़ी शक्ति देता है, वह कहता है, 'कुछ नहीं बिगड़ा, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा; उठो, खड़े हो जाओ!' आत्मा उपलब्ध है; पाना है या नहीं पाना है चुनाव तुम्हारा है।

और क्या होता है हमारे जीवन में बोलिए?

श्रोतागण: हार-जीत।

आचार्य: हार-जीत होती रहती है तो आत्मा को कह देते हैं कि ‘आत्मा सदैव अविजित है', अविजीत! उसे कोई जीत नहीं सकता। तुम उसे जीतोगे क्या, तुम उसे जान ही नहीं सकते, वो 'अगम्य' है; जिसको जान नहीं सकते उसको जीत सकते हो क्या? देखिए कितनी मज़ेदार बात निकल रही न, आपके जीवन में जो चल रहा है उसका उल्टा शब्द आत्मा के लिए पहले से ही मौजूद है। (आचार्य जी मुस्कुराते हैं)

और बताइए और क्या है जीवन में?

श्रोतागण: जानना।

आचार्य: जानना, वो बात हमने करी, 'आत्मा अज्ञेय है।' और?

श्रोतागण: काल।

आचार्य: हम काल में हैं, तो आत्मा के लिए कितना सुंदर शब्द है – 'अकाल'। और सिक्खों ने फिर इसीलिए परमात्मा को क्या बोला दिया? 'अकाल पुरुष!' अकाल, वो कालातीत है, वह काल के प्रवाह से बाहर है। अब काल के प्रवाह से बाहर है, आप उसकी कल्पना नहीं कर सकते।

तो उद्देश्य क्या था आत्मा को यह नाम देने का जिसको कभी कोई नाम दिया ही नहीं जा सकता? नाम तो हमारी दुनिया में होते हैं, आत्मा के इतने नाम कहाँ से आ गए? फिर भी ऋषियों ने नाम दिए, निर्गुण के गुण गाए, क्यों उन्होंने इतने नाम दिए? ताकि हम यह समझ पाएँ कि हमारी दुनिया में हमने जो चक्र चला रखा है वह हमारे लिए ही बहुत घातक है; ताकि हम जिन चीज़ों को पकड़कर बैठे हैं हम उन चीज़ों को छोड़ पाएँ।

कुछ समझ में आ रही है बात ये?

और क्या है हमारे जीवन में?

श्रोतागण: अंजन।

आचार्य: अब वो निरंजन पहले पकड़ा, वहाँ से रिवर्स इंजीनियरिंग कर रहे हैं ये। (आचार्य जी मुस्कुराते हैं)

श्रोतागण: कामना, कामवासना।

आचार्य: हाँ ठीक है। तो 'आत्मा वह जो निष्काम है, आत्मा वह जो निरंजन है।' रंजन मने दाग-धब्बा, हमारे जीवन में सब रंजन-ही-रंजन है न, जितनी रंजनाएँ हैं – धब्बे-ही-धब्बे, कालिख़-ही-कालिख़; यहाँ धब्बा लगा है, यहाँ धब्बा लगा है (अपने शरीर की ओर इंगित करते हुए)। हम तो मन पर जब धब्बा लगाते हैं तो बड़े प्रसन्न हो जाते हैं, कहते हैं, ‘मनोरंजन है!’ और आत्मा 'निरंजन' है।

आम-आदमी में और होशियार आदमी में यही अंतर है – आम-आदमी करता है 'मनोरंजन', और उधर क्या होता है? 'निरंजन'। आपकी ज़िंदगी में लगातार लक्ष्य-ही-लक्ष्य हैं, गोल्स, टारगेट्स , और आत्मा 'अलक्ष्य’ है, अलक्ष्य। इसीलिए जोगी लोग जब घूमते थे तो बोलते थे, 'अलख निरंजन।'

अलख माने? अलक्ष्य, उसे लखा नहीं जा सकता। 'ज्यों मेहंदी के पात में लाली लखि न जाए'। उसे लखा नहीं जा सकता! और हम तो लक्ष्यों को ही पकड़े रहते हैं। तो ऋषि आत्मा को अलक्ष्य बोलकर आपको क्या संदेश दे रहे हैं? 'तुम बेकार के लक्ष्य पकड़े बैठे हो! तुम न जाने किस दौड़ में ज़िंदगी बर्बाद कर रहे हो, तुम्हारे सब लक्ष्य फूहड़ हैं, क्योंकि वो... ज़ल्दी-ज़ल्दी पूरा करिए (श्रोताओं से पूछते हुए), क्योंकि वो तुम्हारे लक्ष्य हैं! फ़ॉर हूम ? किसके लक्ष्य हैं, तुम्हारे लक्ष्य हैं न इसीलिए ग़लत ही होंगे।

ऐसे जैसे कोई आपके पास आए और बोले, 'बहुत बढ़िया चीज़ लाया हूँ', पूछो, ‘किसने चुनी?’ बोले, 'मैंने'। बोलो, 'ख़राब ही होगी।'

(श्रोतागण हँसते हैं)

ऋषियों का यह तेवर है। बोले, 'जो कुछ भी तुम्हारा है बर्बाद ही होगा।' लक्ष्य किसने चुना?

श्रोतागण: मैंने।

आचार्य: 'तो बेकार ही होगा।' हम जानना भी नहीं चाहते हैं क्या लक्ष्य है, तुम्हारा है इसलिए ख़राब है, क्योंकि तुम ही?

श्रोतागण: ख़राब हो।

आचार्य: किसके लिए? किसके लिए? (ज़ोर देकर पूछते हैं)

श्रोतागण: अपने लिए।

आचार्य: अपने ही लिए। तुम अपने ही लिए ख़राब हो बाबा! ऋषियों का कुछ नहीं बिगड़ रहा, तुम अपने ही लिए ख़राब हो। तुम अपने ही लिए ख़राब हो तो तुम्हारे सारे लक्ष्य भी ख़राब हैं, तो आत्मा अलक्ष्य है।

और क्या रहता है हमारी दुनिया में?

श्रोतागण: स्पेस (आकाश)।

आचार्य: स्पेस , बहुत बढ़िया! तो आत्मा को कहते हैं, 'आकाशवत' है। आप जब स्पेस बोलते हैं न, तो वह दो वस्तुओं की दूरियों को इंगित करता है बस; आत्मा को कहते हैं, 'आकाशवत है, अनंत आकाश है वह', वह फिर ऐसा नहीं है कि उसका फिर कहीं अंत हो। हम जब स्पेस बोलते हैं तो वह एक लिमिटेड स्पेस की ही बात करते हैं; अनंत कुछ नहीं होता हमारे जीवन में।

और क्या?

श्रोतागण: खंड।

आचार्य: खंड, हाँ तो 'अखंड' है। हाँ, तो आत्मा को कहते हैं, ‘निर्वैर है’। और इतना ही नहीं, उसके लिए यहाँ से है (दिमाग पर ज़ोर देते हुए), गुरु तेग बहादुर साहब का है – 'निर्भय-निर्वैरु'! हमारी ज़िंदगी में भय है, वहाँ भय भी नहीं है; और हमारी ज़िंदगी में वैर है, वहाँ वैर भी नहीं है; तो इन दो का जोड़ा बना करके बोलते हैं, 'निर्भय-निर्वैरु।‘

श्रोतागण: आचार्य जी, डेथ के लिए?

