आत्मा क्या है? (पूरी बात) || आचार्य प्रशांत, वेदांत महोत्सव (2022)

प्रश्नकर्ता: आत्मा क्या है?
आचार्य प्रशांत: हम कैसे कह पाते हैं कि हम हैं? भीतर कौन है जो कहता है कि वह है? मैं हूँ? कौन है जिसको कोई भावना उठती है फिर गिरती है, जिसको विचार आता है फिर कभी उस विचार को वो बहुत आगे बढ़ा देता है, कभी विचार को खारिज कर देता है? क्या नाम देते हैं उसको?
श्रोतागण: मन।
आचार्य: मन। भीतर एक दुनिया है न? एक तो वह दुनिया है जो आपको आँखों से दिखती है, और एक भीतर दुनिया होती है – मन का आकाश, चिदाकाश! है न? वहाँ बहुत कुछ चल रहा होता है, और वहाँ जो कुछ चल रहा होता है उसके केंद्र में 'मैं' बैठा होता है।
जो भीतरी दुनिया है – हम परिभाषाएँ दे रहे हैं शुरू में ताकि आगे आत्मा को समझ सकें – जो भीतरी दुनिया है उसको क्या बोलते हैं? मन। जैसे बाहर-बाहर तो हम सब एक ही जगह पर बैठे हुए हैं अभी यहाँ पर, है न? लेकिन फिर भी हम सब अलग-अलग जगहों पर बैठे हैं।
हमारे पास कोई ऐसी तकनीक नहीं है, कोई ऐसा यंत्र नहीं है जो दिखा सके कि आप अभी कहाँ बैठे हैं। पर अगर हम ऐसी कोई तकनीक विकसित कर पाएँ तो वह दिखाएगी कि जितनी देर में एक घंटे में मैंने पिछली बात करी उतनी देर में हम सब मिलाकर के सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर आए – कोई अपने घर हो आया, कोई बाज़ार हो आया, कोई मिठाई की दुकान पर बैठ गया, कोई कुछ सोच रहा है, कोई कुछ कर रहा है; कोई हो सकता है थोड़ी देर के लिए बृहस्पति ग्रह पर आया हो, कुछ भरोसा नहीं। भीतर एक अलग ब्रह्माण्ड ही चल रहा है, उसको क्या कहते हैं? मन।






