कहीं भी मन क्यों नहीं लगता? || आचार्य प्रशांत, युवाओं के संग (2014)

वक्ता: (छात्रों से वार्तालाप करते हुए)
चलो, बताओ|
(कुछ देर मौन रहने के बाद)
बोलो बेटा! तुम किसी लैक्चर थिएटर में नहीं आए हो|
श्रोता: सर हम अपने आप को पूरी तरह समर्पित नहीं कर पाते किसी काम में|
वक्ता: बैठो| क्या नाम है?
श्रोता: अखिलेश सैनी|
वक्ता: अखिलेश ने क्या पूछा अभी? किसी भी काम में पूरी तरह डूब क्यों नहीं पाते?
बहुत सीधा उत्तर है| उस काम से ज़रूरी अगर कोई दूसरा काम लगातार याद आ रहा हो, तो किसी भी काम में कैसे डूबोगे?