आचार्य: डेथ? 'अजात', 'अमर', 'अजर'। आपकी ज़िंदगी में बुढ़ापा भी है, वहाँ बुढ़ापा भी नहीं आता तो कहते हैं, 'अजर'! वो अजर है।

प्र: 'रेस्ट इन पीस' की अवधारणा क्या है?

आचार्य: कुछ भी नहीं है, यह मूर्खता की बात है, 'भगवान उनकी आत्मा को शांति दे!' एकदम मूर्खता की बात है यह। मे हिज़... , ये आरआइपी जो चलता है, ये एकदम अनपढ़ होने की निशानी है। लेट्स ए आरआइपी टू आरआइपी।

(श्रोतागण हँसते हैं)

कुछ नहीं, यह सब बिलकुल... हमारी जो आम संस्कृति है, इसका धर्म से कहाँ कोई सम्बन्ध है। बस हम संस्कृति की डुगडुगी बजाते रहते हैं और अब हमें लगने लग गया है कि संस्कृति ही धर्म है; खासतौर पर आजकल जो चल रहा है, सब सांस्कृतिक-सांस्कृतिक-सांस्कृतिक-सांस्कृतिक।

और सांस्कृतिक यही चल रहा है, 'भगवान उनकी आत्मा को शांति दे! या मैं तुमसे आत्मा से प्रेम करता हूँ।' आत्मा नहीं प्रेम करती, आत्मा से प्रेम किया जाता है; मन प्रेम करेगा, किससे? आत्मा से। आत्मा नहीं प्रेम करती, आत्मा तो युक्त है, युक्त माने जिसका योग हो गया उसे आत्मा कहते हैं; अब वह किससे प्रेम करेगी? आत्मा तो प्रेम भी नहीं कर सकती। मन प्रेम कर सकता है, मन को प्रेम करना भी चाहिए।

समझ में कुछ आ रही है बात?

एक बात और, आत्मा सोल नहीं है। मतलब करबद्ध निवेदन कर रहा हूँ, आत्मा सोल नहीं होती; सोल पता नहीं क्या है, सोल यूँ ही है, सोल। तो सोल तो बस मन का एक कॉन्सेप्ट है, एक सिद्धांत है, सोल कुछ नहीं होता। आत्मा मन की प्यास है, आत्मा मन का अंत है, और सोल, वो मन का एक सिद्धांत मात्र है, मन की एक कल्पना है, मन में कुछ कह दिया, मन की सामग्री मात्र है 'सोल।'

श्रोतागण: जैसे 'धर्म' 'रिलीजन' नहीं होता।

आचार्य: हाँ, जैसे 'धर्म' रिलीजन नहीं होता; और जैसे संस्कृति धर्म नहीं होती। स्पष्ट हो रहा है बिलकुल? एक और चीज़ – हमारी यह जो पूरी दुनिया है, यह इन दो पर चलती है – तू दिखा, मैंने देखा; दृष्टा और दृश्य, इसे कहते हैं 'द्वैत'! है न? और ये दो ज़रूरी हैं ताकि मैं उसको भोग सकूँ। अनुभव तभी तो हो पाएगा जब सामने कुछ नज़र आएगा, तो यह दूई, यह द्वैत, यह डुअलिटी चलती रहती है; तो आत्मा के लिए शब्द है फिर 'अद्वैत'।

अब अद्वैत अपनेआप में कुछ नहीं होता, वह बस एक नकार का प्रतीक है; पर द्वैत को नकारना बहुत ज़रूरी है; क्योंकि द्वैत को नहीं नकारोगे तो क्या होगा? एक ही नुक़सान हो सकता है, क्या? दुख में रहोगे।

पूरा वेदान्त बस एक चुनौती से लड़ रहा है – दुख! और कोई वजह नहीं है, स्वर्ग नहीं चाहिए। वेदान्त का लक्ष्य स्वर्ग प्राप्ति वगैरह कुछ भी नहीं है, एक ही लक्ष्य है – 'दुख से मुक्ति'। ऋषि किस चुनौती से जूझ रहे हैं? सफ़रिंग (पीड़ा), द सॉरो ऑफ़ मैनकाइंड (मानव जाति का दुख)। सिर्फ़ एक है! बाकी सब बातें नहीं कि यह करो वह करो, उसका प्रचार, यह सब नहीं करना है। लोग दुखी हैं, और यही आध्यात्म का एकमात्र लक्ष्य होता है – दुख को हटाना। और नहीं कोई लक्ष्य होता है। द्वैत में दुख है, द्वैत को हटाना है, तो आत्मा के लिए नाम है 'अद्वैत'।

प्र२: सर, आत्मा शब्द का परिचय ही बहुत ग़लत तरीके से हुआ। उदाहरण के तौर पर, जब मैं कक्षा छठवीं-सातवीं में था, तब से लेकर हाल-फिलहाल डेढ़-दो साल पहले तक मेरे घर में ऐसा माहौल रहा कि दादी जी के शरीर में मेरे दादा जी की आत्मा आती थी। इस सभा में यह बात हास्य की हो सकती है क्योंकि हम आपके माध्यम से यह समझ चुके हैं; पर घर में जो माहौल बनता था वह बहुत गंभीर हो जाता था।

मैं संस्था के लिए आउटरीच का काम करता हूँ, तो राजस्थान, मध्य प्रदेश इन क्षेत्रों के युवाओं से बात करता हूँ तो वह भी इस तरह की बात का ज़िक्र करते हैं कि घर की जो वृद्ध महिलाएँ हैं उनमें दिवंगत उनके जो पति होते हैं उनकी आत्माएँ आती हैं।

मैंने अपनी आँखों से ख़ुद देखा कि जो दादी बहुत कमज़ोर, लगभग पचास के आसपास उनका वज़न होगा, वह बहुत भारी-भारी वस्तुओं को उठा लेती थीं, उनकी जो पूरी बॉडी लैंग्वेज है वह चेंज हो जाती थी।

तो अब हम समझ रहे हैं कि आत्मा वह नहीं है, ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन वह जो पूरा अनुभव है और उसकी जो गंभीरता है और उसका जो मन पर छा जाना और एक बच्चे के जीवन में ऐसे अनुभव के थ्रू आत्मा शब्द का इंट्रोडक्शन होना, इस पर आप प्लीज़ कुछ स्पष्टता दीजिए।

आचार्य: नहीं, अभाग है, और क्या! जो ऊँचे-से-ऊँचा शब्द है, जो शब्द आविष्कृत ही इसलिए किया गया कि आप सब तरीके के भ्रमों से मुक्त हो सकें, हमने उसी शब्द को भ्रम की भेंट चढ़ा दिया; इससे बड़ा आभार क्या होगा। और क्या बोलूँ मैं इसमें? देखो, सुनो! यह जो वज़न उठाने वगैरह की बात है, या जो कह देते हैं कि 'फ़लाने पर आत्मा आ गई है, कमज़ोर था फिर भी तीन घंटे नाच गया', तुम कितना उठाते हो कितना नहीं उठाते हो यह बहुत हद तक तुम्हारे 'संकल्प' पर निर्भर करता है।

आपने ख़ुद भी जिमिंग करी होगी और कभी ट्रेनर के साथ भी करी होगी, आप जितना करते हो और करके कहते हो कि इससे ज़्यादा तो मुझसे हो ही नहीं सकता, ट्रेनर आकर उससे तीन गुना करवा देता है; मतलब? आप तीन गुना कर सकते थे, न करना आपका चुनाव था; यही आप चुन लो तो आप कर जाओगे।

तो आमतौर पर कोई आदमी दो किलो वज़न उठाता हो, वो छः किलो वजन उठाता दिखे तो ये कोई चमत्कार नहीं हो गया, यह चुनाव हो गया है; उस व्यक्ति का चुनाव है। यह एक मेंटल फ़िनॉमिना है बस, और कुछ भी नहीं। इसमें कुछ भी मिस्टिकल नहीं है, यह पूरी तरह मेंटल है, मानसिक है।

आमतौर पर जिन लोगों ने – मुझे क्षमा करिए, आहत करने का मेरा किसी को कोई इरादा नहीं है, फिर भी मैं देखता हूँ आहत हो ही जाते हैं मुझसे लोग, पहले से ही क्षमा – आमतौर पर जिन लोगों ने एक बड़ा दमित जीवन जिया होता है, स्प्रेसड ! उनकी जीवन ऊर्जा अभिव्यक्ति माँगती है। तो उनको जब साल में दो-चार इस तरह के मौके मिलते हैं जिनका सम्बन्ध देवी के चढ़ने-उतरने या आत्मा के आने-जाने से होता है, या वो किसी खास जगह पर चले जाते हैं, तो उनको, उनकी सबकॉन्शियस को मौका मिल जाता है अपनी उर्जा को अभिव्यक्त करने का। तो इसीलिए आमतौर पर यह घटनाएँ महिलाओं के साथ ज़्यादा होती हैं, और महिलाएँ भी वह जो कि छोटे शहरों, गॉंवों या कस्बों से आ रही हों, और जो ज़्यादा शिक्षित वगैरह न हों, ग़ौर करिएगा उन्हीं के साथ यह सब ज़्यादा होता है, क्योंकि उनकी पूरी ज़िंदगी ही सप्रेशन में बीती होती है। और भीतर ऊर्जा तो है ही न, जिसको आप कहते हो साधारण जिजीविषा, साधारण लिबिडनेस एनर्जी , वह तो है ही न, सब में होती है, महिला में भी होती है, पुरुष में भी होती है। वह अभिव्यक्ति कैसे पाए? कैसे पाए?

यही होता है फिर कि मौका मिला है अब... उदाहरण के लिए सब पशु नाचते हैं, आपको कोई पशु नहीं मिलेगा जो अपने-अपने तरीके से नाचता न हो, अपने-अपने तरीके से। सिर्फ़ मोर ही नहीं नाचता, एक-एक पक्षी नाचता है; चूहे भी नाचते हैं, आपको पता है हाथी तक नाचते हैं, हाथी तक नाचते हैं। (हाथी वाली बात पर ज़ोर देकर उसे दोहराते हैं।)

अपने घर की महिलाओं को आप नाचने तो दोगे नहीं क्योंकि संस्कारी घर है तो वह कैसे नाचें? वह ऐसे नाचतीं हैं फिर। अब मैं यह कह रहा हूँ और मुझे दिखाई दे रहा है कि बड़े इल्ज़ाम लगेंगे। कह रहे, 'अरे देवी चढ़ी थीं और तुमने साधारण नाच बना दिया, विधर्मी! तुझे आचार्य किसने बना दिया!' ठीक है, तुम्हें जो कहना है कह लो, पर मेरी निष्ठा सच्चाई के प्रति है, समाज के प्रति नहीं।

तो उसको नाचना है, वह बेचारी कैसे नाचे? इतना ही नहीं, तुमने उसको घर में कभी सम्मान नहीं दिया, लेकिन जिस क्षण उसमें आत्मा उतर जाती है उसको बहुत सम्मान मिलने लगता है। वह सम्मान कैसे पाए? एक ही तरीका है, क्या? ‘आत्मा उतरेगी सब मेरी इज़्ज़त करेंगे।‘ उसे कोई गंभीरता से ही नहीं लेता था, बूढ़ी दादी को कौन लेगा गंभीरता से? चल-फिर नहीं सकती, पीठ दोहरी हो गई है, कुबड़ निकल आया है, कोई पूछता नहीं है, पढ़ी-लिखी नहीं है, पैसा नहीं उसके पास, दादा जी दिवंगत हैं, कौन पूछता है ऐसी दादी को? लेकिन जिस दिन उसमें दादाजी उतर आते हैं उसकी बड़ी पूछ हो जाती है, और सम्मान तो अहंकार को चाहिए ही! सम्मान का इससे अतिरिक्त और कोई तरीका हो तो बता दो, उसको बड़ा सम्मान मिल जाता है उस दिन।

यही कारण है कि जिन जगहों पर तथाकथित निचली जातियों का बहुत शोषण हुआ, वहाँ पर आप एक बड़ी खास परंपरा पाते हैं, वहाँ पर देवी-देवता या दैव इत्यादि उतरते हैं। और जानते हैं आमतौर पर किस पर उतरते हैं? इन्हीं तथाकथित निचली जातियों और जनजातियों पर उतरते हैं, ब्राह्मणों पर नहीं उतरते कभी। ब्राह्मणों, क्षत्रियों पर यह सब नहीं उतरते भूत-प्रेत, देवी-देवता, दैव, यह सब नहीं उतरते उनपर। किन पर उतरते हैं? जो शोषित जातियाँ होती हैं उन पर उतरते हैं, और जिस दिन उन पर उतरते हैं उस दिन के लिए उनको सम्मान मिल जाता है।

यह जो आपके भीतर सम्मान की प्यास है, उसको बुझाने का एक तरीका है सामाजिक! एक तरीके का यह कुटिल षड्यंत्र है। किसी को तुम बिलकुल सम्मान नहीं दोगे तो विद्रोह कर देगा, विद्रोह कर देगा तो क्रांति हो जाएगी। भारत में कभी कोई क्रांति नहीं हुई क्योंकि भारत के पास क्रांति को पहले ही डिफ्यूज़ कर देने के बड़े तरीके रहे हैं, यह उन तरीकों में से एक हैं।

महिला को बिलकुल ही नहीं नाचने दोगे तो क्रांति कर देगी। कहे, 'नाचने देंगे तुझे, तेरे भी एक-दो दिन आएँगे साल में जब, नाचने देंगे।' वह एक-दो दिन कौन से होते हैं? घर में शादी-ब्याह हो जाए तो नाचने देंगे तुझे, नहीं तो जब तुझमें देवी-देवता उतरेंगे तब तू नाच ले। तब तू कैसे भी नाच सकती है – पूरे बाल-वाल खोलकर, कपड़े लत्ते की सुध नहीं, साड़ी इधर जा रही है, पल्लू उधर जा रहा है, ब्लाउज़ उधर जा रहा है लेकिन आज तो तू पूजनीय है, क्योंकि (तुझमें देवी-देवता उतरे हैं), यही वह बोल दे, 'नहीं मुझे तो डिस्को-थीक जाकर के नाचना है', तुम कह दोगे, 'कुलटा!'

तो वह अपना काम फिर ऐसे निकालती है, बोले, ‘ठीक है...‘ मैं बिलकुल देख रहा हूँ कि जो लोग मेरी बात को नहीं समझना चाहते हैं उन्हें बहुत बुरा लग रहा होगा इस वक़्त; लेकिन अब नहीं समझना तो मत समझो।

यह सब मेंटल फ़िनॉमिना (मानसिक घटना) हैं, इनका आत्मा से क्या लेना-देना है। आत्मा क्या है वह तो समझा ही दिया बाबा अभी! किसी को बहुत दबा कर रखोगे न तो कहीं-न-कहीं से तो उसकी चेतना फूटेगी न; तो इन तरीकों से फूटा करती है।

जो जगहें प्रसिद्ध हैं कि वहाँ जाकर के लोगों को (भूत चढ़ने का अभिनय करते हुए) शुरू हो जाता है, वहाँ देखना वो कौनसे लोग हैं जिनको ये शुरू हो जाता है। देखना वह कौनसे लोग हैं।

वो सब वही लोग है जो आप पाओगे ज़्यादातर इंट्रोवर्ट हैं और सप्रेस्ड हैं। और या तो महिलाओं से आते हैं, या दलितों से आते हैं, महिलाओं और दलितों में साझी बात क्या है? यह दोनों दमन के शिकार हैं। तो यह दमन के विरुद्ध एक तरह की प्रछन्न व्यवस्था है। अगर आप एक प्रछन्न क्रांति, माने आप एक इनडाइरेक्ट रिवॉल्यूशन नहीं होने दोगे तो रियल रिवॉल्यूशन हो जाएगा।

अब समझ में आ रहा है?

फ़्रांसिसी क्रांति हुई, रूसी क्रांति हुई, भारत में कभी कोई क्रांति क्यों नहीं हुई? मैं नहीं कह रहा कि यही एकमात्र कारण है। हमने बहुविध कारण इजाद कर रखे हैं कि आम-आदमी के भीतर जो आक्रोश और असंतोष है उसको किसी-न-किसी तरीके से डिफ्यूज़ कर दो, लीक कर दो; प्रेशर-कुकर में सीटी डाल दो तो उसका जो तनाव है, जो दबाव है वह कम हो जाए। अगर हम उस दबाव को बढ़ने देते तो क्रांति हो गई होती, विस्फोट हो गया होता। और जितनी हमारी व्यर्थताएँ हैं संस्कृति के नाम पर, अब तक हम उनसे मुक्त हो गए होते, हमने नहीं होने दिया।

अब इंटरनेट का और टेक्नोलॉजी का युग है तो अब उन चीज़ों को टेक्नोलॉजी के माध्यम से भी बढ़ावा मिल रहा है। अब स्क्रीन पर दिखाया जा रहा है कि देखो यह फ़लाना आदमी है और इस पर चढ़ी हुई है – हुड, हुड, हुड (सर घुमाकर), और उन्हें मज़ा भी आता है।

इस पर मैं घंटों बात कर सकता हूँ कि अंधविश्वास चीज़ क्या है। अहंकार को अपने बने रहने के लिए जो मजबूरी है उसको अंधविश्वास बोलते हैं। जो आदमी आध्यात्मिक नहीं है, अंधविश्वास उसकी विवशता है। अंधविश्वासी आपको होना पड़ेगा अगर आप आध्यात्मिक नहीं हैं। अगर आपकी ज़िंदगी मुक्ति की ओर नहीं जा रही तो और कहीं को जा ही नहीं सकती, अंधविश्वास की ओर ही जाएगी। क्योंकि आप जानते हो पहला अंधविश्वास क्या है? उसका नाम बताइए। अंधविश्वास माने जो चीज़ है नहीं पर आप उस पर विश्वास करते हो। पहला अंधविश्वास क्या है?

श्रोतागण: अहम्।

आचार्य: ‘मैं’, अहम्। जो अहम् में बैठा हुआ है उसे अंधविश्वासी होना पड़ेगा! वह कहे भी, चाहे भी कि उसे अंधविश्वासी नहीं होना है तो भी विवशता में उसे अंधविश्वासी होना पड़ेगा।

आइआइटी बॉम्बे गया था, वहाँ मेरे बैचमेट एक हैं, वहाँ वह प्रोफेसर हो गए हैं, तो उन्होंने कहा कि ये ऐसा कैसे हो गया है कि इतना अंधविश्वास देखने को मिलता है पूरी दुनिया में, पढ़े-लिखो में देखने को मिलता है, इसरो में देखने को मिलता है, आइआइटी तक में देखने को मिलता है; अंधविश्वास कैसे आ गया इतना?

मैंने कहा, ' सुपरस्टिशन की काट साइंस नहीं है, सुपरस्टिशन की काट स्प्रिचुअल्टी है।‘ तुम साइंस कितनी भी आगे बढ़ा लो, तुम यह भी पा सकते हो कि साइंटिफ़िक आदमी भी एक दूसरे तरीके से सुपरस्टिशियस है। वास्तव में अंधविश्वासी सिर्फ़ वो नहीं होगा जो स्प्रिचुअल है, आध्यात्मिक है, वो अंधविश्वासी नहीं हो सकता।

समझ में आ रही है बात यह?

प्र३: प्रणाम आचार्य जी। इफ़ समवन वाइस एंड एजुकेटेड एंड स्टिल सप्रेस्ड, सो व्हॉट इज़ द आउटकम, एंग्जायटी एंड डिप्रेशन? (कोई समझदार और शिक्षित है और फिर भी दबा हुआ है तो परिणाम क्या है, चिंता और अवसाद?)

आचार्य: एंड एन एक्स्प्लोज़न इन मल्टीफेरिअस वेज़, रेव पार्टीज़ (और एक विस्फोट अलग-अलग तरीकों से, तेज़ संगीत एवं तड़क-भड़क वाली भीड़)! वो क्या है? एक सहज प्रवाह नहीं मिल पा रहा है जीवन ऊर्जा को। आप किसी चीज़ को बहुत देर तक रोक दें तो उसका विस्फोट तो प्राकृतिक है न, होकर रहेगा न। कम पढ़े-लिखों में वह उस तरीके से होता है, ज़्यादा पढ़े-लिखों में भी इसी तरीके से होता है (सर घुमाते हैं); बस नाम अलग-अलग तरीके के होते हैं।

(श्रोतागण हँसते हैं)

वहाँ वो कह देते हैं कि इस पर आत्मा उतरी है, पढ़े-लिखों में कह देते हैं कि जस्ट चिलिंग डूड (बस मज़े मार रहे हैं यार); पर करते दोनों यही हैं (सर घुमाते हैं; श्रोतागण हँसते हैं)। और यह इसी बात की निशानी है कि जीवन सहज आगे नहीं बढ़ पा रहा, तो फिर उसको कुछ-न-कुछ किसी तरीके से एक डिस्टोर्टेड एक्सप्रेशन (विचलित अभिव्यक्ति) दिया जा रहा है।

प्र३: एंड इफ़ समवन इज़ नॉट डूइंग बोथ द थिंग्स? (और अगर कोई दोनों काम नहीं कर रहा है तो?)

आचार्य: देन इट्स वेरी-वेरी डेंजरस, देन द प्रेशर इज़ बिल्डिंग इनसाइड एंड द एक्सप्लोज़न कैन टीयर मेनी थिंग्स टू पीसेज़ (फिर यह बहुत-बहुत खतरनाक है, तो अंदर दबाव बनेगा, और विस्फोट कई चीज़ों को टुकड़े-टुकड़े कर सकता है)। वो न हो तो बेहतर है।

देखिए, इस विषय पर ओशो साहब ने, क्योंकि वह अभी के थे, उन्होंने काफी अच्छा काम करा है। है न? क्योंकि उन्होंने आधुनिक समय, हमारा कंप्यूटर युग है वो देखा था। तो उन्होंने जो मेडिटेशन की विधियाँ इजाद करी थीं वह खासतौर पर एक सप्रेस्ड मॉर्डन माइंड (दमित आधुनिक मन) के लिए थीं, जिसमें डायनेमिक (गतिशील) आता है, जिसमें और भी दो-चार (विधियाँ) आती हैं, वह यही थीं, कि तुम भीतर-ही-भीतर बहुत फ़्रेस्टेटेड (निराशी) हो! और तुम एक ऐसी व्यवस्था में फँसे हुए हो जो तुम्हारे फ़्रेस्टेशन को कोई आउटलेट नहीं देती है; तो तुम एक काम करो – तुम दीवार को गाली दे लो! तुम पहाड़ पर चढ़ जाओ और ज़ोर से चिल्लाओ! तुम आसमान की तरफ़ मुँह कर लो और शेर की तरह दहाड़ो! वह बहुत ज़रूरी है। क्योंकि तुम बेहोश थे, तुमने शादी कर ली, तुमने तीन बच्चे कर लिए, तुम्हें अब नौकरी करनी पड़ेगी, बच्चे पालने हैं, बीवी पालनी है, या पति पालना है, या जो भी करना है; समाज में इज़्ज़त बचानी है, किराया देना है तुम्हें, मकान की ईएमआई देनी है, या गाड़ी की ईएमआई देनी है; तुम्हें नौकरी करनी पड़ेगी और तुम्हारा बॉस तुम पर चढ़कर रहता है, दिन-रात तुम्हारी जान खाता है; तुम कुछ कर नहीं सकते।

तो भीतर तनाव और कुण्ठा इतने बढ़ेंगे, इतने बढ़ेंगे, इतने बढ़ेंगे! तो उन्होंने कहा, 'एक काम करो, तुम घर की छत पर चढ़ जाओ और ज़ोर से चिल्लाओ।' यह कोई अंतिम समाधान नहीं है, लेकिन कम-से-कम तात्कालिक राहत इससे मिलती है। इससे ऊँची बात, इससे बेहतर बात है यह, 'श्रीमद्भगवद्गीता'।

ऐसी चीज़ को ज़िंदगी में रखें ही क्यों जो इतना तनाव दे रही है। एक बार को दिल कड़ा करो और फिर प्रहार; और फिर बोलो, 'भला हुआ मोरी मटकी फूटी, अब मैं पनिया भरन से छूटी।' एक बार को दर्द होगा, मुक्त हो जाओगे।

रोज़-रोज़ तनाव अपने भीतर भरना, कुंठित रहना, कुपित रहना, ख़ुद से ही ख़फ़ा रहना, और फिर उस तनाव को कभी शॉपिंग के थ्रू हटाना, कभी मैच देख लिया, कभी पार्टी कर ली, कभी टूरिज्म कर लिया। हम यह सब तो करते हैं न, अपने भीतर कि…

प्र३: (प्रश्नकर्ता बीच में ही बोलतीं हैं) इवन इफ़ समवन इज़ नॉट डूइंग ऑल दिस ऑल्सो देन? (अगर कोई ये सब भी नहीं कर रहा है तो?)

आचार्य: देन इट्स … (सब हँसते हैं), आई होप एन एक्स्प्लोज़न इज़ जस्ट नॉट इमिनेंट, टाइम बॉम्ब स्टिकिंग (तो यह है, मुझे आशा है कि यह विस्फोट आसन्न नहीं है, टाइम बम चिपका हुआ है)। वह लोग भले होते हैं जो अपने फ्रस्ट्रेशन को किसी छुटपुट तरीके से, नकली तरीके से निकाल तो देते हैं; यह जो स्टिरियो टाइप बना हुआ है, 'द हेंडपेक हसबेंड' एंड 'द मग ब्रेकिंग वाइफ़' – वह क्या है? वह यही है न, तुमने उसकी ज़िंदगी ख़राब कर रखी है, वो उसमें भर रहा है, भर रहा है, तो वह बर्तन तोड़ती है, पता नहीं तोड़ती है कि नहीं तोड़ती है पर एक स्टिरियो टाइप है, और वह इसीलिए कि वह फायदेमंद है। बर्तन तोड़कर उसने भड़ास निकाल ली, बर्तन नहीं तोड़ती तो पता नहीं क्या-क्या टूटता; अच्छा है तू बर्तन तोड़ ले, बेहतर है, और बर्तन दे दो उसको।

बेहतर है कि उसे ऐसी ज़िंदगी से आज़ाद कर दो जिसमें उसे बर्तन तोड़ने पड़ते हैं; क्यों जान ले रहे हो उसकी? अब वह पढ़ी-लिखी है तो वह यह सब नहीं करेगी कि कहीं जाकर बैठ गई किसी बाबे के पास और कह रही है कि मेरा भूत उतारो। वो पढ़ी-लिखी है तो वह फिर बर्तन तोड़ेगी, वो कुछ और करेगी, टीवी तोड़ेगी, यह सब चलता है।

प्र३: एंड इफ़ समवन इज़ नॉट डूइंग इवन दैट? (और अगर कोई ऐसा भी नहीं कर रहा है?)

आचार्य: या तो मुक्त है या विक्षिप्त होने के क़रीब है।

(श्रोतागण हँसते हैं)

प्र३: नॉट एट ऑल। (यह सब नहीं।)

आचार्य : बेटर टू एड्रेस थिंग्स हेड ऑन। (चीज़ों को सीधे संबोधित करना बेहतर है)। जो ठीक नहीं है उससे निपटने के हमें परोक्ष, इनडायरेक्ट तरीके नहीं पकड़ने चाहिए। जो चीज़ जैसी है उसको वैसा देखा जाए। कॉल ए स्पेड ए 'स्पेड', एंड गेट रिड ऑफ़ व्हॉट इज़ अन्नेसेसरी। (जो जैसा है उसे वैसा ही कहो, जो अनावश्यक है उसे हटाते चलो।)

बीमार हो सकते हैं, कैंसर हो सकता है। मन और शरीर तो जुड़े होते हैं न। एक कॉन्टिन्यूअम (सातत्य) होता है – स्थूल शरीर और सूक्ष्म शरीर। सूक्ष्म शरीर में, यानी मन में जो चल रहा है वह स्थूल शरीर को भी प्रभावित करता-ही-करता है। कैंसर हो जाएगा, कार्डिएक डिजीज़ हो जाएगी, अचानक एक दिन पता नहीं चलेगा सडन साइलेंट अटैक आएगा मर जाएँगे, कुछ भी हो जाएगा।

श्रोतागण: ब्रेन हेमरेज हो सकता है।

आचार्य: हाँ, हेमरेज हो सकता है, कुछ भी हो सकता है।

प्र३: इट्स वेरी डिफ़िकल्ट टू कम आउट ऑफ़ आइडिलिज्म ऑल्सो। (आदर्शवाद से बाहर आना भी बहुत कठिन है।)

आचार्य: देखिए, आइडिलिज्म के तो केंद्र में ही क्या बैठा है? आइडिया , आइडिया। हमने ग़लती कर दी है, हम आम धारणा में आइडिलिज्म का अनुवाद करते हैं – 'आदर्शवाद'। आइडिलिज्म एक फिलॉस्फ़ी है, यूरोप से आयी है, वह है विचारवाद। लिविंग इन आइडियाज़, नॉट लिविंग इन फैक्ट्स (विचारों में जीना, तथ्यों में न जीना)। तो कोई भी आध्यात्मिक आदमी कभी भी आइडिलिज्म को प्रोत्साहित करता ही नहीं है। नॉट आइडिलिज्म! बट रियालटी, फैक्ट्स। (विचारवाद नहीं! सच्चाई, तथ्य)

प्र३: एंड व्हेन यू गो फ़ॉर स्प्रिचुअल्टी एंड यू ऑलरेडी बिलिव्ड इन दैट, पीपल अपोस यू, दे डॉन्ट कॉल यू स्प्रिचुअल ऑर रिलिजियस, मीन्स यू आर कॉल्ड रिबेलियस (और फिर जब आप अध्यात्म की तरफ़ जाते हैं और उसपर विश्वास करते हैं, लोग आपका विरोध करते हैं, वह आपको आध्यात्मिक नहीं कहते, आपको विद्रोही कहा जाता है)।

आचार्य: तो ठीक है, रिबेलियन (विद्रोह) तो अच्छी बात है, बुरा क्या है? यहाँ जो घटना घट रही है यह पूरा एक रिबेलियन ही तो है, नहीं तो वीकेंड (सप्ताहांत) पर यह (अद्वैत शिविर) करा जाता है क्या?

(श्रोतागण हँसते हैं)

और हम जो करते हैं वीकेंड पर ही करते हैं हमेशा – शुक्र, शनि, रविवार। और ज़्यादातर लोग यहाँ पर मैं समझता हूँ पच्चीस-पैंतीस, बहुत हुआ तो पैंतालीस-पचपन के होंगे, ज़्यादातर जवान लोग बैठे हैं यहाँ पर; यह रिबेलियन ही तो है। शरीर के प्रति भी एक विद्रोह है, समाज के प्रति भी एक विद्रोह है। समाज भी नहीं चाहता कि आप ये करो। शरीर भी नहीं चाहता है आप ये करो, पर आप कर रहे हो।

प्र४: प्रणाम आचार्य जी। अभी हमने बहुत सी चीज़ सूचीबद्ध की कि हमारे जीवन में जो कुछ भी है उसकी अब्सेंस ही आत्मा है। परंतु जीवन में, संसार में हमें जीना है तो ऐसा कुछ भी है क्या जीवन में जिसको साथ में हम रखते हुए आत्मा की सैर कर सकते हैं?

आचार्य: देखिए जब हमने बात करी थी कि 'मैं’ को शून्य करना होता है, तो क्या उसके साथ हमने यह भी कहा था कि मन को भी शून्य करना होता है? किसको याद है? हमने कहा था, 'आत्मा माने ‘मैं’ का शून्य हो जाना और मन का शुद्ध हो जाना।' तो मन माने संसार। आत्मस्थ होने का मतलब होता है – संसार तो है ही! पर उससे आपका जो रिश्ता है वह बड़ा कल्याणकारी हो गया। शुद्धता की क्या हमने परिभाषा बोली थी?

श्रोतागण: जहाँ लाभ हो।

आचार्य: हाँ, लाभ। जहाँ लाभ है वहाँ शुद्धि है। अब आपका दुनिया से रिश्ता कल्याण का, लाभ का हो गया है; आप जिससे सम्बन्धित हो उसका भी लाभ करोगे और उस सम्बन्ध में आपका भी लाभ होगा। हमारे रिश्ते परस्पर अहितकारी होते हैं, कष्टकारी होते हैं; वह दूसरों को भी तकलीफ़ देते हैं, ख़ुद भी तकलीफ़ पाते हैं।

ठीक है?

तो रहना इसी संसार में है, अध्यात्म आपको इसी संसार में रहने की कला समझाता है। सम्बन्ध ही सबकुछ है, संसार से सम्बन्धित तो होना ही पड़ेगा। कैसे होना है सम्बन्धित? देखिए दिक्क़त वहाँ आती है न जहाँ आप अपने चंद रिश्ते-नातों को संसार का नाम दे देते हो। मैं तो पूछा करता हूँ, 'आपका संसार माने क्या?' आपके फ़ोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट , वही तो आपका संसार है न, उससे आगे है संसार आपका?

अब समझ में आ रहा है?

संसार तो एक चुनाव है, आप नया संसार क्यों नहीं बना सकते? या यही जो दो-चार सौ लोग पकड़ लिए हैं, या दो, चार, पाँच हज़ार पकड़ लिए हैं? पाँच हज़ार तो किसी की ज़िंदगी में नहीं होते हैं। इनर सर्किल होता है बीस-चालीस लोगों का, और उस बीस-चालीस के अलावा सौ, दो-सौ लोग और होते हैं जिनसे आपको फ़र्क पड़ता है; नहीं तो कोई जिये कोई मरे, आपको अंतर पड़ता है क्या?

चीन में ठीक जितनी देर हमने बात करी है उतनी देर में सौ मौतें हो गईं होंगी, कोई फ़र्क पड़ रहा है आपको? कोविड से वहाँ मौतें चल रही हैं निरंतर, सौ लोग इतनी देर में दम तोड़ गए, क्या फ़र्क पड़ रहा है। संसार माने क्या? संसार भी जब हम बोलते हैं तो हम समष्टि की बात नहीं करते, हम बात करते हैं अपनी व्यक्तिगत दुनिया की।

तो इसपर मैं आपसे असहमत हूँ कि आपको उस व्यक्तिगत दुनिया में ही रहना है। संसार में तो आपको रहना है, पर आप कहें, ‘मुझे इन्हीं चार-सौ लोगों के बीच में रहना है’, तो मैं नहीं मानता। और ऐसा नहीं कि आप भी मानते हैं। अभी आप भारत छोड़कर अमेरिका चल जाते हैं, संसार बदल जाता है कि नहीं बदल जाता? सरकारी नौकरियों में हैं, उनका तबादला हो जाता है, संसार बदल जाता है कि नहीं? जब देखो तब ब्रेकअप कर लेते हो, दुनिया एकदम बदली कि नहीं बदली? जो रास्ते, जो गलियाँ याद हो गए थे अब रुख भी नहीं करते, दुनिया बदल गई कि नहीं?

एक कॉलेज से दूसरे कॉलेज में आ जाते हो, स्कूल बदल लेते हो, कुछ; दुनिया तो तुरंत बदलती रहती है। तो ऐसी क्या मजबूरी हम गिनाते हैं कि ‘अरे! रहना तो संसार में ही है, बदल कैसे दें?’ बदलो न संसार को। और संसार बदलने से मेरा आशय समाज सेवा से नहीं है, मेरा आशय सम्बन्धों से है। तुम चयन कर सकते हो न किससे रिश्ता बनाना है किससे नहीं, और बनाना भी है तो किस कोटि का बनाना है?

यह भी मैं नहीं कह रहा हूँ आवश्यक रूप से कि ज़िंदगी में जो लोग हैं उनको बदल दो, मैं कह रहा हूँ रिश्ता बदल दो। लोग भी बदले जा सकते हैं, बहुत ज़रूरत हो तो लोगों को भी बदल दो; पर लोगों को बदलने की बात बाद में आती है। दुख तुम्हें लोग नहीं देते, दुख तुम्हें लोगों से अपना रिश्ता देता है। यही तो कारण है कि वही व्यक्ति जो कभी सुख देता था अब दुख देता है। लोग नहीं, रिश्ता है जो दुख देता है; रिश्ता बदलो न, और रिश्ता बदलने के लिए स्वयं को बदलना पड़ेगा।

आप जब तक भूखे हैं, आपका मुर्गे से रिश्ता तो माँस का ही होगा। आपने अगर अपनी परिभाषा ही यही कर रखी है कि ‘मैं कौन हूँ? भूखा।’ तो आपको मुर्गे में माँस ही दिखाई देगा, यही रिश्ता रहेगा। आप कुछ और हो जाइए न, आप पूछिए अपनेआप से कि क्या वास्तव में अपनेआप को भूखा ही घोषित करके जीना ज़रूरी है? कोई बेहतर, ज़्यादा गरिमावान, ज़्यादा सशक्त तरीका नहीं हो सकता जीने का? ज़रूरी है कि मेरा नाम यही रहे, 'भिखारीदास’? मेरा कोई बेहतर नाम नहीं हो सकता क्या? देखो न नाम ही बदलने से सबकुछ हो जाता है। अहम् माने क्या? अहम् माने?

श्रोतागण: मैं।

आचार्य: और आत्मा माने भी?

श्रोतागण: मैं।

आचार्य: तो बदला तो कुछ नहीं, नाम बदलने से सब बदल जाता है। अब यह मत कह देना कि आचार्य जी कहते हैं ‘कुछ मत बदलो बस नाम बदल दो’ (श्रोतागण हँसते हैं), कुतर्क मत करने लग जाना; जो समझा रहा हूँ वो समझो। 'मैं' ही अपनेआप को पहले बोलता था?

श्रोतागण: अहम्।

आचार्य: और वही 'मैं' आत्मा हो जाए तो देखो दुनिया बदल गई न।

जो अपनी सेल्फ़-इमेज है, आत्म परिभाषा, तुम अपनेआप को क्या समझते हो, वही सबकुछ है।

प्र४: आचार्य जी, पर ये एक दिन में नहीं होता, यह प्रतिपल की लड़ाई है; हर सेकंड, हर क्षण आपको चुनाव करना होता है। और कई बार जब आँकलन कर रहे होते हैं कि क्या यह चुनाव मेरे डर को बढ़ाएगा या मेरी इच्छाओं को बढ़ाएगा, तो यू रीच अ स्टेट ऑफ़ लिम्बो! एंड इट इज़ वेरी स्ट्रेसफुल; सो हाउ डु डील विद इट एंड ब्रिंग स्पोंटनेटी ? (आप एक लिम्बो की स्थिति में पहुँच जाते हो, और यह काफी तनावपूर्ण होता है। तो इससे कैसे निपटें और स्वच्छंदता रखें?)

आचार्य: नथिंग, लिव थ्रू इट। डील क्या है? लिव थ्रू इट, मर थोड़े ही जाओगे। पुरुषार्थ का और क्या मतलब होता है, दर्द है तो झेलो!

मुझे बड़ा सुंदर लगता है, गीता में एक पूरा उल्लेख आता है – तो अर्जुन अपनी व्यथा कथा गा रहे हैं; ऐसा है, वैसा है, क्या बोल रहे हैं? कृष्ण एक शब्द में उत्तर देते हैं, कहते हैं - 'सहो अर्जुन, सहो! रोओ नहीं, बर्दाश्त करो!' बस चुप।

तो देह धरे का दण्ड है भाई! पैदा क्यों हुए अगर दुख नहीं चाहिए था? गौतम बुद्ध समझा गए, बोले, 'जीवन माने ही दुख होता है', जिसे दुख नहीं चाहिए वह पैदा न हो। ऋषियों ने इसी बात को ऐसे बोला कि 'दुख की ग्रंथि ही पैदा होती है, दुखी और अतृप्त कामनाएँ ही जन्म लेती हैं।' तो जीवन माने ही दुख होता है।

पैदा किसलिए हुए थे? एहसान कर रहे दुनिया पर?

(सब हँसते हैं)

और पैदा हुए हो तो सहो! सहने का कोई विकल्प नहीं है।

जीवन है अगर ज़हर तो?

श्रोतागण: पीना ही पड़ेगा।

आचार्य: सावधान रहिएगा उन सब युक्तियों से जो आपको इंस्टेंट ग्रेटिफिकेशन दिलवाती हैं, चाहे वह सांसारिक हों, चाहे आध्यात्मिक हों। दुनिया में बहुत कुछ ऐसा है जो जल्दी से मज़े दिलवा देता है, और आध्यात्म के बाज़ार में भी आपको बहुत कुछ है जो आपको जल्दी से राहत दिलवा देता है, सतर्क रहिएगा।

कहीं बेहतर है कि चुपचाप मुठ्ठी भींचकर, जबड़े भींचकर सहो। ‘नहीं लूँगा फ़ालतू दवाई!’ ऐसी दवाई क्यों लें जो उस पल राहत देगी लेकिन भीतरी सारी व्यवस्था ख़राब कर देगी? होती हैं बहुत दवाइयाँ, आपको कहीं दर्द हो रहा है आप वो दवाई ले लीजिए, दर्द तो चला जाएगा, किडनी ख़राब हो जाएगी; लेनी है ऐसी दवाई? नहीं। हम क्या करेंगे? हम सह लेंगे, दवाई नहीं लेंगे। झूठी दवाई नहीं चाहिए।

प्र५: प्रणाम आचार्य जी। जैसा अभी हम बात कर रहे थे चुनाव की कि हमेशा हमारे हाथ में होता है। तो जिसे हम आत्मा कहते हैं, या सत्य कहते हैं, या मुक्ति कहते हैं, उसके प्रति एकदम प्रगाढ़ प्रेम हम कैसे अपने जीवन में जगाएँ कि बाकी चुनाव हमें करना ही नहीं पड़े? बाकी जो कचरा है हमारे जीवन में वह अपनेआप छूट जाए? जैसे एक होता है कि मैं क्रोध छोड़ रहा हूँ या छोड़ने का प्रयास कर रहा हूँ, या कामवासना जाग रही है तो उसे त्यागने का प्रयास कर रहा हूँ। मतलब हर चीज़ का आपने अपोजिट बताया, काम जागा तो निष्काम है आत्मा। मतलब जो भी वृत्तियाँ आ रही हैं उसका अपोजिट , कुछ नहीं है आत्मा। तो उस आत्मा के प्रति हम कोई ऐसा प्रेम नहीं अपने जीवन में ला सकते, प्रगाढ़ प्रेम कि अपनेआप छूट जाएँ चीज़ें, हमें चुनाव करना ही न पड़े?

आचार्य: आत्मा के प्रति प्रेम कैसे जगाएँ?

प्र५: आत्म, या सत्य, या मुक्ति, मतलब।

आचार्य: इनके लिए प्रेम कैसे जगाएँ?

प्र५: जी।

आचार्य: ऐसे, ऐसे! जैसे अभी हैं ऐसे ही रहिए।

प्र५: ऐसे कैसे रहें?

आचार्य : अभी कैसे हैं?

प्र५: प्रेम है तो है सर, जिज्ञासु।

आचार्य: जो चाहिए उसके लिए जिज्ञासा करते रहिए मिलेगा। अभी क्या करा?

प्र५: जिज्ञासा करी।

आचार्य: अभी यह करा कि ये माइक नहीं देना चाह रहे थे।

(श्रोतागण हँसते हैं)

चाहिए था तो ले लिया। ऐसे ली जाती है मुक्ति, छीनी जाती है। ऐसे ही रहिए, बस ऐसे, यही उत्तर है।

कैसे समझाऊँ? 'प्रेम आचार्य जी कैसे उत्पन्न किया जाए?' अब किसी को ज़बरदस्ती प्रेम में धकोलेगे क्या? कि तू कर! भारत में हालाँकि हमने इस पर अभ्यास करा है (श्रोतागण हँसते हैं)। पूरा जो हमारा व्यवस्थित आयोजित विवाह होता है वह और क्या होता है? अब तो फिर भी एकाध-दो बार पहले मिल लेते हैं; पहले तो शादी हो जाने के दो महीने बाद शक्ल देखने को मिलती थी पहली बार, और कहा जाता था, 'तू कर! नहीं तू करेगा, तू इसी से प्यार करेगा, तुझे करना होगा।'

सौभाग्य की बात यह है कि मुक्ति से प्यार सीखने की कोई ज़रूरत नहीं है। ध्यान से सुनिए, आप जब बंधन की ओर भी जा रहे होते हैं न, आप मुक्ति के प्रेम के मारे जा रहे होते हैं। नहीं ज़रूरत है किसी को कि उसको सिखाया जाए कि मुक्ति से, सत्य से प्रेम कैसे करें। आपकी एक-एक साँस में, धड़कन में वह प्रेम ही बज रहा है।

आप जब बंधन को भी चुन रहे हो तो मैं कह रहा हूँ कि मुक्ति से प्रेम है इसीलिए बंधन को चुन रहे हो; बस नशे में हो तो बंधन को मुक्ति समझ लिया है।

कभी बंधन आपके सामने आया है यह बोल करके कि ‘मैं बंधन हूँ, मुझे चुनो!’ बोलो? आज तक ऐसा हुआ कि बंधन सामने आया है, यहाँ पर (माथे की ओर इंगित करते हुए) उसने लिख रखा है, ‘मैं बंधन’, और आपने चुना हो उसको? चुना कभी? आज तक कभी झूठ सामने आया है, उसने कहा, ‘मैं झूठ!’ आपने चुना उसको? हमेशा आपने चुना किसको है? चुना तो आपने सत्य को है, चुना तो आपने मुक्ति को है; यह अलग बात है कि बुद्धू बन गए।

अपनी अक्ल से सोचा था कि यह सच है, वह निकला झूठ। अपनी तरफ़ से सोचा था इससे मुक्ति मिलेगी, वह बन गया एक नया बंधन। तो इससे साबित क्या होता है कि प्रेम किससे है आपको, बंधन से या मुक्ति से? प्रेम तो मुक्ति से ही है; बस हमें पता नहीं है, जानने की देर है।

आप जानते हो आप सुबह उठते भी हो तो सिर्फ़ इसलिए क्योंकि आपको मुक्त होना है?

जिन्होंने जीवन को समझा है, उन्होंने कहा है कि जिस दिन मुक्ति की संभावना एकदम शून्य हो जाएगी आप अगले दिन बिस्तर से उठोगे नहीं। सुबह सूरज आपके लिए उग ही इसीलिए रहा है ताकि आप मुक्त हो पाओ। आप खाना छोड़ दोगे, आपका दिल अपनेआप धड़कना छोड़ देगा अगर यह निश्चित हो जाए कि अब आप मुक्त नहीं हो सकते।

आप पैदा ही हुए हैं मुक्ति के लिए, बस आपको यह बात पता नहीं है तो आप अपना समय इधर-उधर फ़िज़ूल कामों में गँवाते रहते हैं। वह प्रेम आपको विकसित नहीं करना पड़ेगा, वह प्रेम आप में है; ठीक वैसे जैसे अभी उसी प्रेम के कारण आपने माइक छीन लिया। यह जो आपने माइक माँगा है न आग्रह करके, यह आग्रह ही प्रेम है।

और सुनिए मज़ेदार बात! जिन लोगों ने नहीं माइक माँगा, उन्होंने भी इसीलिए नहीं माँगा क्योंकि प्रेम है; बस उनका प्रेम थोड़ा विकृत है, बेचारों को पता ही नहीं। लेकिन आप कर जो भी रहे हैं, चाहे आप दाएँ जा रहे हैं तो क्यों, किस वजह जा रहे हैं? बाएँ जा रहे हैं तो किस वजह जा रहे हैं? आप बँधन भी माँग रहे हैं तो किसलिए माँग रहे हैं? प्रेम है मुक्ति से।

यह हमें पता नहीं है अपने बारे में। हम चलते-फिरते प्रेम मात्र के पिंड हैं, और कुछ नहीं। आपको दिखा नहीं कभी कैसे हैं हम? हमने कहा था कि जानवर में तीन चीज़ें नहीं होती जो आदमी में होती हैं। पहली हमने कहा, बुद्धि; दूसरी कहा, मुक्ति से प्रेम, और तीसरी क्या बोली थी? आत्म-अवलोकन की शक्ति।

आपने कभी अपनी आँखों को देखा है या बस आँखों से देखा है? देखा है, आँखें कैसे ऐसे-ऐसे-ऐसे-ऐसे (आँखों की पुतलियों को घुमाते हुए) क्या कर रहीं हैं आँखें? क्या ढूँढ़ रहीं हैं? इन्हें प्रेम है इसीलिए यह स्थिर नहीं बैठ पातीं; यह लगातार कुछ तलाश रहीं हैं। कभी आपने देखा है आपके सामने एक भीड़ आ जाती है, आँखें उनमें ऐसे कुछ टटोलने लगती हैं? क्या तलाश रहीं हैं? वह उसी को तलाश रहीं हैं जिसको 'परम' बोलते हैं।

आप जी रहे हो ताकि वह 'परम' मिल जाए; हाँ, वह भीड़ में मिलता नहीं। मैं अपने खरगोशों को देखता हूँ, ज़रा सी आहट होती है उनके कान खुडुक! (ऊपर हाथ करते हुए) मैं कहता हूँ, 'इसको पता ही नहीं है इसके कान सुनना क्या चाहते हैं।' तो यह (खरगोश) कभी अपने कानों का इस्तेमाल करता है, कहीं भेड़िए की पदचाप सुन लूँ, सतर्क हो जाऊँ, कभी करता है कि गाजर आ रही है, खाना-वाना। कभी करता है मादा खरगोश आ रही है। इसको पता ही नहीं कि इसके कान क्या सुनना चाहते हैं। उन्हें 'ॐ' सुनना है। उसको पता ही नहीं लेकिन, खरगोश है।

हॉं, 'ॐ' माने वो ओ अ उ म वाला 'ॐ' नहीं! ॐ माने ॐ के अंत में जो मौन है, वही उस जीव को भी चाहिए। वही मौन, अंतिम मुक्ति इस जीव (मनुष्य) को भी चाहिए।

आप यहाँ क्यों बैठे हो? जो यहाँ नहीं बैठे हैं वह यहाँ क्यों नहीं बैठे हैं? दोनों की वजह एक है; बस यह हो सकता है कि शायद आप थोड़े ज़्यादा समझदार हैं, वजह तो वही है, अंतर समझदारी में हो सकता है।

समझ में आ रही है बात?

अमीर को पैसा क्यों चाहिए? इससे मुक्ति मिल जाएगी। जिनके पास पैसा है वह कई बार पैसा क्यों त्याग देते हैं? इससे मुक्ति चाहिए – पैसे से।

(मुस्कुराते हैं)

स्त्री को पुरुष क्यों चाहिए? पुरुष को स्त्री क्यों चाहिए? पता नहीं है? आप कहेंगे, 'नहीं, वो अच्छा लगता है इसलिए चाहिए।' नहीं, नहीं, नहीं, नहीं; आपको पता ही नहीं है असली बात। कुछ विशेष है जो आपको उसके माध्यम से चाहिए। और जिस दिन वह विशेष मिलने की संभावना नहीं बचती आप उस व्यक्ति को त्याग देते हो।

समझ गए या वापस जाना है? मुक्त होना है, मुझ से ही।

(सब हँसते हैं)

चलिए अच्छा है।

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